सियासी हसरतों का ‘स्लाॅटर हाउस’ !

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राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं एक  स्थानीय समस्या को  ‘राष्ट्रीय समस्या’ में कैसे बदल सकती हैं, इसे समझने भोपाल की ‘स्लाॅटर हाउस समस्या की स्टडी की जानी चाहिए। शहर की यह ‘स्लाॅटर हाउस कथा’ उस खजेले कुत्ते की माफिक है,  जिसे मोहल्ले वाले तो क्या, गली के कुत्ते भी अपने इलाके में देखना नहीं चाहते। फुटबाॅल की तरह यह बूचड़खाना कभी इस इलाके में खुलने जाता है तो कभी उस इलाके में। बूझना मुश्किल है कि चौतरफा विरोध के बाद भी नगर निगम के कर्ताधर्ता इसे शहर की अमानत क्यों बनाना चाहते हैं?  या तो उन्हें इसमें भी वोटों की संभावना नजर आ रही है या फिर वे  स्लाॅटर हाउस  को ‘आॅपेरा हाउस’ समझ रहे हैं।

शहर के जिंसी इलाके में बरसों से चल रहा पशु वध गृह जर्जर होने और बस्ती के बीच आ जाने के कारण कोर्ट ने उसे हटाने का आदेश दिया। चूंकि बूचड़खाने में जानवर काटे जाते हैं, इसलिए इसे कोई भी पसंद नहीं करता। पुराना हटे, लेकिन नया कहां बनें, इसको लेकर टांग खिंचाई जारी है। बताया जाता है कि नया स्लाॅटर हाउस अत्याधुनिक मशीनों से संचालित होगा और इसमें 1200 पशु रोज काटे जा सकेंगे। जबकि पुराने की हैसियत 60 जानवरों की ही थी। जब एनजीटी से भी अल्टीमेटम दे दिया तो प्रस्ताव बना कि इसे शहर के मुगालिया कोट इलाके में  शिफ्ट किया जाए। इस पर स्थानीय विधायक रामेश्वर शर्मा ने अड़ंगा लगा दिया। फिर नवाब के जमाने के स्टड फार्म में इसे ले जाने की योजना बनी। महापौर आलोक शर्मा को भी यह रास आई। ताबड़तोड़ तरीके से लैंड यूज बदलवाया गया। ‍िकसी जमाने में घोड़ों के लिए मशहूर यह जमीन अब किसकी किस्मत में है, कोई नहीं जानता। नवाब के कब्जे से खाली करवाकर इसमें हाउसिंग बोर्ड ने काॅलोनी बसाने की योजना बनाई। बाद में यह हरा भरा इलाका मंत्रियों की नजर में चढ़ गया।  ताबड़तोड़ नए बंगलों की योजना बनीं। भारी विरोध के बाद वह भी ठप हुई। सिलसिला घोड़ों से बूचड़खाने तक आ गया। इसकी हवा लगते ही आसपास के रहवासियों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया।

अब आलम यह कि स्लाॅटर हाउस भोपाल गैस कांड के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या बनता जा रहा है। इसके पीछे के खेल को न तो शहर के कसाई समझ पा रहे हैं और न ही वे तमाम जानवर, जिन्हें इस भावी बूचड़खाने में आखिरी सांस लेनी है। मजाक चल पड़ा है कि मोहल्ले वाले चोर-डाकुअोंसे ज्यादा इस बात से आशंकित हैं कि कहीं उनके इलाके में स्लाॅटर हाउस न खुल जाए।

यह सवाल भी अनबूझा है कि जब कोर्ट ने स्लाॅटर हाउस शहर की सरहद से बाहर ले जाने को कहा है तो फिर इसे विस्थापितों की तरह शहर की सीमा में ही पुनर्स्थापित करने की जिद क्यों है ? स्लाॅटर हाउस कोई दर्शनीय स्थल, मनोरंजन पार्क या चौपाटी तो है नहीं कि जो रिहाइशी इलाके में ही खुले। फिर भी  ऐसा करके नगर ‍निगम आखिर किसकी सुविधा देख रहा है? और फिर मामला अगर स्लाॅटर हाउस के सही सलामत पुनर्वास का भर होता तो भी दिक्कत नहीं थी। लोगों को इस खेल में सियासत की बू आ रही है। महापौर  इसे ‘सुविधा केन्द्र’ मान रहे हैं तो क्षेत्रीय विधायक ‘असुविधा केन्द्र’। डर यह भी है कि ‘स्लाॅटर हाउस’ की आड़ में शहर में विधायक पद का एक और दावेदार न खड़ा हो जाए। कत्लगाह के बहाने राजनीतिक संभावनाअोंका एडवांस कत्ल किसी को खुश भी कर सकता है। स्लाॅटर हाउस में तो पशुअों की बलि दी जाती है, लेकिन यहां तो नेताअों की राजनीतिक हसरतों की लड़ाई में स्लाॅटर हाउस की ही बलि चढ़ रही है। इसे कौन रोकेगा?

 

 

 

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