अंक शास्त्र का ज्योतिष विद्या से है गहरा संबंध

ब्रह्मा द्वारा रचित इस सृष्टि में सूक्ष्म से सूक्ष्मतर सभी किसी न किसी रूप में सामंजस्य रखते हैं। हमारी भारतीय आध्यात्मिक परंपराएं, अंकों के शुभ-अशुभ फलों का समन्वय जहां विश्व के अन्य धर्मों के साहित्य एवं मान्यताओं से समानता रखता है वहीं हस्त, ज्योतिष, वास्तु एवं फलित ज्योतिष सभी में अंक शास्त्र का प्रभाव देखा जा सकता है।

आइए जानें अंकशास्त्र का विभिन्न ज्योतिषीय विद्याओं के साथ आपसी संबंध…

हमारे ऋषि अगस्त्य, ऋषि पराशर रूपी महान वैज्ञानिकों ने हजारों वर्ष पूर्व से ही पौराणिक ग्रंथों के विवरणों तथा प्रचीन परंपराओं के इतिहास को इस भारतीय उपमहाद्वीप को विभिन्न ज्योतिषीय पद्धतियों का इन विद्याओं का केंद्र बनाया था। विश्व के प्राचीन साहित्य, पूर्व एवं वर्तमान समय के परंपराओं के इतिहास की ओर यदि दृष्टि डालें तो विभिन्न ज्योतिषीय पद्धतियों यथा फलित ज्योतिष, सामुद्रिक ज्योतिष, हस्त ज्योतिष, अंक ज्योतिष एवं वास्तु विद्यायें संपूर्ण विश्व तक केवल फैली हुई ही नहीं, वरन् इनमें आपसी तौर पर परंपरागत समानताएं भी पाई गई है।

जैसे भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में अंक 7 को शुभ माना जाना, 7 वार, 7 चक्र, 7 दिन, विवाह में अग्नि के 7 फेरे, 7 द्वीप (सप्त द्वीप), 7 पाताल। इसी भांति यहूदियों की धार्मिक परंपराओं में भी अंक 7 की महत्ता तथा 7ग7त्र49 की संख्या को भी काफी प्रभावशाली माना जाता है। दूसरी तरफ भारतीय परंपराओं में अशुभ माने जाने वाले अंक 13 को ईसाई व यूरोप की परंपराओं में इतना अधिक अशुभ माना जाता है कि उनके हाॅटल जैसे व्यावसायिक केंद्रों के कमरों की संख्या में अंक 13 का प्रयोग नहीं किया जाता।

इसके अलावा भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं तथा यंत्र व अंकशास्त्रों में धर्म पारलौकिक एवं दाम्पत्य सुख के प्रतीक गुरु के अंक 3 की महत्ता और इसी अंक को इस्लाम धर्म में भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है जैसे 3 घूंट में पानी पीना, किसी भी कथन की मंजूरी व नामंजूरी में अंक 3 तक की सीमाएं, शुभ अंक 786 का 7$8$6=21=2$1=3 का मूलांक आदि। अंकशास्त्र की यह विद्या मूलांक, भाग्यांक एवं नामांक जैसी तीन पद्धतियों में प्रचलित है। सदियों से मानव जाति का स्वभाव ऐसा रहा है कि वह प्रत्येक बार कुछ नया जानना चाहता है। आसानी से प्रत्येक मनुष्य संतुष्ट नहीं होता।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करने पर यह ज्ञात होता है कि मानव की उपर्युक्त जिज्ञासा ने ही उसे ज्योतिष शास्त्रों के विभिन्न विद्याओं के गंभीर रहस्योद्घाटन के लिए प्रवृत्त किया है। इस शास्त्र की परिभाषा समय-समय पर विभिन्न रूपों में मानी जाती रही है। समय के साथ-साथ यह परिभाषा और अधिक विकसित होती गई। नक्षत्रों की आकृति, स्वरूप, गुण एवं प्रभाव का परिज्ञान प्राप्त करना ज्योतिष माना जाने लगा।

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