जीएसटी पर जेटली की किलक और गरीबों की कसक?

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    सवा सौ करोड़ आबादी वाले विशाल भारत में सौ करोड़ से ज्यादा गरीबों को छोड़कर ज्यादातर लोग जीएसटी बिल पारित हो जाने के बाद किलक रहे हैं… वित्तमंत्री अरुण जेटली खुश हैं…पी. चिदम्बरम् भाव-विव्हल हैं… भाजपा को सूझ नहीं पड़ रहा है कि अपनी खुशी को कैसे बयां करे… प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सौ-सौ बलैयां लेकर कैसे उनकी नजर उतारे…भाजपा को चिंता है कि कहीं इससे मोदी को राजनीतिक-नजर नहीं लग जाए… कांग्रेस उल्लसित है कि जीएसटी का यह विधेयक यूपीए सरकार का ब्रेन-चाइल्ड है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि जीएसटी विधेयक सहयोगात्मक संघवाद का सबसे बड़ा उदारहरण है।

सौ करोड़ गरीबों के चेहरे पर थकी-हारी पसीनों की गर्द में इसलिए फर्क महसूस नहीं हो रहा है कि उन बिचारों को पता ही नहीं है कि भाजपा और कांग्रेस ने मिलकर देश में नए आर्थिक-युग का सूत्रपात कर दिया है… उन्हें पता ही नहीं है कि जीएसटी का सीधा असर कारों के बाजार पर पड़ेगा और कारें सस्ती हो जाएंगी… उन्हें पता ही नहीं है कि ऑटोमोबाइल- सेक्टर के सेंटीमेंट्स को इससे कितनी ताकत मिलेगी…उन्हें पता ही नहीं है कि सीमेंट और स्टील की कीमतें कम होने से ”रिअल-इस्टेट” में बहार आ जाएगी… हायराइज बिल्डिंगें उनकी देहरी पर खड़ी नजर आएंगी… उन्हें पता ही नहीं है कि उनके 545 माननीय सांसदो ने मिलकर 21 वीं सदी के लिए देश की दशा और दिशा बदलने वाली ऩई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली देकर गरीबों पर अभूतपूर्व उपकार किया है…उन्हें पता ही नहीं है कि जीएसटी के बाद ‘मेक इन इंडिया’ अभियान से देश सुर्ख हो जाएगा…। भारत सरकार अपने रजिस्टर में सिर्फ गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले 27-28 करोड़ लोगों को ही गरीब मानती है। आर्थिक रूप से जर्जर दूभर और दुर्गम जिंदगी उसकी परिभाषाओं से बाहर है।

अब सवाल यह है कि जिन्हें यह पता था कि जीएसटी पारित होने के बाद रूपए के रूप-रंग में चांद-सूरज का नूर छलक उठेगा… गरीबों के आंगन में परमानंद चहकने लगेगा… उन लोगों ने इसे पारित करने में 11 साल से ज्यादा वक्त क्यों लगाया? सरकार ने दावा किया है कि जीएसटी के सकारात्मक प्रभाव तीन साल में सामने आ सकेंगे, तो उससे चार गुना समय गंवाने के लिए गुनाहगार कौन है… भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस अथवा अन्य राजनीतिक दल…? पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम के इस कथन में किस पर आरोप है कि जीएसटी बिल को यहां तक पहुंचने में 11 साल का वक्त लगा? भाजपा दो साल से सरकार में है और  10 साल तक सरकार के सूत्र कांग्रेस के हाथों में रहे। भाजपा-कांग्रेस की जीएसटी-राजनीति में छलकते खुशियों के आंसू का खुलासा तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन की इस टिप्पणी में मिलता है कि पिछले 10 सालों में कांग्रेस और भाजपा ने जीएसटी को लेकर जो खेल किये हैं, उसके लिए उन्हें ओलिम्पिक मेडल मिलना चाहिए। ब्रायन ने टिप्पणियों सहित उजागर किया कि भाजपा और कांग्रेस के नेता मिलकर किस प्रकार जीएसटी बिल की फजीहत करते रहे हैं? सत्ता और विपक्ष की अदला-बदली के साथ ही उन लोगों ने जीएसटी से संबंधित बयानों की अदला-बदली कर ली है।

बखिया उधेड़ें तो भाजपा और कांग्रेस के राजनीति-लिबास में सैकड़ों छेदों को छिपाना संभव नहीं होगा। जीएसटी मसले में सत्ता और विपक्ष के मुखौटों की अदला-बदली से भारतीय राजनीति का बुनियादी चरित्र उजागर हो रहा है। यदि राजनेता मुंहजोरी नहीं करें तो भाजपा को सफाई देना मुश्किल होगा कि जो जीएसटी आज उसके लिए जीवन-मरण का सवाल बन गया था, यूपीए सरकार के जमाने में उसे रोकने के लिए वह एड़ी-चोटी का जोर लगा कर क्‍यों अड़ी थी? और, आज जब भाजपा की सरकार विधेयक को पारित कराने के लिए जी-जान से जुटी थी, तो कांग्रेस का अपने ही ‘ब्रेन-चाइल्ड’ को दो साल तक रोकने का सबब क्या था? त्रासदी यह है कि देश की दोनों प्रमुख पार्टी कांग्रेस और भाजपा ने पक्ष-विपक्ष में रहते हुए देश-हित की राजनीति करने का कल्चर विकसित नहीं किया है। चुनाव की राजनीति की खातिर देश-हित के एजेण्डे ने हमेशा मार खाई है। इसीलिए आज जहां कांग्रेस तुष्टिकरण की राजनीति की गुनाहगार मानी जाती है, तो भाजपा पर साम्प्रदायिकता के आरोप लगते रहते हैं। पक्ष-विपक्ष में हमेशा एक-दूसरे को नीचा दिखाने की राजनीति के कारण जनहित के वास्तविक मुद्दे हमेशा हाशिए पर धक्का खाते रहे हैं। जीएसटी के बहाने कांग्रेस और भाजपा के उजागर राजनीतिक चेहरों को देखकर लोगों में यह सवाल कुलबुला रहा है कि क्या राजनीति में इसी को भाजपा का राष्ट्रवाद और कांग्रेस की राष्ट्रीयता कहते हैं? सौ करोड़ गरीब   भी तकलीफ के साथ पूछ रहे हैं कि तीन साल में उनकी जिंदगी को सुनहरा बनाने वाले विधेयक को कांग्रेस और भाजपा के सूत्रधारों ने 11 साल तक क्यों लटकाए रखा?        

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