सुरेश बाफना का नजरिया : उप्र में भाजपा की चिन्ता है दलित-मुस्लिम एकता

भारतीय जनता पार्टी के नेता यह स्वीकार करते हैं कि उत्तर प्रदेश का चुनावी वातावरण 2014 की तरह बिल्कुल नहीं है, जब भाजपा ने लोकसभा की 73 सीटों पर विजय प्राप्त कर एक रिकार्ड बनाया था। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में उत्तर प्रदेश की निर्णायक भूमिका रही है। इसलिए भाजपा यह मानकर चल रही थी कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में विजय मिलना एक औपचारिकता मात्र ही है। लेकिन ढाई साल के अंतराल में गंगा व जमुना में इतना पानी बह गया है कि उत्तर प्रदेश का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह धुंधला हो गया है। कोई भी राजनीतिक पंडित सीधे तौर पर कोई भविष्यवाणी नहीं कर पा रहा है। चार महीने पहले यह मानकर चला जा रहा था कि उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व में बसपा की सरकार ही बनेगी। लेकिन असम में भाजपा की सरकार बनने के बाद यह कहा जाने लगा कि मुख्य मुकाबला सपा, बसपा व भाजपा के बीच होगा और कांग्रेस पार्टी एक बार फिर हाशिए की पार्टी बनी रहेगी। 2019 के लोकसभा चुनाव में यदि कांग्रेस पार्टी सत्ता के दावेदार के तौर पर उभरना चाहती है तो उत्तर प्रदेश में कम से कम 20 प्रतिशत वोट पाकर इतनी सीटें ‍जीतना जरुरी है कि अगली सरकार में उसकी भागीदारी हो या उसके समर्थन से बनें। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में सवा महीने की महायात्रा की शुरुआत करके अपनी राजनीतिक जिन्दगी का सबसे बड़ा दॅाव लगाया है। इसलिए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी के लिए करो या मरो की स्थिति है।

इसी तरह यदि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार नहीं बनती है तो यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की निजी पराजय होगी। पराजय का बुरा प्रभाव उनके शेष बचे दो साल के कार्यकाल पर निश्चित तौर पर पड़ेगा।वही समाजवादी पार्टी फिर से सरकार बनाकर प्रधानमंत्री पद के लिए मुलायम सिंह यादव की दावेदारी को बरकरार रखने की कोशिश करेगी। बसपा नेता मायावती पांचवीं बार मुख्यमंत्री पद पाने के लिए एक बार फिर दलित-मुस्लिम और ब्राह्म्ण समुदाय के वोटों पर दांव लगा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व कांग्रेस की मुख्यमंत्री पद की दावेदार शीला दीक्षित खुले तौर पर विकास को प्रमुख चुनावी मुद्‍दा मानते हैं, लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि लगभग सभी राजनीतिक दल जातिगत समीकरण बनाकर चुनावी जंग जीतना चाहते हैं। मायावती का ऐजेंडा दलित प्लस विकास और सपा के कथित गुंडा राज का खात्मा है। सपा, बसपा व कांग्रेस तीनों के निशाने पर मुस्लिम वोट भी है। भाजपा एक ऐसी पार्टी है जो मुस्लिम वोटों की कोई चिन्ता नहीं करती है। भाजपा नेताअों को लगता है कि यदि उन्होंने मुस्लिम समुदाय को अपने साथ लाने का विशेष प्रयास किया तो हिन्दू समुदाय नाराज हो जाएगा, जो उसका मुख्य जनाधार है। भाजपा की कोशिश यह होगी कि असम की तरह उत्तर प्रदेश में भी मुस्लिम समुदाय बसपा, सपा व कांग्रेस के बीच विभाजित हो जाए। मुस्लिम मतदाता यदि प्रदेश के स्तर पर एकजुट होकर सपा या बसपा के पक्ष में वोट करते हैं तो भाजपा की पराजय सुनिश्चित है। यह भी तय है कि मुस्लिम मतदाताअों के एकजुट होने की स्थिति में भाजपा अंतिम रणनीति के तौर पर हिन्दू कार्ड खेलेंगी। अनुभव यह बताता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व भाजपा के वरिष्ठ नेता चुनाव प्रचार के दौरान विकास का राग अलापते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व उससे जुड़े पचासों संगठन हिन्दू एकजुटता के नाम पर भाजपा के पक्ष में वातावरण निर्मित करने की कोशिश करते हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में तो भाजपा ने ही गोहत्या का मुद्‍दा उठाकर हिन्दू समुदाय की भावनाअों को अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास किया था।

अगले साल के आरम्भ में होनेवाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के संदर्भ में भाजपा की प्रमुख चिन्ता यह है कि दलित-मुस्लिम वोट मायावती की बसपा के पक्ष में एकजुट न हो जाए। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दलितों को भाजपा के साथ जोड़ने के लिए उत्तर प्रदेश में विशेष अभियान चलाया था, लेकिन हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमूला की आत्महत्या और गुजरात के उना में चार दलित युवकों की सवर्णों द्वारा सरेआम पिटाई ने भाजपा के इस अभियान पर पानी फेर दिया। गौरक्षा के नाम पर दलित व मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हुए हमलों ने भाजपा की मुश्किलों को कई गुना बढ़ा दिया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा यह उम्मीद कर रही थी कि मायावती के दलित वोट बैंक में सेंध लगाई जा सकती है, लेकिन अब दलित एक बार फिर बसपा के पक्ष में आक्रामक रूप से एकजुट होते दिखाई दे रहे हैं। हालत यह हो गई कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को आगरा में पूर्व-निर्धारित दलित सम्मेलन को रद्द करने के लिए विवश होना पड़ा।आज उत्तर प्रदेश की राजनीति सपा, बसपा व भाजपा के तीन प्रमुख ध्रुवों के बीच विभाजित हो गई है। 27 सालों से हाशिए पर खड़ी कांग्रेस प्रशांत किशोर के चुनाव प्रबंधन व राहुल गांधी के नेतृत्व के भरोसे अपने पुराने जनाधार को पाने की कोशिश कर रही है। राहुल ने किसानों की कर्ज माफी का वादा करके पुराने चुनावी नुस्खे को अपनाया है, जिसकी प्रभावशीलता अब संदिग्ध है। राहुल की तुलना में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की चुनावी रणनीति अधिक प्रभावी दिखाई दे रही है। अखिलेश का चुनावी एजेंडा उत्तर प्रदेश की युवा पीढ़ी की आशाअों व आंकाक्षाअों के अनुरूप है। भाजपा अपनी नई रणनीति के अनुसार सवर्ण जातियों के अलावा गैर-यादव पिछड़े वर्गों को अपने पक्ष में करने पर अधिक बल दे रही है। तीन प्रमुख दावेदार पार्टियों व कांग्रेस पार्टी की मौजूदगी ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह गड्‍ड-मड्‍ड कर दिया है। 28-30 प्रतिशत वोट पानेवाली पार्टी को भारी बहुमत मिल सकता है। ऐे‍सी स्थिति में पार्टियों द्वारा जाति व धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल करने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY