कार्टून के बहाने हकीकत से ‘सामना’

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राजनीति में दूसरों की खिल्ली उड़ाने वाली शिवसेना का पहली बार इतने तल्ख अंदाज में हकीकत से ‘सामना’ हो रहा है। वजह भी पार्टी का मुखपत्र ‘सामना’ ही है। इस अखबार में सोमवार को छपे एक विवादित कार्टून के बाद पूरे महाराष्ट्र में ‘सामना’ के दफ्तरों पर हमले हो रहे हैं, शिवसेना के नेताअों को अपना बचाव करना मुश्किल हो रहा है। शिवाजी महाराज को आदर्श मानने वाली शिवसेना को मराठा समाज ने ही मराठा विरोधी’ घोषित कर ‍िदया है। शिवसेना को समझ नहीं आ रहा कि वह क्या करे? यह बवाल तब मचा है, जब शिवसेना की रीढ़ समझे जाने वाली मुंबई महानगर पालिका में जल्द चुनाव होने हैं। पार्टी बार बार सफाई दे रही है कि उसका मकसद मराठाअों का मजाक उड़ाना नहीं था। लेकिन इसका कोई खास असर होता नहीं दिख रहा। उल्टे कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को आड़े हाथों  लिया है और भाजपा इस सबसे पल्ला झाड़ रही है।

पहले समझें कि यह कार्टून विवाद आखिर है क्या? महाराष्ट्र में इन दिनों मराठा क्षत्रिय समाज के लोग नौकरियों में  आरक्षण, राज्य के कोपर्डी में समाज की एक युवती के साथ बलात्कार के आरोपियों को फांसी देने और प्रदेश में एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट समाप्त करने की मांग कर रहे हैं। क्योंकि इस बलात्कार कांड में मुख्‍य आरोपी दलित है। आंदोलन के तहत पूरे महाराष्ट्र में मौन प्रदर्शन जिसे मराठी में ‘मूक मोर्चा’ कहा जाता है, किए जा रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह राज्य  की सत्ता में केंद्रीय भूमिका छिन जाने से नाराज मराठा समाज की कुंठा सामूहिक प्रदर्शन है। लेकिन राजनीतिक सत्ता के साथ इसमें बेरोजगारी और अन्य कई मुददे भी शामिल हो गए हैं। खास बात यह कि सारा आंदोलन गैर राजनीतिक मंच ‘मराठा क्रांति मंच’ के बैनर तले चलाया जा रहा है और इसमें लाखों की तादाद में मराठा समाज के लोग शामिल हो रहे हैं। यह राज्य की फडणवीस सरकार  के लिए भी खतरे की घंटी माना  जा रहा है।

इसी आंदोलन के बीच ‘सामना’ ने एक व्यंग्यचित्र प्रकाशित किया,  जिसमें मराठाअों  के ‘मूक मोर्चा’ को ‘मुका मोर्चा’ बताकर उसकी खिल्ली उड़ाई गई। मराठी में ‘मुका’ शब्द का अर्थ है चुबंन। कार्टून में एक प्रदर्शनकारी नेता को मोर्चे की अगुवाई  करती एक युवती का चुंबन लेते दिखाया गया है। यह इसलिए कि इस पूरे आंदोलन के सूत्र समाज की कुछ युवतियों के हाथ में हैं। इस कार्टून के छपते ही पूरे राज्य में संताप की लहर उठने लगी। कार्टूनिस्ट को घर से भागना पड़ा। सोशल मीडिया पर लोगों ने उद्धव ठाकरे और अन्य‍ शिवसेना  नेताअोंकी खूब खबर ली। यहां तक कहा गया कि पहले शिवसेना को पहले दलित नहीं चाहिए थे, फिर मुसलमानों को दुत्कारा गया और अब मराठों के साथ यही सलूक किया जा रहा है। एक ने कहा कि नफरत की राजनीति की यही नियति है।

वैसे शिवसेना मुखपत्र ‘सामना’ के दफ्तर पर हमला पहली बार नहीं हुआ है। दो साल पहले कांग्रेस नेता (और पूर्व शिवसेना नेता) नारायण राणे का साड़ी पहने कार्टून छापने पर उत्तेजित लोगों ने ‘सामना’ दफ्तर पर पत्थर फेंके थे। हालांकि तब  शिवसेना ने अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला दिया था। पहले भी ‘सामना’ में देश के कई शीर्ष नेताअों के ऐसे कार्टून भी छपते रहे हैं, जिसे देखकर कोई भी संयम खो सकता है। लेकिन शिवसेना की दबंगई के आगे लोग चुप ही रहे हैं। लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। कहने की स्वतंत्रता की दुहाई भी काम नहीं आ रही।

मुद्दा यह कि शिवसेना मूलत: असहिष्णुता की राजनीति करती रही है। अभी तक इसी आधार पर उसने मराठीभाषियों को गोलबंद किया हुआ था। लेकिन पहली दफा इस गोलबंदी की पर्तें उघड़ने लगी हैं। दूसरों की खिल्ली उड़ाना आसान है, लेकिन ‘सामना’ जब सच से हो तो सियासी शेर भी बकरी बनने लगते हैं।

 

 

 

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