राव पर जेटली के प्रहार से विकास की कहानी में नया झोल…?

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देश, काल और परिस्थितियों की बात करें तो वर्तमान के पास अपने हिसाब से देश के अतीत को पढ़ने और गढ़ने का नैसर्गिक हक हासिल होता है। यूपीए कार्यकाल में एक मर्तबा भाजपा को तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदम्बरम का यह कथन काफी खराब लगा था कि अतीत में भारत कभी भी सोने की चिड़िया नहीं था। भाजपा ने चिदम्बरम पर भारत के गौरव की खिल्ली उड़ाने का आरोप लगाया था। चिदम्बरम ने तो दो-तीन हजार साल पुराने ’पर्सेप्शन’ को नकारा था, लेकिन वित्तमंत्री अरुण जेटली की राजनीतिक-थीसिस ने आजाद भारत के विकास की कहानी में ऩया झोल डाल दिया है। जेटली थीसिस के अनुसार  आर्थिक दुरावस्था के लिए प्रधानमंत्री जवाहरलाल  नेहरू के आर्थिक-मॉडल जिम्मेदार हैं। थीसिस के दूसरे चेप्टर में वो प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव को आर्थिक-सुधारों का मसीहा मानने से इंकार करते हैं। नरसिंहराव का सोच रूढ़िवादी था, और नेहरू का आर्थिक-मॉडल असफल हो जाने के कारण  मजबूरीवश उन्हें आर्थिक-सुधारों को लागू करना पड़ा। जेटली की यह थ्योरी राजनीतिक-हलकों में ऩई बहस का सबब बनने वाली है।

नेहरू को राजनीतिक और ऐतिहासिक रूप से खारिज करना भाजपा-सरकार के एजेण्डे का हिस्सा है। इससे सोनिया गांधी, राहुल गांधी और  कांग्रेस पर प्रहार के अवसर चमकदार बनते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरसिंहराव और वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के मात्र पंद्रह साल पुराने आर्थिक-सुधारों की इबारत को अकारण बदरंग करने की रणनीति समझ पाना थोड़ा मुश्किल है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भाजपा के आरोपों के जवाब में एक बार कहा था कि मेरे आर्थिक सुधारों की समीक्षा इतिहास करेगा। लोग सहजता से नहीं मानेंगे कि राव और सिंह रूढ़िवादी सोच के नेता थे। दुनिया राव की विद्वत्ता, मनमोहनसिंह की योग्यता की कायल है। सब जानते हैं कि जिस आर्थिक-उदारीकरण की पीठ पर सवार होकर देश विकास की ओर बढ़ रहा है, उसकी बुनियाद नब्बे के दशक में नरसिंहराव ने ही रखी थी। राजनीतिक-हलकों में कई वरिष्ठ नेता अटलबिहारी वाजपेई और नरसिंह राव के संबंधों का चश्मदीद गवाह हैं। लोग कहते हैं कि अटलजी को परमाणु परीक्षण करने का परामर्श राव ने ही दिया था कि अन्तर्राष्ट्रीय-परस्थितियों के कारण उनके हाथ बंधे थे, लेकिन अटलजी इस काम को जरूर अंजाम दें। यह किस्सा दो बड़े नेताओं के राजनीतिक रिश्तों के ऊपर देश की सर्वोच्चता की स्थापना का अनुकरणीय उदारहण है। कुछ दिन पहले राव की पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सम्मान के साथ उन्हें याद करके सदाशयी राजनीति के संकेत दिए थे।

जेटली संतुलित संवादों के लिए मशहूर हैं। शनिवार को मुंबई में भाजपा कार्यकर्ताओं से  जेटली ने कहा था कि 1991 में देश की खस्ताहालत के कारण राव आर्थिक नीतियों में परिवर्तन के लिए मजबूर हुए थे। ये स्थितियां नेहरूवादी अर्थव्यवस्था की बदौलत बनी थीं। वो कोई बड़े आर्थिक उदारवादी या आर्थिक सुधारक नहीं थे। राव पर लिखी किताब ’हाफ लॉयन : हाउ पीवी नरसिम्हा राव ट्रांसफॉर्म्ड इंडिया’  के उद्धरण देते हुए जेटली ने बताया कि आंध्र के कानून मंत्री के रूप में उनका पहला फैसला था कि प्रायवेट कॉलेजों को बंद करके सिर्फ सरकारी कॉलेज के माध्यम से ही शिक्षा दी जाना चाहिए। यह दर्शाता है कि राव कितने रूढ़िवादी और अनुदार थे।

लोकतंत्र में पक्ष-विपक्ष की राजनीति के अपने-अपने सच होते हैं, सिद्धांंत होते हैं और विरोधियों पर बढ़त बनाने के अलग-अलग इंस्ट्रूमेंट होते हैं। कांग्रेस साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल करके भाजपा को कठघरे में खड़ा करती रही है। भाजपा ने भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से कांग्रेस को चित किया है। आजादी के अड़सठ सालों से देश पर कुल जमा अठ्ठावन साल कांग्रेस का शासन रहा है। अपने बलबूते पर मात्र दो साल भाजपा पहली बार सरकार में आई है। भारत यदि आज अंतरिक्ष में पतंगे उड़ा रहा है तो यह दो सालों की करामात का नतीजा नही है। देश के सामने खड़ी विकास के रूबरू सच्चाइयों को नकार कर भाजपा को अविश्‍वसनीयता के अलावा कुछ हासिल होने वाला नहीं है। राजनीति में सच को स्वीकारने का बड़प्पन नहीं होगा तो देश का लोकतंत्र हमेशा बीमार नजर आएगा…।  मोदी के पहले प्रधानमंत्री की फेहरिस्त में तेरह नाम दर्ज हैं। मोदी चौदहवें भारत के प्रधानमंत्री हैं, जो प्राणपण से देश की सेवा में जुटे हैं। इस ऐतिहासिकता को नकारना कभी भी मुनासिब नहीं माना जाएगा।

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