‘अपमान’ हो तो अमरसिंह जैसा…!

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भारतीय राजनीति के अमर सितारे अमरसिंह को अपने अपमानित होने का एहसास हुआ है। अमूमन मान-अपमान से परे रहने वाले अमरसिंह को समाजवादी पार्टी से तीसरी बार राज्यसभा सांसद बनने के बाद लगा था कि अब उनकी सियासी चित्र कथा नए अंदाज में चलेगी। लेकिन दूसरों को कष्ट से उबारने वाले अमरसिंह के कारण ही उनकी ‘घर वापसी’ कराने वाले मुलायम सिंह के घर में समर मचा है। चाचा-भतीजे खम ठोंके हुए हैं। आजम खान उन्हें घुसपैठिए माने हुए हैं। इन सबसे परेशान अमरसिंह ने हालिया इंटरव्यू में कुंती पुत्र कर्ण की तरह कहा कि राज्यसभा सीट के बदले में मुझे पार्टी में सिर्फ अपमान मिला। ऐसा ही रहा तो मैं राज्यसभा सांसदी से इस्तीफा दे दूंगा। लेकिन पहले अपने आका मुलायमसिंह से बात करूंगा और इस्तीफा दिया तो सिद्‍धू की तरह  सीधे सभापति को दूंगा।

हालांकि सबको पता है कि अमरसिंह इतनी जल्दी इस्तीफा देने वालों में नहीं है। पहले भी उनके साथ कई विवाद हुए, अपमान हुआ, लेकिन उन्होने इस्तीफा सिर्फ एक बार दिया, वह भी सपा के राष्ट्रीय महासचिव पद से। बाद में मुलायमसिंह ने उन्हें जयाप्रदा के साथ क्राॅस वोटिंग के आरोप में पार्टी से निकाल दिया था। तब भी अमरसिंह ने उसे अपना अपमान नहीं माना और जयाप्रदा के साथ मिलकर नई पार्टी राष्ट्रूीय लोकमंच बनाकर यूपी का विधानसभा चुनाव लड़ा। खुद को ठाकुर नेता मानने वाले अमर सिंह पार्टी सहित चुनाव में खेत रहे। इसे उन्होने अन्यथा नहीं लिया। यूपीए-टू के जमाने में तीन भाजपा सांसदों को रिश्वत देने के मामले में उन्हें तिहाड़ की हवा खानी पड़ी। फिर भी अमरसिंह मान-अपमान से ऊपर रहे। बाद में लंबी बीमारी के समय उनका साथ बिग बी जैसे दोस्तों ने भी छोड़ दिया। तब भी अमरसिंह ने खुद को अपमानित महसूस नहीं किया। बाद में चौधरी अजीतसिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल के बैनर पर लोकसभा चुनाव लड़ा। अफसोस कि जनता ने उन्हें यहां भी बाहर का रास्ता दिखाया। इससे अविचलित अमरसिंह ने ‍नए सिरे से मुलायम भक्ति शुरू की। मन से मुलायम मुलायमसिंह ने अपने ‘सच्चे’ अनुयायी  अमरसिंह को मय जयाप्रदा पार्टी में वापस लिया, सांसद बनाया।

अमरसिंह फिर भी दुखी हैं। कारण अखिलेश सरकार में उनकी हैसियत ‘गूंगे बहरे’ की है। उनकी टीस है कि जो लोग माायावती के जमाने में मलाई चाट रहे थे, वो अखिलेश सरकार में भी चांदी काट रहे हैं। बकौल अमर ‍कल तक उनको चाचा कहने वाला सीएम अखिलेश अब उनके फोन तक नहीं उठाता। जबकि अमर का मिशन केवल राजनीति में मुलायमवाद को मजबूत करना अौर उनकी सियासी सहेली जयाप्रदा को सेटल करना है। अब  मुलायमवाद बोले तो परिवारवाद से शुरू और परिवारवाद पर खत्म। या यूं कहें ‍िक परिवारवाद में अल्पसंख्यकवाद का देसी तड़का ही मुलायमवाद है। यह समाजवाद की देसी राजनीतिक रेसिपी है। इस पार्टी की एक ही विचारधारा है कि इसकी कोई विचारधारा नहीं है। दिक्कत सिर्फ इतनी है कि यहां सत्ता, संगठन, प्रशासन आदि सब परिवार से जुड़े मामले हैं। ऐसे में जिसके हिस्से में कम रेवड़ी आती है, वही रूठने लगता है। सरकार हिलने लगती है। मजबूरन मुलायम को सत्ता व प्रतिपक्ष दोनो का किरदार निभाना पड़ता है।

फिर भी अमर के पैर वहां‍ ‍टिक नहीं पा रहे हैं। यही दुख का कारण है। जिस अमरसिंह ने अब तक हर मान-अपमान को स्थितप्रज्ञ भाव से झेला, वह इस्तीफे जैसा अतिवादी कदम सचमुच उठा लेगा, इसका भरोसा भगवान को भी नहीं है। क्योंकि तमाम ‘पापों’ के बाद भी सियासी अमरता उनके डीएनए में है। उनके पुराने दोस्त अमिताभ बच्चन का मशहूर डायलाॅग है-‘मूंछें हों तो नत्थूलाल जैसी।’ इसे नए संदर्भ में यूं पढ़ें- ‘मान-अपमान हो तो अमर सिंह जैसा…!‘

 

 

 

 

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