सुरेश बाफना का न‍जरिया : न्यायपालिका पवित्र गाय नहीं है

जो बात कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद संसद में नहीं कह पाए थे, वह बात अब सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश व कॅालेजियम के सदस्य जे. चेलामेस्वर ने खुलकर कह दी है। उनका कहना है कि ‘न्यायाधीश का चयन करनेवाले कॅालेजियम में बहुमत का गिरोह बन जाता है और न्यायधीशों के चयन की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। कॅालेजियम की बैठक में व्यक्त राय व तर्कों का कोई रिकार्ड नहीं होता है। केवल दो लोग नाम के तय करके आते हैं और अन्य सदस्यों को उस पर हाँ या ना कहना होता है। उचित आपत्तियों को दरकिनार कर दिया जाता है। न्यायाधीशों का चयन योग्यता के आधार पर नहीं होता है। यह उन गैर-चुने लोगों का नंबर गेम नहीं हो सकता है, जो किसी के प्रति जिम्मेदार नहीं है।‘ यही बात यदि कोई सामान्य व्यक्ति कहना तो निम्न अदालत में ही उस पर न्यायालय की अवमानना का मुकदमा चलता और कुछ दिनों के भीतर ही उसे जेल की हवा खानी पड़ती। न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर पिछले बीस सालों से न्यायपालिका और सरकार के बीच तनाव की स्थिति चल रही है। संविधान में कॅालेजियम व्यवस्था का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन न्यायपालिका ने सुप्रीम कोर्ट व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार अपने में समाहित कर एक नई व्यवस्था कायम कर दी। 1998 में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के निर्णय से यह व्यवस्था अस्तित्व में आई। कॅालेजियम की व्यवस्था निर्मित करनेवाले माननीय न्यायधीशों ने यह मान लिया कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में यदि कार्यपालिका की भूमिका निर्णायक होगी तो इससे न्याय प्रक्रिया पर बुरा असर पड़ेगा। कॅालेजियम की व्यवस्था के पहले कार्यपालिका द्वारा नियुक्त जजों की लंबी सूची पर नजर डालें, तो हम पाएंगे कि उसमें कई ऐसे न्यायाधीश हुए हैं, जिन्होंने न केवल भारत की न्याय प्रणाली बल्कि दुनिया के स्तर पर न्याय की अवधारणा को नई उँचाईयां प्रदान की है।

देश के संविधान निर्माताअों ने न्यायपालिका व कार्यपालिका के बीच रिश्तों को परिभाषित करते हुए इस बात का विशेष ध्यान रखा था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का किसी भी स्तर पर हनन न हो। आजादी के तुरंत बाद बननेवाली सरकारों ने न्यायाधीशों की नियुक्ति जैसे संवेदनशील सवाल पर न्यापालिका व कार्यपालिका के अधिकारों के बीच रचनात्मक संतुलन बनाया था। न्यायपालिका के साथ उचित विचार-विमर्श करके ही कार्यपालिका न्यायधीशों की नियुक्ति करती रही है। लेकिन 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लागू करने के बाद प्रतिबद्ध न्यायपालिका की अवधारणा अस्तित्व में आई, जिसने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को पूरी तरह नेस्तनाबूत कर दिया था। तब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एच. आर. खन्ना को छोड़कर अन्य सभी न्यायाधीशों ने सत्ताधारी दल के एजेंडे को अपनाकर न्यायपालिका की स्तंत्रता को नुकसान पहुंचाया था। इस एक घटना के आधार पर भविष्य की सभी सरकारों पर यह आरोप लगाना उचित नहीं है कि वे भी न्यायपालिका को अपनी जेब में रखने की कोशिश करेंगी। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक जवाबदेही विधेयक को इस आधार पर खारिज किया था कि उससे न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा। क्या कॅालेजियम व्यवस्था के पहले 50 साल तक हुई न्यायधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को राजनीतिक प्रेरित माना जा सकता है, जिसमें देश की कई शीर्ष न्यायिक हस्तियां उभरकर सामने आईं? कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो इस अवधि के दौरान न्यायिक नियुक्तियों का मुख्य आधार योग्यता व अनुभव ही रहा है। शीर्ष अदालत द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के प्रधानमंत्री व कानून मंत्री की नियत पर शक करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता है। देश के आम लोगों को न्याय उपलब्ध कराने की ‍मुख्य जिम्मेदारी चुनी हुई सरकार के कंधों पर ही होती है। इसलिए न्यायिक नियुक्तियों में सरकार के शीर्ष नेतृत्व की भूमिका को न्यायपालिका की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उच्च न्यायिक नियुक्तियों में देश की सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा  भी होता है, जिसकी जानकारी सरकार के पास ही होती है।

अब कई वरिष्ठ न्यायाधीश भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि न्यायपालिका में होनेवाला भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दाि बन गया है। इसका खामियाजा अंतत: चुनी हुई सरकार को ही राजनीतिक स्तर पर भुगतना पड़ता है। न्यायपालिका व सरकार के आपसी सहयोग से ही अदालत में होनेवाले भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सकता है। इसी तरह न्याय मिलने में हो रही देरी की समस्या का निपटारा भी न्यापालिका अकेले नहीं कर सकती है। अब जब सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश ने ही कॅालेजियम व्यवस्था पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है, तब नियुक्ति प्रक्रिया के वैकल्पिक प्रस्तावों पर विचार किया जाना चाहिए। न्यायिक उत्तरदायी विधेयक को खारिज करने संबंधी निर्णय में भी न्यायाधीशों ने कॅालेजियम व्यवस्था की कई खामियों का जिक्र किया था। अजीब विरोधाभास है कि सुप्रीम कोर्ट हर सरकारी प्रक्रिया में पारदर्शिता को जरुरी मानता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट व उच्च न्यायालयों के न्यायधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता को स्वीकार नहीं करता है। लोकतंत्र में अंतिम जिम्मेदारी चुनी हुई सरकार की ही होती है, इसलिए न्यायधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार की सहभागिता को इस तरह निर्धारित किया जाए कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर विपरीत असर न पड़े। इस संदर्भ में न्यायपालिका व कार्यपालिका के बीच किसी तरह के टकराव की कल्पना करना लोकतांत्रिक भावनाओं के अनुरूप नहीं है, क्योंकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखना कार्यपालिका की भी संवैधानिक जिम्मेदारी है। देश के आर्थिक विकास की रफ्तार तेज करने और गरीबी, अशिक्षा व बी‍मारियों को खत्म करने के लिए प्रभावी न्याय प्रणाली की अहम भूमिका है। आज हमारी न्याय प्रणाली मुकदमों के बोझ से बुरी तरह दबी हुई है, जिससे मुक्त होना पहली आवश्यकता है। यदि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव की स्थिति बनी रही तो इसका खामियाजा देश की गरीब जनता को ही भुगतना पड़ेगा। इसलिए अपनी संवैधानिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए कई मुद्दों  पर न्यायपालिका व कार्यपालिका के बीच समन्वय जरुरी है।

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