अनुराग बेहार का नजरिया : पढ़ाई पर निर्णय का अधिकार सरकार के पास ही क्यों है?

(लेखक अज़ीम प्रेमजी फाउण्डे शन के सीईओ तथा अज़ीम प्रेमजी विश्वयविद्यालय के वॉइस चांसलर हैं।)

क्या है जिसे हम पढ़ाएं, सिखाएं, खोजे जाने योग्य कहें ? यह किसी भी शिक्षा व्यवस्था और संस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। किसी भी तरह इसका निर्णय तो हो ही जाता है और यह केवल आज के लिए नहीं बल्कि पिछले हज़ारों साल से ऐसा ही होता आया है। शिक्षा के इतिहास पर नज़र डालें तो पाएंगे कि इस में धार्मिक संस्थाओं की केन्द्रीय भूमिका रही है। चर्च, मुस्लिम धर्माधिकारी आदि। और भी पहले की बात करें तो बौद्ध संघ इतिहास में शिक्षा के मुख्य हितधारक रहे हैं। इसलिए क्या सिखाया और सीखा जाना है, क्या खोजा-जांचा जाना है, धर्मशास्त्रीय प्राथमिकताओं से तय होता था।.
व्यवहार में, यह कई तरह की संस्थाओं के रूप में सामने आया। नालन्दा और तक्षशिला ऐसे ज्ञान के केन्द्र थे जहां अध्ययन-क्षेत्र पूरी तरह से बौद्ध महत्व के नहीं थे बल्कि बहुत व्यापकता, भिन्नता के प्रति खुलेपन तथा उदार मानसिकता से निर्धारित थे। दूसरी ओर पिछली सहस्राब्दी के मध्य में मध्य-पूर्व के मदरसे अधिकतर धार्मिक अध्ययन पर केन्द्रित थे। चलिए,वर्तमान में आएं और स्वयं से यह सवाल करें – हमारे स्कूलों-कॉलेजों में अध्ययन का विषय क्या हो, इस बात को हम कैसे तय करें? जवाब इतना स्वाभाविक और स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह सवाल पूछे जाने लायक ही नहीं लगता। साफ़ लगता है कि सरकार किसी न किसी तरह इस मुद्दे को हाथ में लेती ही है। यह भी स्वाभाविक सा ही लगता है कि सरकार इस बारे में मनमाने ढंग से निर्णय नहीं लेती बल्कि यह सुलझे हुए कुछ लोगों के समूह के माध्यम से किया जाता है जो इस के लिए कोई न कोई विचारशील प्रक्रिया ही अपनाता होगा।
मगर गहराई में जाएं तो यह अधिक जटिल होता जाता है – और अधिक चकरा देने वाला भी। यह समझ पाना तो अपने आप से बहुत कठिन नहीं है कि, समझदार लोगों के इस समूह द्वारा किस प्रकार तय किया जाता है कि “भौतिक विज्ञान पढ़ा जाए या नहीं”;लेकिन यह समझ पाना अधिक कठिन है कि इस नतीजे पर कैसे पहुंचा जाता है कि जीव-विज्ञान पढ़ना बढ़ईगिरी सीखने से अधिक महत्वपूर्ण है – या एक और उदाहरण लें, कि गणित के मुकाबले भाषाओं के अध्ययन को कितना महत्व दिया जाना चाहिए। अगले स्तर के विश्लेषण में जाने पर स्थिति और जटिल हो जाती है – भूगोल में अधिक ध्यान भौतिक भूगोल पर दिया जाए या सामाजिक भूगोल पर और फिर उसमें भी किन विषयों को कितनी बारीकी से लिया जाए।
स्पष्ट है कि पहली नज़र में एक सादा-साधारण सा लगनेवाला सवाल असल में कितनी जटिलताएं लिए हुए है। लेकिन हम इस तथ्य के चलते सहज महसूस कर सकते हैं कि विवेकशील लोगों के जिस समूह के ज़िम्मे यह काम लगा हुआ है, वह इसे समझदारी के साथ कर ही लेगा। इन लोगों का चयन इसी लिए तो किया गया होगा कि वे इस प्रकार के मुद्दों को अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन हम यह भी न भूलें कि इन लोगों का चयन सरकार द्वारा किया गया था। हमें यह सवाल भी उठाना होगा कि यह निर्णय लेने का अधिकार सरकार के पास ही क्यों है?
