कानूनन-गलत केजरीवाल क्या ‘पोलिटिकली-करेक्ट’ हैं?

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दिल्ली-सरकार के अधिकारों की जंग में हायकोर्ट के फैसले के बाद भले ही मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लीगली-रांग (कानूनन-गलत) सिध्द हो गए हों, लेकिन यह फैसला होना बाकी है कि वो पोलिटिकली-करेक्ट है अथवा नहीं? फैसला सुप्रीम कोर्ट करेगी कि एक निर्वाचित सरकार के मायने क्या है? यदि यह बेमानी है तो इन्हें हाथी के दांत की तरह सजा कर क्‍यों रखा गया है? केजरीवाल के सवाल लोकतांत्रिक-मान्यताओं को एड्रेस करते हैं। दिल्ली चुनाव के पहले तक भाजपा भी दिल्ली को पूर्ण राज्‍य का अधिकार देने की पक्षधर थी, लेकिन हारने के बाद वह इसे भुला चुकी है। केजरीवाल का कहना है कि यदि निर्वाचित सरकार को जनहित में फैसले लेने का अधिकार नहीं है, तो उसके होने का औचित्य ही क्या है? जन-प्रतिनिधियों के नाम पर मोम के पुतलों की मानिंद विधानसभा या सरकार में बैठना उन्हें कबूल नहीं है। हायकोर्ट ने दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन में वित्त मंत्री अरुण जेटली की वित्तीय अनियमितताओं और सीएनजी घोटाले की जांच के लिए गठित आयोग को भी रद्द कर दिया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ एक निर्वाचित सरकार के फैसलों का यह हश्र कितना जायज है? हमारी जवाबदेही हमें चुनने वाली जनता के प्रति है केजरीवाल की लड़ाई कानूनी कम, राजनीतिक ज्यादा है। लोकतंत्र में राजनीति संविधान की मंशाओं के अनुरूप चलती है और संविधान राजनीति की आकांक्षाओं के अनुसार बदलते हैं। गुरुवार को ही मोदी-सरकार ने जनहित की बुनियाद पर जीएसटी के मामले में 122 वां संविधान-संशोधन विधेयक राज्यसभा में पारित किया है।

दिल्ली-सरकार के अधिकारों की लड़ाई आसान नहीं है। राजनीतिक मोदी-सरकार, दिल्ली-सरकार के स्वरूप और अधिकार के पुनर्निर्धारण के लिए नए सिरे से कानून बनाने की पहल कभी भी नहीं करेगी, क्योंकि इस दशा में विजेता अरविंद केजरीवाल घोषित होंगे। केजरीवाल का सारा धमाल जनता की आकांक्षाओं पर टिका है। हायकोर्ट के विरुध्द सुप्रीम कोर्ट में आंसू बहाना केजरीवाल की मजबूरी है, अन्यथा लड़ना तो वो राजनीति एरिना में चाहते हैं और वही उनके लिए सबसे मुआफिक बैठता है। आप-पार्टी ने कोर्ट के फैसले को राजनीति के रॉकेट पर बिठाकर गोले दागना शुरू कर दिया है। जनता से कहा गया है कि बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, करप्शन आदि समस्याओं के निराकरण के लिए सीधे लेफ्टिनेंट गवर्नर का दरवाजा खटखटाएं। एलजी के दरबार में समाधान नहीं होने की दशा में वो प्रदर्शन आदि के लिए आम आदमी पार्टी को अपने साथ खडा पाएंगे। दूसरी तरफ उपराज्यपाल नजीब जंग की सल्तनत पर न्यायालय की मुहर लगने के बाद सबसे पहले दिल्ली पुलिस ने मुख्यमंत्री केजरीवाल के शासकीय निवास के आसपास धारा 144 के तहत लगी निषेधाज्ञा को वापस लेने का फरमान जारी कर दिया है। जबकि, केजरीवाल विपश्यना के लिए 15 दिनों तक दिल्ली से बाहर हैं। सरकार के अधिकारों और कार्य-विभाजन जैसे महती और गंभीर मसले पर राजनीति का यह बौनापन उथली मनोदशाओं को रेखांकित करने वाला है। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की लड़ाई सबसे पहले भाजपा ने ही शुरू की थी। चुनावी राजनीति में मुद्दों को भुला देने या दरकिनार कर देने के मामले में भारतीय जनता पार्टी की तासीर गजब की है।

राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश में 1956 में दिल्ली को राज्यों की श्रेणी से हटाकर केन्द्र शासित प्रदेश में बदला गया था। दिल्ली विधानसभा के बदले दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन का गठन हुआ था। फिर 7 नवम्बर 1966 में दिल्ली प्रशासन कानून बनाकर यहां मेट्रोपोलिटन कांउसिल के निर्माण की प्रक्रिया में चीफ कमिश्नर के स्थान पर उपराज्यपाल को स्थापित किया गया। विधायी अधिकारों से वंचित काउन्सिल का काम महज उपराज्यपाल को सलाह देने से ज्यादा कुछ नहीं था। 1991 में सरकारिया कमीशन की सिफारिश पर संविधान में 69वां संशोधन करके वर्तमान व्यवस्था को लागू किया गया था। उस समय केन्द्र में कांग्रेस सरकार थी और भाजपा इससे सहमत नहीं थी। भाजपा का कहना था कि इससे दिल्ली को सरकार और मुख्यमंत्री तो मिल जाएंगे, लेकिन वो अधिकारविहीन होंगे। पच्चीस साल में भाजपा दिल्ली को पूर्ण-राज्य की हैसियत देने की बात पिछले चुनावी घोषणा-पत्र में शरीक करने के बावजूद भूल चुकी है।

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