‘गधे’ को ‘घोड़ा’ कहने की मजबूरी !

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कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में अपने विधायक आर. के. राय को पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ अभद्र टिप्पणी और ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के लिए सस्पेंड भले कर ‍िदया हो, लेकिन राय ने जो जुमला कहा वह देश के राजनेताअों और राजनीतिक कार्यकर्ताअों के मनोविज्ञान के गहन विश्लेषण की मांग करता है। विधायक राय ने राहुल गांधी के नेतृत्व गुणों पर सवाल उठाते हुए कहा था ‘ मैं गधे को घोड़ा नहीं सकता।‘ भले पार्टी मेरे खिलाफ कार्रवाई करे। यानी ‘गधे’ की ‘घोड़े’ के रूप मे आराधना नहीं की जा सकती। गधा, गधा ही रहेगा, चाहे वह कितना ही ‘लोकप्रिय’ क्यों न हो। लोकनीति यही कहती है। मगर राजनीति ऐसा नहीं मानती।

ध्यान रहे कि राय आदिवासी हैं, पुलिस अफसर की नौकरी छोड़ एमएलए बने हैं। और राज्य में कांग्रेस की चूलें हिलाने वाले पूर्व कांग्रेस नेता अजीत जोगी के खास हैं। यही नहीं कांग्रेस की अनुशासनात्मक कार्रवाई  पर उन्होने ‘खुशी’ जाहिर करते हुए कहा कि अब मैं अपनी बात कहने के ‍िलए ‘आजाद’ हूं। राय ने राहुल गांधी को लक्ष्य कर जो कहा, वह शिष्टता के दायरे में यकीनन नहीं आता, लेकिन इसी बहाने उन्होने सियासी तबेले में ‘गधे’ और ‘घोड़े’ की हैसियत, उपयोगिता और राजनीतिक विवशताअों को भी अनायास रेखांकित कर ‍िदया है।

घोड़ा और गधा, दो ऐसे चौपाए प्राणी हैं, जिनका इंसान से करीबी रिश्ता रहा है। दोनो सुख दुख के साथी रहे हैं। फर्क इतना कि घोड़े की पीठ सपाट नहीं होती और गधे की होती है। घोड़े के कान छोटे मगर चौकन्ने होते हैं जबकि गधे के बड़े और सुस्त  होते हैं। घोड़ा हिनहिनाता है, गधा रेंकता है। घोड़ा समूह जीवी है तो गधा जोड़े में खुश रहता है। घोड़ा भिड़ जाता है, गधा सेफ चलता है। घोड़ा जल्दी जोश में आ जाता है, लेकिन गधा सुकून से जीता है। ताव खा जाए तो दुलत्ती झाड़ देता है। एक इंसान को तो दूसरा बोझा ढोने का काम करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से घोड़े में गधे के मुकाबले दो गुणसूत्र ज्यादा होते हैं। शायद इसीलिए वह सवारों की पसंद होता है, जबकि गधे ‍की किस्मत धोबी और कुम्हार के हाथ होती है।

बहरहाल राय ने जो कहा था, वह केवल शरीरशास्त्र की दृष्टि से सही था, बल्कि भारतीय‍ सियासत का अप्रिय सत्य भी था। कांग्रेस ही क्यों, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आज लगभग सभी राजनीतिक दलो में गधों को घोड़ों का विकल्प मानने का  का दुराग्रह है। आलम यह कि जहां घोड़ों की दरकार है, वहां भी गधों का राजतिलक धूम से किया जा रहा है। मानकर कि इसमें सर्वसम्मति है। वैसे तो घोड़ों और गधों में दोस्ती तो दूर, दुश्मनी भी कम ही होती है, लेकिन गधे में घोड़े की छवि बूझने का कौशल चापलूसी के गंगाजल के आचमन से ही आता है। इसके लिए जरूरी है कि गधे की खामियों को खूबियों और नालायकी को योग्यता के आईने में देखा जाए। इसके लिए खास तरह का थ्री डी चश्मा चाहिए, जो सत्ता स्वार्थ और खोटे सिक्के को खरा बताने वाली टकसाली सोच से आता है।

सवाल यह कि सियासी घोड़ों और गधों में फर्क कैसे करें? इसका बुनियादी मापदंड गधे की ऊपर तक पहुंच और जमीनी कार्यकर्ताअोंकी मूक-बधिरता का स्तर है। उसे यथार्थ से आंख मूंदने और भ्रम को यथार्थ मानने की कला आनी चाहिए। विधायक राय ने इसी ‘दृष्टि भ्रम’ पर उंगली रखी है। उनकी नजर में ‘घोड़ा’ कौन है, पता नहीं, लेकिन ‘गधों’ की पूछपरख हर जगह है, यह निर्विवाद है। उनमें और मनुष्य में बुनियादी अंतर यह है कि गधों- घोड़ों को तमाम खूबियों के बाद भी राजनीति करना नहीं आता। वे एक दूसरे को असल रूप और कर्म में चीन्हते हैं। उनकी सत्ता का चारा चरने की मंशा नहीं होती। इसीलिए ‘गधे’ को ‘घोड़ा’ मानने की उनकी कोई मजबूरी नहीं होती।

 

 

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