शिवराज की ‘टीम मप्र’ ने फेल कर दी जीआईएस

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आयोजन : ग्‍लोबल इन्‍वेस्‍टर्स समिट 2014

दिनांक : 9 अक्‍टूबर 2014

स्‍थान : ब्रिलियंट कन्‍वेंशन सेंटर, इंदौर

वक्‍ता : आईटीसी के वाय.सी. देवेश्वर

‘मुख्‍यमंत्रीजी आप जितना चाहेंगे हम उतना निवेश करेंगे। आप हमारी समस्‍याएं दूर करवा दीजिए। मैंने 10 हजार करोड़ के निवेश के लिए प्रस्‍ताव दिया है, लेकिन तीन साल से अधिक का समय हो गया हमें जमीन नहीं मिली है।’ आईटीसी के चेयरमैन देवेश्‍वर मप्र के मुखिया की तारीफ करते हुए जब अफसरशाही की यह पोल खोल रहे थे तब खचाखच भरे कन्‍वेंशन सेंटर के मुख्‍य हाल में मौजूद हर मध्‍यप्रदेशवासी शर्म महसूस कर रहा था। तब तत्‍कालीन उद्योग मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया ने देवेश्‍वर को यकीन दिलाया था कि वे मप्र के बड़े निवेशक हैं तथा उनकी समस्‍या को हर हाल में दूर किया जाएगा। आज कोई नहीं जानता की इस प्रोजेक्‍ट का क्‍या हुआ?

इस समिट में निवेशकों से सीधी बात करते हुए मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि जमीन पसंद करो, उंगली रखो आपको जमीन मिल जाएगी। 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराएंगे। हमारे यहां रियल सिंगल विंडो है। उद्योगपतियों को परेशान नहीं होना पड़ेगा। एक प्रोजेक्ट, एक अफसर की तर्ज पर काम होगा। अधिकारी की जिम्मेदारी होगी की काम पूरा हो और उद्योगपतियों को अनुमतियों के लिए भटकना नहीं पड़े। तीन दिन में काम न होने पर अधिकारी पर जुर्माना लगेगा जो उसके वेतन से कटेगा।

मुख्‍यमंत्री की घोषणा के बाद ऐसा हुआ भी। ट्रायफेक ने समिट खत्‍म होने के तुरंत बाद नोडल अधिकारियों की सूची तैयार की। मुख्‍य सचिव अंटोनी डिसा की सहमति से संभावित निवेश के प्रभारी के रूप में सम्‍बन्धित विभागों के प्रमुख सचिव की नियुक्ति की गई। जीआईएस 2014 आयोजन की पहली समीक्षा बैठक में नवंबर 2014 में मुख्‍यमंत्री चौहान के समक्ष ट्रायफेक के एमडी डीपी आहूजा ने प्रेजेंटेशन देकर बताया था कि किस प्रमुख सचिव को किस निवेश प्रस्‍ताव की जिम्‍मेदारी दी गई है।

आईएएस है इसलिए कोई जवाब तलब नहीं

असल में निवेश प्रस्‍ताव के नोडल अधिकारी की जिम्‍मेदारी संभलना आईएएस अफसरों को रास ही नहीं आया था। उन्‍होंने पहली ही समीक्षा बैठक में इस बात से अरुचि दिखा दी थी। उद्योग विभाग के सूत्रों के अनुसार मुख्‍यमंत्री के दबाव को देखते हुए कुछ माह तक तो अफसरों ने निवेश प्रस्‍तावों पर उद्योग विभाग से बात की तथा निवेशकों व उनके प्रतिनिधियों की समस्‍याएं जानी। फिर जैसे ही मुख्‍यमंत्री ने समीक्षा बंद की, अफसरों ने इस जिम्‍मेदारी से पल्‍ला झाड़ लिया। अब कोई भी नहीं पूछता कि नोडल अफसरों ने कितना काम किया तथा निवेश नहीं आया तो निवेशकों की समस्‍याएं दूर करने में इन अफसरों ने क्‍या किया? समीक्षा बैठक में न मुख्‍यमंत्री ने कभी यह पूछा और न नए उद्योग मंत्री राजेन्‍द्र शुक्‍ल इस मामले पर बात करते हैं। न तो किसी पर जुर्माना लगा और न किसी का वेतन काटा गया। जबकि मुख्‍यमंत्री से मंत्रालय में सोमवार को होने वाली मुलाकात में कई उद्योगपतियों ने काम में आने वाली बाधाओं का जिक्र किया है।

