नीरज से ‘दिल की हुंडी भुनाई’ गुलजार ने

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दर्द गर किसी का तेरे पास है/वो खुदा तेरे बहुत क़रीब है/

प्यार का जो रस नहीं है आँखों में/ कैसा हो अमीर तू गरीब है/

खाता और बही तो रे बहाना है/ चैक और सही तो रे बहाना है/

सच्ची साख मंडी में कमाने के लिए/

दिल की कोई हुंडी भी भुनानी चाहिए।

लिखने वाले संत कवि-गीतकार गोपालदास ‘नीरज’ से जब गुलजार साहब की मुलाकात हुई तो मानो यही पंक्तियां साकार हो रही थी। एक पाये का गीतकार जब दूसरे मुकम्‍मल गीतकार से मिला तो मानो उसने ‘दिल की हुंडी’ को ही भुनाया। इस मुलाकात में शब्‍द कम थे, लेकिन भाव,संस्‍कार, तहजीब और विस्‍तार अपार था। अगर गुलजार साहब के ही शब्‍दों में कहें तो उस कक्ष में बैठे चंद लोगों ने इन दिग्‍गजों की मुलाकात में ‘अहसासों की खुशबू’ को महसूस किया। गुलजार साहब ने लेखन की नई विधा ‘त्रिवेणी’ को इजाद किया। त्रिवेणी यानी तीन पंक्तियों की रचना जिसमें पहली दो पंक्तियों के अलग मुकम्‍मल मानी और यदि इसमें तीसरी पंक्ति आ मिले तो पूरा अर्थ उलट जाए। जैसे,

‘रोज उठ कर चांद टंगा है फलक पे रात को।

रोज दिन की रोशनी में रात तक आया किए।

हाथ भर के फासले को उम्र भर चलना पड़ा।।‘

गुलजार साहब की नीरजजी से मुलाकात कुछ त्रिवेणी की तरह थी। अपने आप में मुकम्‍मल दो शख्‍स, साहित्‍यकार, गीतकार। लेकिन जब मुलाकात की तीसरी पंक्ति जुड़ी तो मानी ही बदल गए। यूं तो उम्र में नीरज जी गुलजार साह‍ब से 9 साल बड़े हैं लेकिन फिल्‍म में गीत लेखन की दृष्टि से गुलजार साहब सीनियर है। उन्‍होंने अपना पहला गीत 1963 में आई फिल्‍म ‘बंदनी’ में लिखा था जब कि नीरज जी का पहला गीत 1966 में आई ‘नई उमर की नई फसल’ में लिया गया था। वरिष्‍ठता की इस उलझन और अपनी आमफहम पहचान के विपरीत गुलजार साहब नीरज जी से इस अदब से मिले जैसे एक पके फलों से लदा पेड़ धरती की ओर झुकता है।

मार्केटिंग के इस दौर में गुलजार साहब ने अपनी रचनाशीलता के लिए पूरी जगह बनाए रखी है। लेकिन उनके कार्य संसार में मार्केटिंग की भी‘स्‍पेस’ है, उतनी ही जितनी आवश्‍यक। वे दायरे में जीना पसंद करते हैं। इतना सख्‍त दायरा कि बिना उनकी इजाजत कोई हस्‍तक्षेप संभव ही नहीं। लफ्जों को नर्म मायने देने वाले, आम बोलचाल के बोलों को नया रूप-रंग देने वाले गुलजार साहब को सार्वजनिक जीवन में सख्‍त बर्ताव में देख लोग अचरज में पड़ जाते हैं। लेकिन सैन्‍य अनुशासन सा यह दायरा हमने आरुषि संस्‍थान के बच्‍चों के साथ उनके घुलने-मिलने के दौरान बार-बार टूटते देखा है।

मिजाज की यह सख्‍ती नीरज जी जैसे साहित्‍य ‘सूर्य’ के समीप मक्‍खन सी पिघलती रही। भोपाल की होटल के उस कमरे में मौजूद जिन चंद लोगों ने गुलजार साहब को नीरज जी के चरणों में झुकते देखा तो उन्‍होंने गुलजार साहब के कद को अपनी नजरों में और अधिक ऊंचा पाया। जबकि इससे उलट सूफियाना व्‍यक्तित्‍व के धनी नीरज जी निस्‍पृह भाव से बैठे रहे। उनका धीर-गंभीर स्‍वभाव मानो कह रहा था- ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे।’

