अमूल गर्ल, ‍लिरिल गर्ल, निरमा गर्ल…!

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बीती आधी सदी में देश में उपभोगवादी मध्यवर्ग और जुझारू स्त्रीत्व को गढ़ने में जिन तीन चरित्रों और शुभंकरों ने अहम भूमिका निभाई, उनमें अट्टरली-बटरली अमूल गर्ल, दूध सी सफेदी लाने वाली निरमा गर्ल और तीसरी ला..ला..ला गाते हुए झरने के नीचे बिंदास नहाती लिरिल गर्ल है। पहली ने हमे बटर खाकर हेल्दी होने का शऊर सिखाया, दूसरी ने खुले में नहाने के असीम आनंद से रूबरू कराया तो तीसरी ने कपड़े धोने में छिपा ‘ग्लैमर’ उजागर किया। ये तीनो चरित्र और चेहरे अपने अनूठे विज्ञापन कैम्पेन के जरिए हमारे दिलो ‍िदमाग पर छाए रहे हैं।इन गर्ल्स ने तीन पीढि़यों के अवचेतन पर राज किया है। इनमें से अमूल गर्ल इस साल 60 की, लिरिल गर्ल 42 की और निरमा गर्ल 31 की हो गई।

इन सबमें अलग मुकाम ‘अमूल गर्ल’ का है। क्योंकि यह कोई वास्तविक लड़की न होकर एक शुभंकर है, जिसने अमूल के पास्चराइज्ड मक्खन को घर-घर पहुंचा दिया। पहले हमारे यहां माखन का रिश्ता बाल कृष्ण से था, जो अपनी भोली शरारत के चलते उसे चुराकर खाता था। लेकिन गुजरात की  आणंद मिल्क यूनियन लिमिटेड के पीले रंग वाले नमकीन मक्खन का स्वाद जीभ पर चढ़ाने के लिए चित्रकार सिल्वेस्टर दा कुन्हा ने 1966 में एक नया शुभंकर गढ़ा। एक ऐसी मासूम बालिका, जिसके गुबरे गाल, चपटी-सी नाक, नीली आंखे, पोनी टेल, छोटी फ्राॅक और होठों पर शरारत थी। यह अमूल गर्ल शुरू में महीने में एक बार और अब सप्ताह में पांच बार होर्डिंग्स पर नमूदार होती है। साथ ही यह सम सामयिक मुद्दों और घटनाअो पर मीठा कटाक्ष करते हुए ‘बटर’ का महत्व समझाती है। एड के साथ अपना नजरिया भी पेश करती है। इमर्जेंसी के दौरान नसबंदी अभियान पर उसकी ‍टिप्पणी थी ‘वी  हेव आॅलवेज प्रेक्टाइज कम्पलसरी स्टरलाइजेशन।‘ इसके दो अर्थ थे, एक तो रोगाणुरहित बटर खाकर स्वस्थ रहने का था तो दूसरी तरफ संजय गांधी के जबरन नसबंदी अभियान पर तगड़ा तंज था। अब अमूल गर्ल देसी मुहावरे के साथ भी  अपनी बात कहती है। मसलन आमिर खान की ‘पीके’ पर उसका आग्रह था ‘ खा पी के जाना..।‘ या अण्णा हजारे के अनशन पर इसरार था- ‘खा ना हजारे’ और ‘हजारे ख्वाहिशें ऐसी…।‘ अमूल गर्ल उम्र से भले साठ की हुई हो, विज्ञापन में अभी भी वैसी ही चुलबुली और बेबाक है। यह विज्ञापन आज भी हाथ से बनाया जाता है। इसे चि‍त्रकार जयंत राणे बनाते हैं और स्लोगन लेखक हैं मनीष झवेरी। इसके निर्देशक हैं राहुल दा कुन्हा। यह देश के सबसे लंबे एड कैम्पेन में से एक है।

दूसरी है लिरिल गर्ल। इसने पहली बार भारतीय नारी को झरने में बिकिनी पहनकर बिंदास नहाने का मुक्त मंत्र दिया। तब सिनेमाघरों में उसे देखने लोग कई बार सीट पर खड़े हो जाते थे। वो बस ‘ला..ला..ला’ गाती हुई पानी में छपाक-छपाक करती परम संतुष्टि के भाव से मुस्कुराती रहती थी। यह किरदार सालों तक ल्यूनेल केरेन निभाती रही। लिरिल का यह लाजवाब स्नान 1974 में शुरू हुआ, जो अब भी जारी है। बस चेहरे बदलते रहे हैं।

तीसरी है निरमा गर्ल, जो निरमा वाशिंग पाउडर का महात्म्य गोल-गोल घूम कर गाते हुए बताती है। इसमें एक असली लड़की है जो निरमा साबुन की धुलाई की चमकार की तुलना दूध से करती है। वह सफेद झक फ्राॅक पहने संदेश देती है कि निरमा वाशिंग पाउडर से कपड़े की धुलाई आपको शुचिता के उस मुकाम तक ले जाती है, जहां सबकुछ निर्मल-धवल है। यह विज्ञापन 1985 में शुरू हुआ, जिसने ‘निरमा’ को शीर्ष पर पहुंचा दिया। पहली निरमा गर्ल कंपनी के मालिक करसन पटेल की बेटी निरूपमा थी। उसके निधन के बाद मानसी कपाडिया बरसों तक धुलाई को महिमा मंडित करती रही।

इन यादगार विज्ञापनों को आज के ‘बेटी बचाअो’ अभियान के संदर्भ में देखें तो कपड़े धोने और सफेद झक वस्त्र पहनने का शुचितापूर्ण आत्मविश्वास, प्रकृति के सान्निध्य में खिलखिलाते झरने में खास साबुन से नहाकर ऊर्जस्वित होने का दमदारआग्रह और ‘शुद्ध’ बटर खाकर तंदुरूस्त रहने का संदेश छिपा है। ये तीनो गर्ल्स आजादी के बाद महिलाअों की रूढि़यों से मुक्ति की जिद और स्वावंलबी होने की आकांक्षा को रेखांकित करते हैं। अब जरूरत अगली पायदान चढ़ने की है।  वह क्या होगी…?

 

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