‘प्रमुख सचिव सुलेमान का शिकार बने आईएएस’

एक बार नहीं मुख्‍यमंत्री चौहान ने कई बार आईएएस अफसरों को ‘टीम एमपी’ कहा है तथा दर्जनों बार अपने मंत्रियों से अधिक अफसरों की राय को तवज्‍जो दी है, तो फिर सवाल यह है कि मुख्‍यमंत्री के विश्‍वस्‍त आईएएस अफसरों ने भी मप्र में निवेश लाने की जिम्‍मेदारी क्‍यों नहीं संभाली? सूत्रों के अनुसार यहां शिवराज के सपने को पूरा करने के प्रयासों पर आईएएस अफसरों की गुटबाजी भारी पड़ गई। नोडल अधिकारी बनाए गए कई वरिष्‍ठ आईएएस का कहना था कि निवेश लाने तथा इन्‍वेस्‍टर्स समिट को सफल बनाने का पहला दायित्‍व उद्योग विभाग के प्रमुख सचिव मोहम्‍मद सुलेमान है। लेकिन सुलेमान ने चतुराई से सभी आईएएस अफसरों को निवेश लाने की जिम्‍मेदारी दिलवा दी। साफ है निवेश नहीं आया तो सभी दोषी होंगे। अफसरों को यही नागवार गुजरा कि सफलता का श्रेय केवल सुलेमान को मिल रहा था और विफलता सामूहिक उत्‍तरदायित्‍व कैसे हो गया? सुलेमान के दबदबे को देखते हुए किसी अधिकारी ने खुल कर आपत्ति नहीं जताई लेकिन दिल से काम भी नहीं किया। इसके अलावा, अनेक कंपनियों की ओर से निवेश की बात करने आए प्रबंधकों का कद प्रमुख सचिव की तुलना में काफी छोटा होता था। अफसरों को यह ठीक नहीं लगा कि किसी कंपनी के जूनियर कर्मचारी से ‘डील’ करें। जबकि ऐसे कर्मचारी जिलों में कलेक्‍टर के सामने भी हाथ बांधे खड़े रहते हैं।

एसोचैम ने कहा – मप्र में 14 फीसदी घटा निवेश

मुख्‍यमंत्री के प्रयासों से निवेशक मप्र की ओर आकर्षित हो रहे हैं लेकिन एसोसिएटेड चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्टीज ऑफ इंडिया (एसोचैम) ने एक अध्ययन में बताया कि वर्ष 2015-16 में नए निवेश में 14 प्रतिशत गिरावट आई है। कुल 53 हजार करोड़ रुपए के निवेश में से 44 हजार करोड़ सिर्फ घोषणाओं तक सीमित है। ‘एनालिसिस ऑफ मध्य प्रदेश : इकॉनोमी, इंफ्रास्ट्रक्चर एण्ड इन्‍वेस्‍टमेंट’ विषय पर किए गए इस अध्ययन में कहा गया है कि “वर्ष 2013-14 में निवेश में करीब 60 प्रतिशत गिरावट आई थी लेकिन 2014 में ग्‍लोबल इन्‍वेस्‍टर्स  समिट के आयोजन के बाद राज्य में नए निवेश में 700 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई। यह वृद्धि अधिक समय तक नहीं टिकी और वर्ष 2015-16 में इसमें 14 प्रतिशत की कमी आ गई।” प्रदेश में लगभग तीन लाख करोड़ रुपए की परियोजनाएं विभिन्न कारणों से अटकी पड़ी हैं। निवेश अटकने का मुख्‍य कारण भूमि अधिग्रहण तथा पर्यावरण व अन्य सम्बन्धित स्वीकृतियों में विलम्ब, कच्चे माल की आपूर्ति में रुकावटें, कुशल श्रमिकों की कमी, वित्तीय संसाधनों की कमी, प्रोत्साहकों तथा अन्य लोगों की घटती दिलचस्पी शामिल हैं। इनमें से अधिकांश कारण अफसरशाही से जुड़े हैं।

 

 

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