अनजानी प्यास के पीछे

मन्नू भंडारी
साहित्य जगत को बरसों से महका रहे हैं दीपा की रुमानियत से सराबोर रजनीगंधा फूल। दीपा, मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ की नायिका। इस कहानी पर विद्या सिन्हा, आमोल पालेकर और दिनेश ठाकुर को लेकर 1974 में ‘रजनीगंधा’ नाम से फिल्म भी बनायी गयी थी, जिसे फिल्म फेअर अवार्ड से नवाज़ा गया था।

कहानी डायरी विधा में है। और इस डायरी के हर लफ्ज़ में है नायिका दीपा का धड़कता दिल, प्रेम सागर में गोते लगाता, मगर साथ ही गहरी कशमकश ‘किसको मीत बनाऊं, किसकी प्रीत भुलाऊं’? दीपा की डायरी के पन्नों पर भ्रमजाल का जो ताना-बाना है, यही तो मेरे-आपके, हम सबके मन की सच्चाई है। इस अंतर्द्वंद्व से दरअसल हर युवक या युवती अपनी जिंदगी में कभी न कभी रूबरू होते हैं। एक से प्रेम, मगर दूसरे के प्रति भी आकर्षण। जो हासिल है, उसमें कमियां निकालता है मन और जो नाहासिल, उसको पाने के लिए धड़कता है। ‘मिल जाए तो मिट्टी, खो जाए तो सोना’। और चंचल मन सीमा रेखाओं को कहां जानता है और ‘अनजानी प्यास के पीछे, अनजानी आस के पीछे, दौड़ने लगता है’।

चाहे-अनचाहे जिंदगी में दीपा का राब्ता भी दो पुरुषों से होता है (कॉलेज टाइम में निशीथ से और बाद में संजय से)। पहला प्यार 18 साल की कच्ची उम्र का और दूसरा पहले प्यार में चोट खाकर परिपक्व हो चुकी युवती का। लेकिन यही मैच्योर, डाक्टरेट कर रही परिपक्व युवती जीवन के मोड़ पर (कोलकाता के कॉफी हाउस में) जब फिर से पहले प्यार से मिलती है तो भावनाओं के समंदर में क्यों बहती चली जाती है। क्या मन के किसी कोनेे में दबी पड़ीं पहले प्यार की नन्ही कोंपलें फिर फूट पड़ती हैं। देखें एक डायलॉग : हवा के झोंके से मेरी रेशमी साड़ी का पल्लू उसके (निशीथ के) समूचे बदन को स्पर्श करता हुआ उसकी गोदी में पड़कर फरफराता है। वह उसे हटाता नहीं है। मुझे लगता है, यह रेशमी, सुवासित पल्लू उसके तन-मन को रस से भिगो रहा है। ….जितनी द्रुतगति से टैक्सी चली जा रही है, मुझे लगता है, उतनी ही द्रुतगति से मैं भी बही जा रही हूँ, अनुचित, अवांछित दिशाओं की ओर।

निशीथ का मन तरंगित-पुलकित होता है, ये तो पता नहीं, लेकिन दीपा जरूर मन ही मन ताना-बाना बुनने में उलझी रहती है। उसे समझ नहीं आता, जीवन के इस मोड़ पर वह किसका चुनाव करे-संजय या निशीथ, निशीथ या संजय। संजय (निशीथ के संबंध तोड़ लेने पर वही उसे सहारा देता है) जिसे पाकर उसके आंसू हंसी में और आहें किलकारियों में बदल गयीं, जिसके प्रेम में वह निशीथ तो क्या, खुद को भी भूल चुकी थी। देखें एक डायलॉग : संजय, क्या मैं तुम्हारे आगे, तुम्हारी हर उचित-अनुचित चेष्टा के आगे, यों आत्मसमर्पण करती? तुम्हारे चुम्बनों और आलिंगनों में अपने को यों बिखरने देती? जानते हो, विवाह से पहले कोई भी लड़की किसी को इन सबका अधिकार नहीं देती। पर मैंने दिया। क्या केवल इसीलिए नहीं कि मैं तुम्हें प्यार करती हूँ, बहुत-बहुत प्यार करती हूँ? विश्वास करो संजय, तुम्हारा-मेरा प्यार ही सच है। निशीथ का प्यार तो मात्र छल था, भ्रम था, झूठ था’ ‘फिर निशीथ को सामने पाकर वह संजय ‘प्रियतम’ से ‘पूरक’ क्योंकर हो जाता है। देखें एक डायलॉग : मैं उसे (संजय को) सारी बात समझा दूंगी। कहूंगी, संजय जिस सम्बन्ध को टूटा हुआ जानकर मैं भूल चुकी थी, उसकी जड़ें हृदय की किन अतल गहराइयों में जमी हुई थीं, इसका अहसास कलकत्ता में निशीथ से मिलकर हुआ। सच मानना संजय, ढाई साल मैं स्वयं भ्रम में थी और तुम्हें भी भ्रम में डाल रखा था; पर आज भ्रम के, छलना के सारे ही जाल छिन्न-भिन्न हो गए हैं। मैं आज भी निशीथ को प्यार करती हूं’।

दुविधा, भ्रमजाल, कशमकश का कहीं अंत ही नहीं। गाहे-बगाहे वह दोनों को तोलती है एक ही तराजू के दो पलड़ों में। बिना यह सोचे कि दो अलग-अलग व्यक्तित्वों का प्रेम भी तो अलहदा ही होगा। जो एक है, वह दूसरा नहीं हो सकता। जो दूसरा है, वह पहला कैसे बन सकता है? पर दीपा के मन का भटकाव इन बातों को नहीं जानता, या शायद नहीं जानना चाहता। तभी तो जब तक वह संजय के प्रेम की गिरफ्त में जकड़ी होती है, अपने पहले प्यार निशीथ से ‘नफरत’ करती है, मगर निशीथ के सामने पड़ने पर वह चुंबक की तरह उसकी ओर खिंची चली जाती है। ये तो भला हो निशीथ का जो आत्मीयता के पलों में भी बुत बना बैठा रहता है और वह क्षण अनकहे, अनबुझे ही बीत जाते हैं। और रह जाती है अंतर्द्वंद्वों में फंसी दीपा।

मन्नू की चित्रित इस नायिका के मन के ये भाव कितने सहज हैं। अनुरागी मन कभी किसी के बंधन में बंधने के लिए छटपटाता है, बंध जाने पर मुक्त विचरण चाहता है। प्रेम दरअसल है ही ऐसी अनबुझ पहेली, लेकिन यही पहेली सच है जीवन का। दीपा भी भावनाओं के मामले में सच्ची-सुच्ची है। वह मन के भावों को झुठलाती नहीं। एक से प्रेम के बावजूद मन दूसरे के लिए छटपटाता है तो उसे इन भावनाओं के लिए अपराध-बोध नहीं है। वह अपने हर प्रेम, अपनी हर भावना के लिए खुद जवाबदेह है। 60-70 के दशक में कितना साहसी किरदार रच डाला मन्नू भंडारी ने। अपनी भावनाओं को लेकर किसी प्रकार का अपराधबोध न होना साहस का ही तो नमूना है। शायद आज भी बहुत सी लड़कियां यह हिम्मत, यह साफगोई नहीं दिखा पाती होंगी। दरअसल दीपा आकांक्षाओं का दमन करने वाली कुंठित नायिका नहीं। इसीलिए साहित्य की वीथियों में आज भी जिंदा है यह किरदार।

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