संघ परिवार के छुटभैए समूह ज्यादा सक्रिय हो गए…

 गुजरात के दलित आंदोलन के प्रमुख किरदार जिग्नेश मेवाणी से बातचीत

गुजरात में चल रहे मौजूदा दलित आंदोलन को जिग्नेश मेवाणी ने एक शक्ल और एक दिशा दी है। भले ही वे इसके अकेले नेता नहीं हैं, लेकिन वे इस आंदोलन का चेहरा और दिमाग दोनों हैं। मौजूदा आंदोलन की रीढ़ उना दलित अत्याचार लड़त समिति उन्हीं की पहल पर बनी और वे इसके संयोजक हैं। 35 वर्षीय जिग्नेश एक वकील, आरटीआई कार्यकर्ता और दलित अधिकार कार्यकर्ता रहे हैं। राज्य में वे दलितों के जमीन पर अधिकार के मुद्दों पर अथक लड़ाई लड़ने वाले एक कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं। स्वतंत्र पत्रकार सुरभि वाया ने जिग्नेश मेवाणी से यह बातचीत 4 अगस्त को की थी और अंग्रेजी में यह कारवां पत्रिका में प्रकाशित हुआ। हाशिया पर ब्‍लॉग के लिए रियाज उल हक द्वारा किए गए इस साक्षात्‍कार के सम्‍पादित अंश को हम साभार प्रस्‍तुुत कर रहे हैं।

सुरभि वाया: उना की घटना में आपकी समझ से ऐसा क्या था जिसने इस विद्रोह की शुरुआत की? क्यों यह एक चिन्गारी बन गया?

जिग्नेश मेवाणी: जिस तरह उना की घटना का वीडियो वायरल हुआ, इसे व्हाट्सएप पर भेजा जा रहा था, जिसमें दिन दहाड़े सब देख सकते थे कि उना कस्बे में आप चार दलित नौजवानों को पीट रहे हैं, एक तरह से उनकी खाल उधेड़ रहे हैं…इसके बाद पूरे दलित समाज का आत्म सम्मान और इज्जत भी छीन लिया गया। आपने एक इंसान और एक समुदाय के आत्म सम्मान को दिन दहाड़े सबकी आंखों के सामने कुचल कर रख दिया। जिस तरह इसे मीडिया ने उठाया और एक राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया, उसने भी आंदोलन को मजबूती दी। लेकिन यह तो होना ही था।

सुरभि वाया: अब मोदी केंद्र में हैं, क्या इस वजह से गुजरात के हिंदू गिरोहों का चरित्र बदला है?

जिग्नेश मेवाणी: एक बड़ी सावधानी से सोची-समझी रणनीति के तहत संघ परिवार और भाजपा ने पूरे देश में दलितों के भगवाकरण की परियोजना शुरू की थी। उन्होंने गुजरात में भी इसको आजमाया। लेकिन मुख्यत: जन विरोधी, गरीब विरोधी गुजरात मॉडल में दलितों के लिए अपनी हार और अपने शोषण के अलावा और कुछ नहीं रखा था। एक ऐसा दौर था जब वे हिंदुत्व की विचारधारा के साथ चले गए थे, लेकिन वह दौर अब खत्म हो रहा है और वे अब इसको पहचान सकते हैं कि ये लोग असल में कैसे हैं। जब आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है और दूसरी तरफ वे “वाइब्रेंट” और “गोल्डेन गुजरात” जैसी बड़ी बड़ी बातों का जाप सुन रहे हैं। “सबका साथ सबका विकास” जैसी बातों के नारे लगाए जा रहे हैं, लेकिन इसमें लगता है कि दलित इससे बाहर हैं। इसलिए दलित भी इसको महसूस करने लगे हैं कि उनको इस गुजरात मॉडल में क्रूरता और हिंसा के अलावा और कुछ नहीं मिलने वाला है।

सुरभि वाया: आनंदीबेन पटेल और नरेंद्र मोदी सरकारों में आप क्या फर्क देख सकते हैं?

जिग्नेश मेवाणी: कोई फर्क नहीं है। मोदी हुकूमत के दौरान एससी, एसटी या ओबीसी के बीच जमीन बांटने के बजाए इसको अडाणी, अंबानी और एस्सार को दिया गया। आनंदीबेन ने भी यही मॉडल आगे बढ़ाया है। इसके अलावा, चूंकि मोदी दिल्ली पहुंच गए थे इसलिए आनंदीबेन की हुकूमत में एग्रीकल्चल लैंड सीलिंग एक्ट में भी फेर-बदल किया गया, जो भूमिहीनों को जमीन देने के प्रावधान वाला एक प्रगतिशील कानून था। इनमें से किसी भी हुकूमत ने जातीय हिंसा और दलित अधिकारों के मुद्दों पर कोई काम नहीं किया है।

सुरभि वाया: गुजरात में दलितों और दलित आंदोलनों के इतिहास पर कुछ कह सकेंगे?

