सुरेश बाफना का नजरिया : भाजपा की गाय-राजनीति

गौहत्या के नाम पर दलितों व मुस्लिमों पर तथाकथित गौरक्षकों द्वारा हमले की खबरों का सिलसिला थम नहीं रहा है। संसद व अखबारों में भी यह मुद्‍दा बड़े पैमाने पर उठाया जा रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस विषय पर अभी तक खामोश रहना ही बेहतर समझा है। उत्तर प्रदेश के दादरी में गौमांस रखने पर गौरक्षकों द्वारा मोहम्मद इखलाक की हत्या पर भी प्रधानमंत्री खामोश रहे थे। अब गुजरात में चार दलित युवकों को सरेआम कोड़े मारे जाने की घटना पर भी प्रधानमंत्री व भाजपा की खामोशी हर उस व्यक्ति को परेशान कर रही है, जो देश के संविधान व कानून के शासन में विश्वास करता है। मध्य प्रदेश के मंदसौर में दो मुस्लिम महिलाअों की गौरक्षकों ने यह आरोप लगाकर पिटाई कर दी कि वे गौमांस ले जा रही थीं। बाद में मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से स्पष्ट किया गया कि मुस्लिम महिलाअों के पास से भैंसे का मांस मिला था, जिस पर प्रतिबंध नहीं है। इस संबंध गौरक्षकों की तरफ से कहा गया कि यदि मांस ले जानेवाले पुरुष होते तो उनको मार दिया जाता। संसद में मोदी सरकार के एक मंत्री द्वारा कहा गया कि गौरक्षक दल सामाजिक संगठन है और उन्हें कोई भी कार्रवाई करने के पहले यह जांचना चाहिए कि अफवाह सही है या गलत है? इसका सीधा अर्थ यह है कि मोदी सरकार गौरक्षकों द्वारा की जा रही कार्रवाई को गलत नहीं मानती है।

मध्य प्रदेश में गौहत्या कानूनन अपराध है, लेकिन यह अपराध करनेवाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार केवल पुलिस व प्रशासनिक एजेन्सियों को है। गुजरात व मध्य प्रदेश की ताजा घटनाएं इस बात का प्रमाण है कि गौहत्या से जुड़े कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी गौरक्षक समितियों के हाथ में सौंप दी गई है। यह कहना गलत नहीं होगा कि गैर-सरकारी संस्थाअों को इस तरह का अधिकार देकर भाजपा सरकारें अपनी संस्थागत शक्ति को खत्म कर रही हैं। मोदी सरकार में हाल ही शामिल हुए सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री रामदास आठवाले ने सवाल किया है कि अगर आप गौरक्षा करेंगे तो मानव की रक्षा कौन करेगा? आठवाले महाराष्ट्र की रिपब्लिकन पार्टी के अध्यक्ष हैं। उन्होंने दलितों से कहा है कि वे हिन्दू धर्म छोड़कर बुद्ध धर्म को अपनाए। मोदी सरकार का एक मंत्री यदि इस तरह के बयान दे रहा है तो संविधान की पुस्तक को अपने सिर पर रखनेवाले प्रधानमंत्री की चिन्ता कई गुना बढ़ जानी चाहिए। आठवाले के बयान का अर्थ यह है कि दलितों के संदर्भ में देश की ताजा स्थिति लगभग वैसी ही है, जब 1956 में डा. भीमराव आंबेडकर ने हिन्दू धर्म छोड़कर बुद्ध धर्म स्वीकार किया था। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के सदंर्भ में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दलित समुदाय के एक हिस्से को पार्टी के साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। वही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी डा. आंबेडकर की विरासत को अपनाकर दलित समुदाय से नाता जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। भाजपा की परेशानी यह है कि वह हिन्दू समाज को राजनीतिक तौर पर एकजुट करना चाहती है और दूसरी तरफ वर्ण-आधारित जाति व्यवस्था को खत्म करने के सवाल पर पूरी तरह खामोश है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि गौरक्षा से जुड़े संगठनों का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व भाजपा से सीधा रिश्ता है। इसलिए यदि ये संगठन कानून को अपने हाथ में लेते हैं तो संघ व भाजपा अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते हैं। ऐसे संवेदनशील मुद्‍दे पर प्रधानमंत्री की खामोशी से देश में यही संदेश जाता है कि देश में संविधान की बजाय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निर्देशों को तरजीह दी जा रही है।

संविधान सभा में गौहत्या के सवाल पर विस्तार से बहस हुई थी और उसमें डा. आंबेडकर के निर्देशन में इस गुत्थी को बेहतर ढंग से सुलझा लिया गया था। कई सदस्यों ने यह प्रस्ताव किया था कि पूरे देश में गौहत्या पर प्रतिबंध लगाया जाए। मुस्लिम समुदाय के कुछ सदस्य चाहते थे कि संविधान में इस बात का उल्लेख किया जाए कि हिन्दू धर्म की भावनाअों को ध्यान में रखते हुए गौहत्या पर प्रतिबंध का प्रावधान स्वीकार किया गया है। यदि ऐसा होता तो अन्य धर्मों की भावनाअों का पिटारा खुलने का खतरा था। संविधान के मूल अधिकारों की बजाय दिशा-निर्देशों की सूची में गौहत्या का जिक्र किया गया। दिशा-निर्देश में कहा गया कि कृषि अर्थव्यवस्था में गाय की महत्ता को देखते हुए गौहत्या पर रोक लगाई जाए। गौहत्या पर प्रतिबंध लगाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ दी गई। 1966 में कई संगठनों ने गौहत्या पर राष्ट्र व्यापी प्रतिबंध लगाने के लिए दिल्ली में प्रदर्शन किया जिसमें 8 लोग पुलिस की गोली से मारे गए थे। भारतीय जनसंघ से जुड़े लोग बड़ी संख्या में इस आंदोलन में शामिल थे। गौहत्या अब धार्मिक संवेदनशीलता का नहीं, बल्कि एक राजनीतिक मुद्‍दा बन गया है, जिसके आधार पर हिन्दू वोट बैंक मजबूत करने की कोशिश की जा रही है। गौरक्षकों को यह बताना जरुरी है कि गुजरात से बड़े पैमाने पर अच्छी नस्ल की गायों का निर्यात ब्राजील किया जा रहा है, जहां इन गायों का मांस काफी लोकप्रिय है। गाय व पशुओं से लगभग एक लाख करोड़ रुपए का उद्योग जुड़ा हुआ है, क्या सरकार इस उद्योग की जरुरतों व इसमें काम करनेवाले लोगों के हितों को नजरअंदाज करेंगी?  हिन्दुअों के पूज्य माने-जानेवाले वीर सावरकर ने कहा था कि गाय एक उपयोगी पशु है, ‍लेकिन जब वह मनुष्यों के लिए ‍उपयोगी न रहे तो उसे मारने में कोई परेशानी नहीं है। उनका यह भी कहना था कि गाय को केवल पूजा की वस्तु नहीं बनाना चाहिए। 1966 के बाद पहली बार देश को गौहत्या के सवाल पर बड़े पैमाने पर हिंसक घटनाओं का सामना करना पड़ रहा है। इस मुद्‍दे पर यदि मोदी सरकार की खामोशी नहीं टूटी तो उनका विकास का ऐजेंडा हिंसा व प्रतिहिंसा की आग में झुलस सकता है।

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