झंडू बाम अमरसिंह !

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अपने ही व्यक्तित्व के नए- नए पहलू उजागर करने और इसके मार्फत सुर्खियां बटोरने में अमरसिंह का कोई सानी नहीं। मीडिया में भी उन्हें उनके चौंकाने वाले बोल- वचनों के कारण जगह मिलती है। आजकल अपनी उपेक्षा से दुखी और हताश अमरसिंह ने कहा है कि वे समाजवादी पार्टी के ‘झंडू बाम’ बनकर रह गए हैं। उन्होने अपने आका मुलायमसिंह से इसकी शिकायत भी की। लेकिन ‘नेताजी’ पर कोई असर नहीं हुआ। शायद अमर की नौट‍ंकियों का उन्हें पूरा अहसास है। वे फिर से अमरसिंह को तवज्जो देकर घर में कोई नया पंगा होता नहीं देखना चाहते। अब बुनियादी सवाल यह है कि अमरसिंह ने  खुद को समाजवादी पार्टी का झंडू बाम क्यों माना? झंडू बाम में उन्हें ऐसा क्या नजर आया, जो अमरसिंह से मेल खाता है?

झंडू बाम एक दर्द निवारक लेप है। जो सरदर्द, बदन दर्द में मला जाता है। कंपनी का दावा है ‍कि इसे लगाने से कुछ ही देर में पीडि़त व्यक्ति को दर्द से राहत मिल जाती है। यह एक घरेलू दवा है, जो बिना डाक्टर की सलाह के भी इस्तेमाल की जा सकती है। पहले यह दवा झंडू कंपनी बनाती थी। बाद में उसे  इमामी लिमिटेड ने खरीद लिया। लेकिन झंडू बाम, झंडू बाम ही रहा। कंपनी का यह भी  दावा है कि इस आयुर्वेदिक दवा का 5 करोड़ भारतीय उपयोग करते हैं। इसका एक विज्ञापन काफी चर्चित रहा था ‘एक बाम, तीन काम, झंडू बाम।‘ दवा से हटकर झंडू बाम को नई पहचान तब मिली,जब फिल्म ‘दबंग’ में डांसर ने इश्क में अपनी ‍दीवानगी की तुलना झंडू बाम से की। अर्थ निकला कि जिसने एक बार झंडू बाम लगाया, वह दर्द से भले निजात पा ले, बाम को नहीं भूल सकता। जल्द ही ‘झंडू बाम’ हिंदी का नया मुहावरा बन गया। इसकी तासीर ऐसी  शख्सियत से थी, जो लाचार, चाटुकार, बेबस और निर्लज्ज हो। कुछ लोग इसे गाली के रूप में लेने लगे।

जहां तक अमरसिंह का सवाल है तो वो खुद को पहले दलाल, मुलायमवादी वगैरह बता चुके हैं। राजनीति में ‘दलाल’ संबोधन को प्रति‍ष्ठा दिलाने की उपलबिध भी उन्ही के नाम है। अमरसिंह के सभी पार्टियों में कनेक्शन हैं, लेकिन उन पर भरोसा किसी को नहीं है। किसी जमाने में समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायमसिंह के खासमखास हुआ करते थे। कहते हैं कि अखिलेश- डिंपल की शादी के लिए मुलायम को मनाने का काम अमरसिंह ने ही ‍िकया था। मुलायम को पलटीमार पालिटिक्स में ट्रेंड करने का श्रेय भी अमरसिंह को ही जाता है। लेकिन बाद में मुलायम यानी नेताजी की नीयत बदली और उन्होने अमरसिंह को ही पार्टी से बाहर कर दिया। बीते 6 साल से अमर बीमारी और अपने राजनीतिक वजूद बचाने के लिए जूझते रहे हैं। किसी तरह उनकी सपा में वापसी हुई भी तो ‘बाहरी’ की तरह। जबकि अमरसिंह ‘अंदर’ के आदमी की तरह काम करने के आदी हैं। और यही मुलायमपुत्र अखिलेश को मंजूर नहीं है।  जबकि अमरसिंह को जोड़- तोड़ के बगैर खाना नहीं पचता। वो जिस घर से जुड़े, उसमें दरार पड़ी। फिर चाहे बच्चन हों या मुलायमसिंह। अमरसिंह दोस्तों की मदद भी खूब करते हैं,लेकिन दोस्त ही उनका एहसान नहीं मानते। उन्होने मित्रों की खातिर बदनामियां भी मोल लीं। नतीजा यह हुआ कि बदनामियां अमरसिंह के खाते में बचीं, फायदा दूसरे उठा गए। हालांकि अमरसिंह ने अपमान के घूंट पीकर भी मुलायम का साथ नहीं छोड़ा। फिर भी उन्हें सियासी मर्ज की दवा नहीं माना गया। झंडू बाम भी शरीर पर मला जाता है, दवा की तरह पीया नहीं जाता। वह दर्द निवारक होकर भी दर्दे दिल की दवा नहीं बन पाता। शायद यही अमरसिंह की पीड़ा भी है। इसीलिए उन्होने खुद की तुलना झंडू बाम से की।

 

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