‘काटने’ और ‘बुझाने’ वाला बर्थ डे

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खबरों में बने रहने का फार्मूला ‘सदी के महानायक’ अमिताभ बच्चन यानी बिग बी से बेहतर शायद ही कोई जानता हो। कभी बोलकर, कभी चुप रहकर, कभी कुछ छोड़कर, कभी अपनाकर, कभी इस पाले में तो कभी उस पाले में  रहकर वे सुर्खियां बटोरते रहते हैं। इसी कड़ी में ताजा फंडा जन्मदिन पर केक न काटने और मोमबत्तियां न बुझाने की सलाह का है। अमिताभ को 74 वें जन्मदिन पर हाल में उनकी हिट फिल्म ‘पिंक’ की कामयाबी के मद्दे नजर बड़ा केक तोहफे में दिया गया था। लेकिन अमिताभ ने उसे काटने से यह कहकर इंकार कर ‍िदया ‍िक अब ‘केक काटने की प्रथा बंद होनी चाहिए। क्योंकि यह फजूल है। उन्होने सवाल भी ‍िकया कि हमें पता नहीं कि ये केक क्यों लाया जाता है? केक ही क्यों लाया जाता है? उस पर मोमबत्ती क्यों लगाई जाती है? उसे जलाया क्यों जाता है? जलाने के बाद कहते हैं, इसको फूंक कर बुझा दो। बुझाने के बाद एक कत्लनुमा चाकू आ जाता है, फिर उसको काटकर फांके बनाइए। फिर वो फांक जो है वो किसी को खिलाइए। अब एक नई प्रथा शुरू हो गई है कि जब सब कांड हो जाता है तो केक मुंह पर पोत देते हैं।

यूं अमिताभ बरसों तक बर्थ डे केक काटते रहे हैं। लेकिन उसकी निरर्थकता का अहसास उनको जीवन के उत्तरार्ध में अब हुआ है, वैसे ही कि जैसे जिदंगी के मजे लूटने के बाद लगता है कि यह भी क्या जिंदगी है। वैसे वो केक काटते तब भी सुर्खी बनती, लेकिन न काटकर बड़ी सुर्खी बनी। जहां तक जन्मदिन मनाने की आधुनिक शैली का सवाल है तो यह पश्चिम का अंधानुकरण ही है। उसका भी कुछ भारतीयकरण  हो गया है।

भारत में जन्मदिन मनाने का चलन नहीं था। यहां देवी देवताअों की जयंतियां और उर्स जरूर मनते रहे हैं।  लेकिन उसमें भी किसी देवता का सही बर्थ ईयर किसी को नहीं पता है। अलबत्ता राम, कृष्ण हनुमान आदि की जन्म तिथि और जन्म समय जरूर परंपरा के ‍िहसाब से चला आ रहा है। जयंतियों पर अमूमन पूजा अर्चना और भंडारे होते  रहे हैं। इनके अलावा बादशाह और राजा-महाराजा भी जन्मदिन मनाया करते थे, जो प्रजा पर कृपा बरसाने का ही एक टोटका था।

जन्मदिन पर केक काटने और कैंडल बुझाने की परंपरा पश्चिम से आई है। बाइबल में तीन स्थानों पर जन्मदिन के महत्व का उल्लेख है। हालांकि कुछ लोग बर्थ डे सेलीब्रेशन को गैर ईसाई सभ्यताअो की देन मानते हैं। बर्थ डे सेलीब्रेशन के साथ केक काटने का चलन 15 वीं सदी में जर्मन लोगों ने शुरू किया। 17 वीं सदी में केक के साथ मोमबत्तियां भी जुड़ गईं। जीवन के जितने साल गुजरते उतनी मोम‍बत्तियां बुझा दी जातीं हैं। अंधेरे में उजाले और धुएं में भविष्य के सुखद होने की कामना की जाती है। बर्थ डे केक धीरे-धीरे पश्चिमी संस्कृति का प्रतीक बन गया। बाद में इसे स्वाद और सौंदर्य की दृष्टि से संवारा जाने लगा। अब तो मुंह पर केक मलने और केक में मुंह मारने जैसी भौंडी प्रथाएं भी चलन में है, जो अन्न का अपमान भी हैं। इसके विपरीत भारतीय परंपरा में दीया या मोमब‍त्ती बुझाना अपशकुन का प्रतीक है। हमारे यहां दीया जलाने पर जोर है, जो जीवन में ज्ञान का प्रकाश लाए।

यूं बर्थ डे मनाने में कोई बुराई नहीं है। हर व्यक्ति अपने जन्म को सृष्टि का महान क्षण मान सकता है। क्योंकि जन्मोत्सव सृजन का उत्सव है। उसे उसी रूप में लिया जाए तो बेहतर है। ‘काटने’ और ‘बुझाने’ के मनोभाव इसमें क्यों शामिल हों? बिग बी को यह बहुत देर से समझ आया। हमे इसे समझने के लिए सेलेब्रिटी होने  की जरूरत नहीं है।

 

 

 

 

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