जिग्नेश मेवाणी: 1980 के दशक में अनेक गैर दलित भी [दलित] आंदोलन का हिस्सा बने। दलित पैंथर्स का हमेशा ही एक बहुत रेडिकल, प्रगतिशील एजेंडा और घोषणापत्र था। दलित आंदोलन का यह एक पहलू है। इसकी वजह से एक जुझारू मानसिकता विकसित हुई – मतलब अगर रूढ़िवादी उनसे अच्छे से पेश नहीं आए तो फिर हिंसक प्रतिक्रिया होगी। संदेश साफ था, कि वे अपने अधिकारों के लिए अथक रूप से लड़ सकते हैं। [दलित पैंथर] के घोषणापत्र में दिए गए कार्यक्रम में मजदूर संघ बनाने, बुनियादी अधिकारों के लिए लड़ने, जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ लड़ने जैसी बातें शामिल थीं। लेकिन ये साकार नहीं हो सकीं। सिर्फ घोषणापत्र का नाम बदल दिया गया।

दूसरी तरफ गुजरात में बहुत थोड़ी प्रगतिशील ताकतें रही हैं जो दलितों की स्वाभाविक सहयोगी बन सकती थीं। इसके साथ साथ जब वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियां आईं तो पहचान की राजनीति भी एक बड़ा फैक्टर बनी। भारत भर में दलित आंदोलन इस राजनीति की गिरफ्त में आ गए। 1990 के दशक के बाद दलित आंदोलन जातिवाद से लड़ने, मनुवाद मुर्दाबाद की जुमलेबाजी में फंस गया और इसने इन मुद्दों को नहीं उठाया कि दलितों के पास रोटी, छत और घर जैसी बुनियादी चीजें हासिल हों। हमेशा ही ऐसे संगठन, लोग और संस्थान रहे हैं जिन्होंने दलितों के मुद्दों को उठाया, खास कर अत्याचारों और जमीन के संघर्ष को उठाया। लेकिन एक ऐसा मंच अभी बनना बाकी है जो इन सभी विचारों को एक साथ ला सके और मुद्दों के सामने रख सके।

गुजरात में जहां तक दलित आंदोलनों की बात है पिछले दो या तीन दशकों में मैं बस यही देख सकता हूं कि ऐसे लोग हैं जो काम करना चाहते हैं और अच्छा काम कर रहे हैं। ऐसा जज्बा है कि अन्याय को रोकने के लिए काम किया जाए, लेकिन इसके लिए मिलजुल कर एक वैचारिक नजरिया नहीं बनाया जा सका और जमीन पर काम करने वाले लोग दीर्घ कालिक बदलाव लाने के लिए दूसरों के साथ एकजुट नहीं हो सके। इसलिए एक बड़े दलित आंदोलन के खड़े होने की जो उम्मीद थी वो पूरी नहीं हो सकी।

दूसरी तरफ पहचान की राजनीति की वजह से, खास कर मोदी की हुकूमत के दौरान, एक तरफ तो उनका एजेंडा सांप्रदायिक फासीवाद का एडेंडा था और दूसरी तरफ यह वैश्वीकरण का एजेंडा है: भौतिक विरोधाभास बढ़े हैं, गरीबों और अमीरों के बीच गैरबराबरी बढ़ी है, निचली जातियों, निचले वर्गों को काफी भुगतना पड़ा है।

उना का मुद्दा इतना बड़ा क्यों बन गया? इसलिए क्योंकि इसके लिए अब इंतजार नहीं करना था कि पानी के सिर के ऊपर बहेगा। ऐसा होना ही था, क्योंकि गुजरात में ज्यादातर दलित भूमिहीन हैं। यहां गहरा खेतिहर संकट है। ग्रामीण इलाकों में दलित वर्ग का भारी शोषण होता रहा है। शहरों में रहने वाला दलित मुख्यत: औद्योगिक मजदूर है, निजी कंपनियों के लिए काम करता है…

सुरभि वाया: दलित-मुसलमान एकता के हालिया आह्वान पर आप क्या सोचते हैं?

जिग्नेश मेवाणी: यह सचमुच, सचमुच एक अच्छी बात है। मैंने मुकुल सिन्हा और निर्झरी सिन्हा के साथ करीब 8 बरसों तक काम किया है। [मुकुल सिन्हा एक जाने माने एक्टिविस्ट और मानवाधिकार वकील थे। वो और उनकी पत्नी निर्झरी सिन्हा गुजरात में मोदी सरकार के मुखर विरोधी थे। निर्झरी अभी जन संघर्ष मंच चलाती हैं, जो उन्होंने शुरू किया था]। मैंने 2002 दंगों के बाद होने वाली घटनाओं पर नजर रखी है और मैंने राज्य में मुठभेड़ों में की जानेवाली हत्याओं में अमित शाह और नरेंद्र मोदी की भूमिका पर भी नजर रखी है। इन मुद्दों से मेरा सरोकार ठीक उन्हीं वजहों से था और मैं उन मुद्दों में पड़ा, जिन वजहों से मैंने दलित अधिकारों के लिए काम शुरू किया। इसलिए मैं हमेशा ही चाहता रहा हूं कि एक दलित-मुसलमान एकता का आह्वान किया जाना चाहिए, कि उन्हें एक मंच पर लाया जाना चाहिए। आने वाले दिनों में इन दोनों समूहों को एकजुट करने के लिए ज्यादा ठोस कदम उठाए जाएंगे।

सुरभि वाया: तो बाकी के देश में हिंदू गिरोहों के सिलसिले में जो हो रहा है उसमें और गुजरात के हालात में आप संबंध और फर्क देखते हैं?

जिग्नेश मेवाणी: जबसे मोदी केंद्र में गए हैं, संघ परिवार के छुटभैए समूह ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट लूट और हिंदुत्व एजेंडा को आगे बढ़ाना उनकी [आनंदीबेन पटेल] सरकार का भी मुख्य मुद्दा रहा है। एक बड़ा फर्क यह रहा कि आनंदीबेन आतंक के उस राज को जारी नहीं रख सकीं।

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