सुरेश बाफना का नजरिया : मोदी का विकास एजेंडा कितना चलेगा?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कटु आलोचक इस बात को लेकर असमंजस के शिकार हो गए हैं कि मंत्रिमंडल में फेरबदल करके उन्होंने देश, पार्टी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व अपने समर्थकों को क्या संदेश दिया है? यह माना जाता रहा था कि पूर्व मानव संसाधन मंत्रीस्मृति ईरानी प्रधानमंत्री व संघ के काफी नजदीक है, इसलिए उनके विभाग के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। पिछले दो साल के कार्यकाल के दौरान स्मृति ईरानी ने दर्जनों अनावश्यक विवादों को जन्म देकर मोदी सरकार के विकास एजेंडे पर ग्रहण लगा दिया था। ऐसा लग रहा था कि वे देश की शिक्षा मंत्री नहीं, बल्कि किसी महिला कुश्ती विभाग की प्रमुख हैं। नरेन्द्र मोदी व अमित शाह की जोड़ी दलित समुदाय को भाजपा से जोड़ने की कोशिश कर रहे थी, वहीं स्मृति ईरानी हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहिथ वेमूला की आत्महत्यासे जुड़े विवाद पर असंवेदनशील बयानबाजी कर रही थीं। उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव के संदर्भ में स्मृति ईरानी राजनीतिक बोझ बन गई थीं। वे महिला होने के आधार पर विक्टिमहूड का कार्ड खेलकर अपने आलोचकों को खामोश करने की कोशिश करती रहीं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय छिनने के बाद स्मृति ईरानी को शायद पहली बार इस बात का अहसास हुआ होगा कि राजनीति में भावनाअों और निजी संबंधों का कोई अर्थ नहीं है। नरेन्द्र मोदी ने अपने उन आलोचकों को भी गलत सिद्ध कर दिया जो यह समझते थे कि स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्री के पद पर बनाए रखना उनकी व्यक्तिगत व राजनीतिक मजबूरी है। यह कहना भी सही नहीं होगा कि आलोचकों के दबाव में आकर मोदी ने ईरानी के विभाग में बदलाव किया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय से हटाए जाने पर देश भर के अकादमिक समुदाय ने राहत की सांस ली है। मोदी के इस निर्णय से संघ परिवार के उन नेताअों को निराशा हाथ लगी है, जो ईरानी के माध्यम से संघ के शिक्षा-एजेंडे को लागू करने का प्रयास कर रहे थे। ईरानी को कपड़ा मंत्री बनाकर मोदी ने खुद को विपक्ष के राजनीतिक हमलों से भी सुरक्षित कर लिया है। निहितार्थ यह भी है कि मोदी या संघ की निकटता अक्षम मंत्रियों के लिए सुरक्षा कवच नहीं बन सकता है। मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में प्रकाश जावड़ेकर की नियुक्ति से यह संदेश गया है कि योग्य व सक्षम मंत्री को पदोन्नत किया जाएगा। पर्यावरण व वन मंत्री के रूप में जावड़ेकर ने न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी अपनी छाप छोड़ी है। पांच राज्य मंत्रियों को हटाकर मोदी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि उनके ऐजेंडे के बाहर बयानबाजी करनेवाले व सुस्त मंत्रियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह शुभ संकेत है कि मोदी मंत्रिमंडल अब देश का सबसे युवा मंत्रिमंडल है, जिसकी औसत आयु घटकर 56 रह गई है।

केन्द्रीय मत्रिमंडल के फेरबदल व विस्तार में राजनीति का पुट न हो, यह असंभव है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनावी विजय प्राप्त करना सबसे अहम एजेंडा होता है। उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों में दलित व पिछड़े वर्गों को अपनी तरफ खींचने के लिए 19 नए राज्य मंत्रियों में 10 दलित व पिछड़े वर्ग से हैं। भाजपा को अगड़ी जातियों की पार्टी के रूप में जाना जाता था। पिछले दस सालों से पार्टी दलित, आदिवासी व पिछड़ी जातियों में अपनी पैठ बनाने का अभियान चला रही है। यह स्वीकार करना होगा कि भाजपा अपने इस अभियान में एक हद तक सफल रही है। नरेन्द्र मोदी ने खुद को पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि के रूप में पेश कर भाजपा के पारम्परिक जनाधार को नया आकार देने का प्रयास किया, जिसमें उन्हें सफलता भी मिली। अब भाजपा अन्य दलों के स्थापित पिछड़े व दलित नेताअों को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं करती है।

केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बीच हुए लंबे विचार-विमर्श का सीधा संदेश है कि पार्टी व सरकार की प्राथमिकताअों के बीच बेहतर तालमेल है। मंत्रिमंडल में फेरबदल के माध्यम से मोदी ने स्पष्ट किया है कि वे विकास के एजेंडे को आगे रखकर ही चुनावी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन उनकी सरकार में कुछ मंत्री ऐसे हैं जो हिन्दुत्व को आगे रखकर ध्रुवीकरण की राजनीति में अधिक भरोसा करते हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने स्वयं बिहार चुनाव में गाय और पाकिस्तान को मुद्‍दा बनाने की कोशिश की थी। भाजपा के नेता ही इस बात को गर्व के साथ स्वीकार करते हैं कि पार्टी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का राजनीतिक मंच है। ऐसी स्थिति में संघ के एजेंडे से तालमेल बिठाना भाजपा की विवशता है, वही संघ पर दबाव है कि वह राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय वास्तविकताअों से तालमेल बिठाकर अपनी रणनीति तय करें। जब भी यह संतुलन बिगड़ता है, तब भाजपा को मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। प्रधानमंत्री मोदी के सामनेविकास और हिन्दुत्व का अन्तर्विरोध निरन्तर बना रहेगा। अभी तक आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार संघ के स्वदेशी एजेंडे को दरकिनार करने में कामयाब रही हैं, लेकिन राम मंदिर जैसे राजनीतिक मुद्‍दों पर टकराव की स्थिति लगातार बनी रहेगी। मोदी को इस वास्तविकता का अहसास है कि उनकी चुनावी विफलताएं संघ के दबाव को बढ़ा देंगी। उत्तर प्रदेश में भाजपा के कई नेताअों  व सांसदों की राय यह रही है कि हिन्दुत्व का कार्ड खेलकर ही विधानसभा चुनाव में सपा व बसपा की राजनीतिक चुनौती का सामना किया जा सकता है, लेकिन मोदी-अमित शाह बिहार जैसी गलती को दोहराना नहीं चाहते हैं। मंत्रिमंडल में फेरबदल के माध्यम से मोदी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे संघ के एक्सक्लूसिव एजेंडे से अलग हटकर इंक्लूसिव एजेंडे के आधार पर आगे बढ़ना चाहते हैं। यह समय ही बताएगा कि मोदी अपने इस इरादे में कितने सफल हो पाते हैं?

 

 

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