शिप्रा के दूसरे छोर पर है भूखी माता का मंदिर

उज्जैन। स्कंद पुराण के अवंति खण्ड में भूखीमाता  का उल्लेख है। भूखी एवं धूमावती नामक दोनों बहनों की एक साथ प्रतिमाएं स्थापित है कर्कराज मंदिर के  सामने की ओर शिप्रा किनारे। यह मान्यता है कि देवियों को प्रतिदिन एक मनुष्य की बली लगती थी।

उल्लेख है कि विक्रमादित्य महाकाल वन में रोजगार के लिए गांव में आए थे। वे जिस नगरवासी के निवास पर ठहरे थे। वह एक रात्रि रोने लगा। विक्रमादित्य ने कारण पूछा तो उसने पूरा वृतांत बताते हुए कहाकि आज उसके पुत्र का नम्बर है। इस पर विक्रमादित्य ने देवियों को प्रसन्न करने के लिए शकर का पुतला बनवाया और देवियों के आगमन मार्ग पर सुगंधित पूष्प, इत्र का छिड़काव कराया। विविध भोजन मार्ग में रखा। देवियां भोजन करते हुए जब घर पहुंची तब तक उनकी भूख शांत हो चुकी थी।

देवियों के समक्ष विक्रमादित्य खड़े हो गए तथा विनती की कि उसका भोजन कर लें। इस पर देवियां प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा। विक्रमादित्य ने कहा कि आप नगर छोडक़र चली जाएं। आपके भोजन की व्यवस्था का प्रतिदिन का दायित्व उसका रहेगा। देवियां नदी पार करके दूसरे छोर पर विराजित हो गई। पूर्व में देवी को पशु बली लगाई जाती थी। वर्षो से यह परंपरा बंद हो गई।

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