नए नोटों में रिश्वत लेने का सुख !

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नोटबंदी अपने साथ नए नोटों में रिश्वत लेने का सुख लेकर भी आई। बीते एक हफ्‍ते में मुहूर्त की रिश्वतखोरी के पांच ‘सौदे’ पकड़े गए। संयोग से पांचों भाजपा शासित राज्यों के हैं। इनमें भी सबसे ज्यादा तीन ‘ईज आॅफ डूइंग बिजनेस’ में अग्रणी अपने मध्यप्रदेश में पकड़े गए। बाकी एक-एक गुजरात और महाराष्ट्र के हैं। इसका उजला पक्ष यह रहा ‍िक सभी ने 2 हजार के नए नोटों में घूस मांगी और ली। कुछ वैसी ही खुशी के साथ जो गुजरे जमाने में नई पिक्चर के पहले का दिन का पहला शो देखकर मिला करती थी, भले ही इसके लिए टिकट ब्लैक में खरीदनी पड़ी हो।

काले धन के घटाटोप में देश को यह आश्वस्ति भी हुई कि नोटबंदी के कारण घूसखोरी का मार्केट किसी भी लेवल  पर डाउन नहीं हुआ है। बल्कि उसमें नई चमक आ गई है। इसमें बैंकों का ‘सकारात्मक’ सहयोग यह रहा कि  रिश्वत के ‍लिए नए नोटों का टोटा नहीं पड़ने दिया। हो सकता है कि ऐसे नोट मुहैया कराने कहीं गुप्त काउंटर भी खुले हों। इस यक्ष प्रश्न का संतोषजनक उत्तर भी मिला कि प्रिटिंग प्रेस से उतरे ताजे नोट आखिर जा कहां रहे हैं और आम आदमी के लिए उसकी लिमिट बांधने के पीछे मजबूरी क्या है? नोटबंदी के तीसरे ही दिन गुजरात के कांडला पोर्ट ट्रस्ट के दो अफसरों और एक बिचौलिए को वहां के एंटी करप्शन ब्यूरो ने 2.9 लाख रू. की रिश्वत लेते गिरफ्‍तार किया। ये पैसे एक लंबित बिल के पेमेंट के लिए मांगे गए थे। चूंकि बैंक से नए नोट तत्काल और इतनी तादाद में मिलना आसान नहीं था, इसलिए रिश्वतदाता ने यार-दोस्तों और रिश्तेदारों से उधार लेकर नए नोटों की मांग पूरी की। उसी दिन दूसरा वाकया मध्यप्रदेश के भोपाल में हुआ। माध्यमिक शिक्षा मंडल के अफसरों ने अपने अधीनस्थ एक महिला कर्मचारी को सस्पेंड होने से बचाने  के ‍िलए 2 लाख रू. मांगे और इसमें से 25 हजार नए ‘गांधीजी’ नकद लेते लोकायुक्त पुलिस के हाथों गिरफ्तार हुए। यह भी साफ हुआ कि  बदले हालात में नए नोटों में ‘सुरक्षित रिश्वत’ लेने का संदेश प्रशासन में निचले स्तर पर चला गया है। इसी के तहत भोपाल में एक नगर निगम कर्मी  और उज्जैन जिले में एक पटवारी ने नए करकरे नोटों में रिश्वत लेकर प्रदेश की ‘लाज’ रखी। मप्र की सीमा गुजरात के साथ महाराष्ट्र से भी लगती है। सो वहां भी असर होना ही था। राज्य  के कोल्हापुर में जिला परिषद के एक वरिष्ठ सहायक ने 35 हजार की घूस नए नोटों में लेकर उत्तर नोटबंदी काल का रिश्वती नारियल फोड़ दिया।

इन तमाम घटनाअों से परिलक्षित हुआ कि घूसखोरों की नोट-चेतना दूसरों से ज्यादा तेज है। बाकी तो दाल रोटी के लिए नोट बदलवा रहे थे, यहां दो नंबर की कमाई को नोटबंदी के दुष्प्रभाव से बचाना था। रिश्वत के जूने नोटों को उन्होने पहले हल्ले में ही ‘एडजस्ट’ करवा दिया था। धंधे का नया शगुन भी नए नोटों से ही किया। चूंकि अब 2 हजार का नोट भी आ गया है, इसलिए घूस की रकम स्वत: दोगुनी हो गई है। ताकि 2 के गुणानुक्रम में नोट गिनने में आसानी  रहे।

गलतफहमी मुमकिन है कि ये लोग घूस लेते एसीबी अथवा लोकायुक्त के हाथों धराए तथा रिश्वत लेना और मुश्किल हुआ। भोपाल के माध्यमिक शिक्षा मंडल के घूसखोरों की जो तस्वीरें छपीं, उनमें रिश्वत लेते पकड़े जाने की शर्म के बजाए ज्यादा नए नोटों के साथ पकड़े जाने का गर्वित भाव झलक रहा था। वैसे भी नई छाप  और ताजी महक वाले नोटों की घूस लेने का मजा ही कुछ और है। यह नई फसल के मुफ्‍त में कटकर घर आने जैसा सुख है। कोरे नोटों की काली कमाई को अपने हाथों से स्पर्श करने का दुर्लभ रोमांच है। जबकि पुराने नोटों में रिश्वत लेना कबाड़ी के धंधे जैसा लगता है। वह घूसखोरी में पिछड़ेपन की निशानी है। फख्र की बात यह है ‍कि नए रोकड़े में रिश्वतखोरी का शगुन भी मप्र से हुआ। बीते एक दशक की यही बड़ी उपलब्धि है और कल को नंबर वन कहलाने का भरोसा भी।

 

 

 

 

 

 

 

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