जवाब स्पष्ट ही है। शिक्षा सामाजिक कल्याण का महत्वपूर्ण क्षेत्र है, व्यक्तियों और समाज के विकास का एक माध्यम है – इसलिए शिक्षा से सम्बद्ध निर्णय व्यापक, वृहत्तर सामाजिक इच्छा और चाह से तय होने चाहिए और इन निर्णयों में सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सरोकार का भी ध्यान रहे। सरकार इस सामाजिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है। इस के साथ ही राज्य के कार्य करने की भी एक परिभाषित प्रक्रिया होती है – मसलन, कौन से मुद्दे कार्यपालिका द्वारा तय होंगे और कौन से विधायिका द्वारा। ज़ाहिर है कि मैं सरलीकरण कर रहा हूं, लग रहा होगा कि मैं बारीकियों को दरकिनार कर रहा हूं लेकिन ऐसा नहीं है कि इस मुद्दे की व्यापक प्रकृति हम से कहीं छूट रही हो।
अब एक अधिक विवादास्पद और कुतूहल पैदा करने वाले विचार पर ध्यान दें। विवेकशील और समझदार लोगों का यह समूह, जो जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार के मध्यस्थ के तौर पर काम करता है,अध्ययन के इस विषय पर क्या निर्णय लेगा कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई? कम से कम भारत में क्या यह हमारे लिए हैरत की बात है कि मानक स्कूली पाठ्यचर्या में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को दैवी रचना के तौर पर नहीं माना जाता? – बावजूद इसके कि देश में प्रचलित धारणा तो यही है।
तो अन्य कई मामलों की ही तरह इस मसले में भी मानव द्वारा अब तक हासिल किया गया अक्लमन्दी का भण्डार वर्तमान में प्रचलित ‘सामूहिक इच्छा और धारणा’ पर भारी पड़ता है तथा उसे नकारता और अस्वीकृत करता है।
वास्तव में,समाज के बारे में हमारी अभिव्यक्त कल्पना इस अस्वीकृति को वैधता प्रदान करती है। यह कल्पना हम ही निर्मित करते हैं और यह सब से प्रत्यक्ष, ठोस रूप में हमारे संविधान में चित्रित होती है। संविधान हमें धर्म-निरपेक्ष बनाता है और वैज्ञानिक मानसिकता पर बल देता है। और यहीं से इस अस्वीकृति को तथा कई अन्य अस्वीकृतियों को भी वैधता प्राप्त होती है। अच्छी बात यह है कि हम अपने देश में इस बात को सहजता से समझते हैं।
ऐसी ही स्थितियों से स्पष्ट होता है कि क्या पढ़ना है का चुनाव मूलत: बस अभी की किसी सामूहिक इच्छा से प्रेरित नहीं होता बल्कि यह समाज और उस में रहने वाले व्यक्तियों की हमारी कल्पना-दृष्टि के अनुरूप कुछ सुव्यवस्थित, लम्बे दौर में संचित विकल्पों से प्रेरित होता है। और यह चुनाव मानव जाति के पास इस समय मौजूद, आम सहमति से स्वीकृत तथा संचित ज्ञान-भण्डार से भी निकलता है। समझदार, लोगों का समूह आम तौर पर अच्छा ही काम करता है – हमारे मुल्क में भी उन्होंने ऐसा किया है। लेकिन एकाध बार उनकी बात को राज्य या उसी के किसी अंग द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है। यह अस्वीकार हमारे संवैधानिक आदर्शों की सुरक्षा में हो तो वैध माना जाएगा। लेकिन यदि यह राजनीतिक उद्देश्य से हो तो इस की वैधता बहुत कम होती है – या नहीं ही होती। पिछले दिनों हमारे संविधान और उस के आदर्शों के संरक्षकों ने तय किया है कि एक पाठ्यपुस्तक से एक कार्टून को निकाल दिया जाए। बाद में पाठ्यचर्याओं में से सब कार्टून हटाने पर भी विचार हुआ। उनके द्वारा लिया गया यह निर्णय क्या संवैधानिक दृष्टि से वैध है – या हल्की लोकप्रियता के लिए, राजनीतिक कार्य सिद्धी नहीं है?

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