बिना इंजन की ट्रेन-सा होगा रेल बजट !

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रेल बजट का आम बजट में विलीन हो जाना, वैसा ही है कि जैसे अलग रह रही सास का बहू की जिद के आगे हथियार डाल देना। यानी कि जब इतना बड़ा घर है तो तुम बुढ़ापे में काहे अलग खिचड़ी पकाने में लगी हो। थकी सास अपनी आजादी की कीमत पर यह ‘मर्जर’ मान्य कर लेती है। जैसे कि ‘ऊर्जावान’ रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने किया। यूं किसी विभाग का बजट अलग से प्रस्तुत हो या फिर सजे दस्तरखान की तरह एक साथ पेश हो, यह तकनीकी मामला है। केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने भी भावहीन चेहरे से बजट एकीकरण के चंद फायदे गिनाए। दलील थी कि कई कमेटियों ने रेल बजट को खत्म करने की सिफारिश की थी। ताजा सिफारिश विवेक देबराॅय कमेटी की थी कि रेल बजट को ‘खास’ न मानकर आम बजट में ही मिला दिया जाए। फायदा यह कि तमाम अन्य विभागों के हर साल बढ़ने वाले टैक्सों के घटाटोप में रेल विभाग अपनी मरम्मत के लिए  भी भाड़ा भी मुश्किल से बढ़ा पाता था। अब यह झिझक भी खत्म होगी। खुशी की बात यह कि रेलवे को हर साल केन्द्र सरकार को ‍‍लाभांश के रूप में 9 हजार 700 करोड़ रू. देना पड़ते थे, वह भी देने नहीं पड़ेंगे। यानी नुकसान में भी नफा। रहा सवाल रेलवे की आजादी का तो रेल मंत्री सुरेश प्रभु की दलील है कि बजट एक होना घर के चूल्हे एक होने जैसा ही है। रेल स्वायतत्ता पर कोई असर नहीं होगा। वह जैसी चलती रही है, चलती रहेगी। केपिटल स्पेंडिंग के लिए बजट सपोर्ट मिलता रहेगा। बानवे साल बाद व्यवस्था में हो रहे बदलाव की यह सकारात्मक बानगी है।

इस देश में बैलगाड़ी के अलावा अगर किसी वाहन ने दिलों में जगह पाई तो वह है रेल। करीब पौने दो सौ सालों में रेल की विकास यात्रा हमारी संस्कृति और सभ्यता की प्रगति से एकाकार  रही है। रेल कहावतों से लेकर लोकगीतों में रची-बसी है। खास कर भाप से चलने वाली छुक-छुक रेल और उसका इंजन अभी भी यादों में उसी तरह धड़कता है। उसकी जगह बुलेट ट्रेन (चाहे वह कितनी तेज चले) शायद ही ले सके। रेल उनींदे भारत को जगाने का पहला सशक्त मशीनी माध्यम था। रेलें भारतीय समाज में रास्ते बनाती रहीं, लेकिन उसके अलग से बजट जैसी कोई चर्चा 1924 में सामने आई, जब विलियम एकवर्थ कमेटी ने तत्कालीन रेलवे के पुनर्गठन का सुझाव दिया। उसने रेल की अहमियत बढ़ाने के मकसद से उसके अलग बजट की सिफारिश की। क्योंकि समिति को पता था ‍िक रेल केवल एक बजट भर नहीं है। वह एक असमाप्त धड़कन है, जिसे अंगरेजों के बाद स्वतंत्र भारत की सरकारों ने इसे जारी रखा। लेकिन लगता है रेल अब ‘मामा के गांव का रास्ता’ भूल रही है। वह कौतुहल से बढ़कर कारपोरेट होने जा रही है। कारपोरेट का चेहरा भी आम बजट जैसा ही होता है। योजना, आंकड़ों, भार और छूट में पगा।

बहरहाल रेल बजट खत्म होने का लाभ यह है कि अगले साल से एक बजट भाषण कम सुनना पड़ेगा। किराया बढ़ने की धुकधुकी और नई गाड़ी शुरू होने का थ्रिल भी नहीं झेलना पड़ेगा। रेल बजट आएगा तो लेकिन बड़े भाई की बारात में नाचते देवर जैसा। वैसे भी रेल जब बुलेट हो जाएगी तो कोई दादाजी अपने नन्हें पोते को वो धुआं, वो सीटी वो धड़कन कहां से दिखाएंगे ? ना ही कोई स्टेशन मास्टर देर से आई पैसेंजर ट्रेन से उतरने वाली किसी मां जी, किसी बुआ या किसी चाचा से टिकट के साथ घर के हालचाल भी पूछ सकेगा। रेल बजट तो आएगा, लेकिन कोई सांसद घर आने वाली नई बहू की तरह नई ट्रेन की घोषणा का सदन में बेचैनी से इंतजार नहीं करेगा। यूं ट्रेने चलती रहेंगी, शायद ज्यादा सुविधा सम्पन्न और नए ‍सिग्नलों के साथ चलेंगी, लेकिन कोई  रेल मंत्री किसी ‘जादूगर’ सा महसूस नहीं होगा। हां, रेल बजट आएगा, लेकिन बेचेहरा।  जिसमें तेजी से भागते माॅडर्न कोच तो होंगे, चुनौतियों को चीर कर आगे भागता इंजन भर नहीं होगा।

 

 

 

 

 

 

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