सुरेश बाफना का नजरिया : मोदी का बदलता चेहरा

 

एकतरफा संवाद को पसंद करनेवाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सवालों के कटघरे में खड़ा देखकर अच्छा लगा। अपनी सरकार के दो साल पूरे होने के मौके पर उन्होंने सरकारी दूरदर्शन की बजाय टाइम्स आउ के एंकर अरनब गोस्वामी को इंटरव्यू देकर सही निर्णय लिया। जिन विपरीत परिस्थितियों से निकलकर नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचे हैं, उससे स्पष्ट था कि वे मीडिया द्वारा उठाए जानेवाले किसी भी सवाल का जवाब देने में सक्षम पूरी तरह सक्षम है। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी हर तरह के मीडिया को साक्षात्कार दे रहे थे, लेकिन प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने मीडिया को दूर रखने की नीति को अपनाया। इससे आम लोगों में यह संदेश गया कि शासन व भाजपा की नीति से जुड़े कई सवालों का सीधा जवाब उनके पास नहीं है। यह धारणा तब और भी मजबूत हुई जब कई ज्वलंत सवालों पर मोदी खामोश रहे या कई दिनों के बाद कोई टिप्पणी की। भाजपा की नीति व मोदी के व्यक्तित्व को लेकर किसी की भी आलोचनात्मक राय हो सकती है, लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि वे लोकतांत्रिक देश के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं। इस नाते उनके विरोधियों को भी यह अपेक्षा करने का हक है कि वे देश के संविधान के अनुसार आचरण कर समाज के सभी वर्गों के कानूनी व संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने के सवाल पर कोई समझौता नहीं करेंगे। यह कहना गलत नहीं होगा कि पिछले दो साल के राष्ट्रीय व अर्न्तराष्ट्रीय अनुभवों ने न केवल मोदी की सोच पर असर डाला है, बल्कि उनकी भाषा व अभिव्यक्ति के स्तर पर भी बदलाव महसूस किया गया है। इस बात पर अलग बहस हो सकती है कि यह बदलाव कितना वास्तविक व रण‍नीतिक है?

मोदी को इस बात का अहसास हो गया है कि देश में मुस्लिम-विरोध की राजनीति को बढ़ावा देकर खाड़ी के मुस्लिम देशों से पूंजी-निवेश की उम्मीद नहीं की जा सकती है या विश्व हिन्दू परिषद की तरह ईसाइयों के खिलाफ अभियान चलाकर भारत को अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर शक्तिशाली देश के तौर पर उभार पाना संभव नहीं है। भारतीय समाज के विभिन्न स्तरों पर मौजूद विविधता को आज दुनिया में हमारी ताकत के तौर पर देखा जा रहा है। इस संदर्भ में अमेरिका व यूरोपीय देश ही नहीं, बल्कि कई मुस्लिम देश भी भारत की सामाजिक विविधता को आशाभरी नजरों से देखते हैं। दो साल के विश्व भ्रमण से नरेन्द्र मोदी को इस बात का गहरा अहसास हुआ होगा कि संघ परिवार का संकीर्ण हिन्दुत्व देश को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं है। जिस पांच हजार साल के इ्तिहास चर्चा अक्सर संघ परिवार के लोग करते हैं, वह समावेशी इतिहास रहा है। भारत की भूमि पर सभी धर्मों व संस्कृति के माननेवालों का स्वागत किया गया है। यहां यहूदी और मुस्लिम समुदायों के बीच न केवल सौहार्दपूर्ण संबंध है, बल्कि यहूदी भाषा व संस्कृति के संरक्षण में मुस्लिम समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं। 12वीं शताब्दी में ईरान से पलायन करके आनेवाले पारसी समुदाय ने भारत के बहुस्तरीय विकास में विशेष भूमिका निभाई है। देश में लगभग 69 हजार की आबादी वाले पारसी समुदाय की घटती आबादी को रोकने के लिए भारत सरकार विशेष अभियान चलाती है। भारतीयता के इस रूप से हमारा इतिहास भरा पड़ा है। इसलिए हमारा संविधान भी दुनिया में सबसे अलग है, जिसमें न्याय की भावना को सबसे अहम माना गया है।

अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने जो भाषण दिया था, उसमें उन सभी सवालों का जवाब था, जो वहां की सरकार द्वारा मोदी सरकार की नीति के संदर्भ में उठाए जाते रहे हैं। ‘टाइम्स नाउ’ को दिए गए इंटरव्यू में मोदी ने एक भी बात ऐसी नहीं कही, जो किसी भी तरह विवादित हो। अक्सर सवाल यह किया जाता है कि मोदी का रास्ता देश के संविधान से अलग नहीं है, लेकिन जब भाजपा के ही कई नेता व सांसद चुनाव जीतने के लिए घोर आपत्तिजनक बयान देते हैं तो उनकी तरफ से उन पर कोई टिप्पणी नहीं की जाती है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने स्वयं बिहार में हिन्दू कार्ड को खुले तौर पर खेलने की कोशिश की थी। मोदी विकास के नाम पर चुनाव लड़ने की बात करते हैं, लेकिन संघ परिवार और भाजपा के कई नेता ध्रुवीकरण के आधार पर चुनाव जीतने का प्रयास करते हैं। अमित शाह कहते हैं कि यूपीए सरकार के दौरान कांग्रेस ने प्रधानमंत्री को बोलने का अधिकार नहीं दिया था, जबकि हमने बोलनेवाला प्रधानमंत्री दिया है। यह बात सही है, पर दो साल तक मोदीजी एकतरफा संवाद में ही व्यस्त रहें। अच्छी बात है कि अब वे मीडिया के सवालों का सामना करने में संकोच नहीं कर रहे हैं। मोदी यदि डा. सुब्रमण्यम स्वामी को फटकार नहीं लगाते तो यह माना जाता कि वे उनके इशारे पर भी विवादास्पद बयानबाजी कर रहे हैं। इसलिए प्रधानमंत्री यदि मीडिया के सवालों का सामना करते  रहे तो भड़कानेवाले बयान देनेवालों पर लगाम लगाना संभव है। जिस तरह मोदी मीडिया के साथ संवाद का रिश्ता कायम करने की कोशिश कर रहे हैं, उसी तरह उन्हें प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए। यह सही है कि कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ था, लेकिन इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता है कि लोकसभा में वह सबसे बड़ी पार्टी है। चुनावी आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति का असर संसद के भीतर सामान्य संबंधों पर नहीं पड़ना चाहिए। अरनब गोस्वामी के साथ इंटरव्यू में प्रधानमंत्री का बदला हुआ चेहरा भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। जीवन में कई बार व्यक्ति खुद नहीं बदलता, देश व दुनिया का यथार्थ व्यक्ति को बदलने के लिए विवश कर देता है।

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