असल में, गुलजार साहब और नीरज जी की यह दुर्लभ मुलाकात भोपाल में आयोजित हुए तीन दिनी ‘द ग्रेट इंडियन फिल्‍म एंड लिटरेचर फेस्टिवल’ (जीआईएफएलआईएफ) का हासिल था। उस कक्ष में मौजूद कला समीक्षक विनय उपाध्‍याय बताते हैं कि ऊंचे मकाम पर बैठे दो लोगों का यह मिलन भाव और विवेक के आदर्श मिलन जैसा था। बड़े कद के दो लेखकों की यह छोटी सी मुलाकात युवा पीढ़ी को विनम्रता में बड़प्‍पन तथा व्‍यवहार में गंभीरता का पाठ पढ़ा गई। दोनों के बीच संवाद औपचारिक सा था लेकिन भाव और आदर बहुत गहरा था। यह युवाओं को बता गया कि जब दो दिग्‍गज मिलते हैं तो उनका बर्ताव कैसा होना चाहिए। ठीक ऐसे ही इस आयोजन में हुए विभिन्‍न सत्रों ने भी फिल्‍मी दुनिया में कॅरियर बनाने के इच्‍छुक युवाओं के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।

इस आयोजन में युवाओं की सक्रिय उपस्थिति और उनके प्रश्‍नों व जिज्ञासाओं ने उन सतही धारणाओं को खारिज किया कि युवाओं की साहित्‍य में रुचि नहीं या वे केवल फेसबुक के लाइक और व्‍हाट्स अप के चुटकुलों तक सिमटे हैं। युवाओं ने अपने आदर्श व्‍यक्तियों से प्रश्‍न पूछे,जाना कि सिने संसार में वे बतौर लेखक क्‍या भूमिका निभा सकते हैं।

तंज में मिला पीयूष मिश्रा से सबक

आयोजन में युवाओं की अच्‍छी खासी उपस्थिति रही। उनकी पसंद और फिल्‍मों व गानों में हल्‍के शब्‍दों के प्रयोग पर गीतकार-रंगकर्मी पीयूष मिश्रा ने ‘बेबी को बेस पसंद है’ गाने की लोकप्रियता का जिक्र किया। इस पर जब युवाओं ने ठहाके मारे तो पीयूष ने व्‍यंग्‍य से कहा- ‘ऐसी ही प्रतिक्रिया गाने हिट करवाती है और हल्‍के शब्‍दों को जगह देती है।’ कुछ लोग तंज समझ कर चुप हो गए। अधिकांश को बाद में समझ आया कि पीयूष ने किस निराले अंदाज से अच्‍छे और हल्‍के शब्‍दों तथा उनके प्रयोग में अंतर का सबक सिखा दिया था।

समारोह के हासिल :

–    पहली बार गोपालदास नीरज, गुलजार, पीयूष मिश्रा, पवन वर्मा, अशोक शर्मा, पीकू और विकी डोनर जैसी फिल्में लिखने वालीं जूही चतुर्वेदी,डायरेक्टर प्रोड्यूसर प्रकाश झा, फिल्म निर्माता-निर्देशक सुधीर मिश्रा,निर्देशक राजशेखर, फिल्म लेखक अंजुम राजाबलि जैसे दिग्‍गज एक मंच पर आए। इस तरह फिल्‍मी दुनिया में अपने लेखन कौशल के आधार पर प्रवेश के इच्‍छुक युवाओं को एक राह दिखाई दी।

–    कवि लीलाधर मंडलोई ने सवाल उठाया कि क्‍यों पटकथा लेखन साहित्‍य की विधा नहीं बन पाया। उनके इस सवाल ने सिनेमा और साहित्‍य की जुगलबंदी के आयामों पर चर्चा के सुर तेज किए।

–    आयोजन की सहयोगी संस्‍था आईसेक्‍ट के कुलाधिपति संतोष चौबे ने कहा कि युवा रंगकर्मी और फिल्‍मकार के लिए सिने संसार में जगह ही कहां है? इस आयोजन ने युवाओं को एक पगडंडी दिखाई है लेकिन उन्‍हें पूरी संघर्ष क्षमता के साथ इस क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए।

आयोजन की कमियां :

–    जितना प्रचार किया गया था उतने युवा जुटे नहीं। आयोजन सहयोगी संस्‍कृति विभाग तथा आईसेक्‍ट की भूमिका भी पैनल चर्चा तक ही सीमित रही। आयोजन से कलाकारों, साहित्‍यकारों और युवा रंगकर्मियों की दूरी रही।

–    नीरज जी जैसे ऊंचे कद के गीतकार के साथ युवा रचनाकारों को मंच देने का प्रयास अच्‍छा था, लेकिन उनके साथ कविता पाठ करने वाले दो युवा कवियों के चयन में उत्‍कृष्‍टता को नजरअंदाज किया गया। कई श्रोताओं का मानना था कि स्‍थानीय स्‍तर पर कई युवा कवि नीरज जी के साथ मंच साझा करने वाले कवियों से अधिक श्रेष्ठ रचनाकर्म कर रहे हैं। उन्‍हें स्‍थान मिलना था।

–    कहा गया था जावेद अख्‍तर और राहत इंदौरी भी आयोजन में शिरकत करेंगे लेकिन उनके बारे में कोई सूचना नहीं दी गई। युवा इन दोनों शायरों को खोजते रहे। यहां तक कि स्‍वयं नीरज जी ने भी जावेद अख्‍तर के बारे में पूछा।

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