मोदी में मनमोहन या मनमोहन में मोदी ?

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मोदी में मनमोहन दिखने लगा है या ‍मनमोहन में भी कोई मोदी छुपा था? यह सवाल इसलिए कि कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय‍सिंह ने अपने ताजा ट्वीट से नई बहस छेड़ दी है। कोझीकोड में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उड़ी हमले के संदर्भ मोदी में दिए गए भाषण के बाद दिग्विजय ने सोशल मीडिया की भावना को अभिव्यक्त करते हुए ट्वीट किया कि ‘बोया मोदी, निकला मनमोहन।‘ सुनने में यह पुरानी कहावत ‘ बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से होय’ का नया राजनीतिक संस्करण लगती है। या यूं कि जुमलों के पेड़ से नतीजों के फल की उम्मीद करना ज्यादती है।

दिग्विजय सिंह उन नेताअो में हैं, जो सोशल मीडिया का राजनीतिक इस्तेमाल बेहद मारक अंदाज में करते हैं, हालांकि कई बार यह मार बूमरेंग भी साबित होती है। लेकिन वे इसकी चिंता नहीं करते। आलोचनाअों से सियासी छेड़खानी की तासीर नहीं बदलती। इसीलिए सोशल मीडिया मीमांसक ट्वीट के कई अर्थ लगा रहे हैं। ट्वीट की गूढ़ता का आकलन इस एंगल से किया जा रहा है कि क्या इस में मोदी की तुलना मनमोहन से है या फिर मनमोहन की मोदी से? यह मोदी की आलोचना है अथवा मनमोहन की? मोदी के साथ मनमोहन पर भी सवाल है या मनमोहन से उन्हें मोदी होने की अपेक्षा थी?  दिग्विजयसिंह को मनमोहन से क्या उम्मीदें थीं, जो मोदी से उनका मोहभंग हुआ?

दिग्विजय के ट्वीट पर सियासी बवाल नई बात नहीं है। बल्कि वो ट्वीट करते ही ऐसे वक्त और मंशा से हैं कि उसे के छर्रे दूर तक उड़ें। भाजपा के राष्ट्रीय महा‍सचिव कैलाश विजयवर्गीय से उनका ट्वीट वाॅर चलता ही रहता है। हाल में उन्होने मप्र सरकार की इन्वेस्टर्स समिट को लेकर कैलाश पर निशाना साधा था। दिग्विजय ने समिट की कार्यकुशलता पर सवाल दागते हुए कहा था कि दुबई की एक कंपनी अभी भी निवेश के लिए मप्र की फाइलों की जंगल में भटक रही है। मामला तब का है, जब कैलाश राज्य के उद्दयोग मंत्री थे। जवाब में कैलाश ने ट्वीट कर सवाल किया कि आपके कार्यकाल में हुए एमअोयू का हश्र भी बता दीजिए। इसके पहले दिग्गी राजा जम्मू कश्मीर को ‘भारत अधिकृत कश्मीर’ कहके फंस चुके हैं। बाद में पार्टी को इस पर सफाई देनी पड़ी।

दिग्ंिजय के ताजा ट्वीट की बात करें तो ‘मोदी’ शब्द का भावार्थ हर दिन नई जुमले बाजी, बड़े दावे, दमदार भाषण, शेर सी बाॅडी लैंग्वेज और कुछ कर गुजरने का आभास देते रहना है। जबकि पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ मनमोहनसिंह से आशय अकादमिक योग्यता के बावजूद व्यवहार में एक अघोषित लाचारी, भावविहीन भाषण, अडिग निष्ठा से काम करते रहने के बाद भी ‘नरोवा कुंजरोवा’ सा असमंजस और स्थायी कृतज्ञ भाव है। अब सवाल यह कि ‍दिग्विजय, मनमोहन को मोदी से बेहतर बताना चाहते थे या मनमोहन को मोदी से भी कमतर बताने का इरादा था? एक यूजर ने उनके ट्वीट पर रि-ट्वीट किया  ‍िक ये मनमोहन की तारीफ है या मजाक ? मोदी पर ट्विटर हमला करते हुए दिग्विजयसिंह ने लिखा- ‘मोदी जी ने अपनी जबानी मिसाइलों से पाकिस्तान को तबाह कर दिया। जागो भक्तों जागो। मोदी बदल गए हैं।’ उन्होंने यह भी लिखा- मोदी ने केरल में पाकिस्तान को करारा जवाब 56 इंची सीने की  बजाए 56 इंची जबान वाले की तरह दिया।….देश बदले या न बदले मोदी बदल रहा है या बदल गया है। असल में मोदी हो या मनमोहन, जब ‘जवाब’ देने का वक्त आता है, हम प्रहार करने  के बजाए पहेलियां बुझाने लगते हैं। यही कथनी और करनी का अंतर है।  इसलिए बोया कुछ भी जाए, उगता वही है, जो उगता आया है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि प्रधानमंत्री मोदी हैं या मनमोहन?

 

 

 

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