मोदी से पहल छीनने की कोशिश है कांग्रेस का कूटनीतिक मसौदा

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पाकिस्तान के आतंकवादी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस राजनीतिक तथ्य को बेहतर समझ गए हैं कि जनता के बीच विश्वसनीयता को कायम रखने के लिए कुछ किये बिना गुजारा नहीं होगा। पुराने भाषणों का कसैलापन गटकने में मोदी ने गजब सहनशीलता दिखाई है। काबिले-तारीफ है कि सार्वजनिक उपहास के क्षणों का गरल पीने के बाद भी वे संयमित बने हुए हैं और उन राहों को तलाश रहे हैं, जो पाकिस्तान को कूटनीतिक-निर्वासन की ओर ढकेलने वाली हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के प्रभावी भाषण के बाद अब भारत की घरेलू राजनीति भी कुनमुनाने लगी है।

उड़ी-हादसे के बाद मोदी बेक-फुट पर हैं। लोग मानते हैं कि मोदी की भाषणबाजी का पानी अब उतर चुका है। विपक्षी इसे अवसर मानकर भुनाने की जुगत में लग गए हैं। पहली कोशिश कांग्रेस ने की है। खुद को भाजपा से सख्त दिखाने की होड़ में कांग्रेस एक समझदार कूटनीतिक-मसौदे के साथ सामने आई है। सोमवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की मीटिंग के बाद कांग्रेस ने मोदी-सरकार से लोकसभा का विशेष सत्र बुलाकर पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित करने की मांग की है। पाकिस्तान के सबसे तरजीही मुल्क के दर्जे को खत्म करके आर्थिक प्रतिबंध लगाने का सुझाव भी दिया है। कूटनीतिक घाव गहरे करने के लिए कांग्रेस ने बलूच नेता ब्राह्मादाग बुगती को राजनीतिक शरण देने के मामले पर गौर करने को कहा है। कांग्रेस की यह मांग भी कूटनीतिक-गलियारों में सनसनी फैलाने वाली है कि भारत में पाकिस्तान हाय-कमीशन का दर्जा कम किया जाए। कांग्रेस सिंधु-नदी समझौते की समीक्षा की पक्षधर है।

कांग्रेस का यह कूटनीतिक-मसौदा भाजपा के हाथों से पहल छीनने का राजनीतिक प्रयास है, जो उसकी अनुभवशीलता को दिखाता है कि शब्दों की नगाड़ेबाजी के बिना फंदा कैसे फेंका जाता है। कांग्रेस ने वो सारी मांगे कर डाली हैं, जो मोदी-सरकार के कूटनीतिक-एजेण्डे का हिस्सा हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की मीटिंग के बाद अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को बताया कि हमले के नौ दिन बाद भी मोदी-सरकार खामोश है और जवाबदेही से बच रही है। प्रधानमंत्री के भाषणों से आभास मिलता है कि मोदी-सरकार रणनीतिक-अस्पष्टता और भ्रमात्मक परिस्थितियों के चक्रव्यूह से निकल नहीं पा रही है। हम नहीं चाहते कि रणनीतिक मामलों में भ्रमित होने के कारण दुनिया में भारत जग-हंसाई का पात्र बने। कांग्रेस हमेशा से रणनीतिक-संयम की पक्षधर रही है। लेकिन रणनीतिक-संयम का यह मतलब भी नहीं है कि पाकिस्तान की उकसाने वाली कार्रवाइयों के रणनीतिक-प्रति उत्तर में खामोशी ओढ़ कर बैठ जाएं। भारत के लिए यह अनुकूल अवसर है कि जब सारी दुनिया में आतंकवाद के मसले में पाकिस्तान की बदनामी हो चुकी है, भारत लोकसभा का विशेष सत्र बुलाकर उसे आतंकवादी राष्ट्र घोषित कर दे।

अब यदि भाजपा लोकसभा का विशेष सत्र नहीं बुलाती है, तो यह आरोप लगेगा कि वो सबको साथ लेकर नहीं चलना चाहती है। वैसे प्रधानमंत्री मोदी ने राजनीतिक बुनावटों को भांपते हुए पाकिस्तान का मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा खत्म करने के बारे में विचार करने के लिए 30 सितम्बर को मीटिंग बुलाई है। भारत ने पाक को यह दर्जा 1996 में दिया था। 2012 के आंकड़ों के मुताबिक भारत 2.60 बिलियन डालर का वस्तु-व्यापार पाकिस्तान के साथ करता हैं। जबकि पाकिस्तान मात्र 50 लाख डालर का निर्यात करता है। दिलचस्प यह है कि भले ही पाकिस्तान को भारत ने फेवर्ड राष्ट्र का दर्जा दे रखा हो, लेकिन पाकिस्तान ने बार-बार भरोसा देने के बावजूद आज तक भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन की सूची में नहीं रखा है।                                                                                                                                     प्रधानमंत्री मोदी सिंधु नदी जल समझौते की समीक्षा कर चुके हैं। भारत घाटा उठाकर पाकिस्तान को पानी दे रहा है। सन्  2005 में इंटरनैशनल वॉटर मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट (आईडब्ल्यूएमआई) और टाटा वॉटर पॉलिसी प्रोग्राम (टीडब्ल्यूपीपी) भी अपनी रिपोर्ट में भारत को सिंधु जल संधि को रद्द करने की सलाह दे चुका है। इस जल संधि से केवल जम्मू-कश्मीर को ही हर साल 65000 करोड़ रुपए की हानि होती है। संधि के चलते घाटी में बिजली पैदा करने और खेती करने की संभावनों पर प्रतिकूल असर पड़ा है। घाटी में 20000 मेगावाट से भी ज़्यादा बिजली पैदा करने की क्षमता है, लेकिन सिधु जल संधि इस राह में रोड़ा बनी हुई है। 2002 में जम्मू-कश्मीर की विधान सभा आम राय से प्रस्ताव पारित कर सिंधु जल संधि को निरस्त करने की मांग कर चुकी है।

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