नोटबंदी और अनुभव का कुंवारापन !

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बाबा रामदेव खुद भले कुंवारे हों, लेकिन योगशक्ति से उन्होने घर-गृहस्थी वालों का दर्द जान लिया है। नोटबंदी से उपजी नकदी परेशानियों को बूझते हुए बाबा ने एक इंटरव्यू में कहा कि भाजपा ( और सरकार में भी) बहुत से लोग ‘कुंवारे’ हैं। इसलिए उन्हें एहसास ही नहीं हुआ कि नोट न होने से परिवारों में क्या परे‍शानियां होती हैं। उन्हें नहीं पता कि  समय पर और पर्याप्त पैसा न ‍मिले तो शादी करना कितना मुश्किल है। बकौल बाबा हजार और पांच सौ के नोट बंद करने का फैसला कुछ समय बाद होता तो शायद इतनी तकलीफ नहीं होती। आलम ये है कि दूल्हे के सेहरे से लेकर दुल्हन के मंगलसूत्र तक के लिए लोग बैंक की दर पर नाक घिस रहे हैं। अपना ही पैसा बैंक से निकलवाने भिखारी की तरह लाइन में खड़े हैं।

बाबा यूं भी आजकल योग टीचर कम इ्न्वेस्टर की भाषा ज्यादा बोलते हैं। वे हजार करोड़ से कम की बात कम ही करते हैं। फिर भी वे काले धन के दुश्मन नंबर वन हैं।  काले धन का विरोध उन्हें इतना फला कि पतंजलि उद्दयोग हजारों करोड़ का हो गया। मोदी युग में तो बाबा उस नए अवतार में हैं, जहां योग, भोग और सियासी संजोग एकरूप हो जाते हैं। ऐसे में मोदी सरकार काले धन पर कुठाराघात करे और बाबा न बोलें, यह संभव ही नहीं है। बाबा बोले और मार्के की बात बोले। नोटबंदी से उपजी आर्थिक अराजकता  के मूल में उन्हें भाजपाइयों का कुंवारापन नजर आया। भाजपा में ज्यादातर कुंवारे नेता तो संघ से आए हुए ही हैं। लेकिन बाबा का मुख्‍य इशारा शायद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरफ था, जो कुंवारे भले न हो, लेकिन गृहस्थ भी नहीं हैं। मोदी प्रचारक रहे हैं, इसलिए प्रचार करना बखूबी जानते हैं। वे साहसी निर्णय भी लेते हैं, बगैर इसकी चिंता किए कि उसका अंतिम परिणाम क्या होगा। वैसे अटलजी भी ‘अविवाहित’ थे, लेकिन गृहस्थ जीवन के संघर्षों से अनभिज्ञ नहीं थे।

अ-गृहस्थ मोदी ने हजार-पांच सौ के नोटों को काला धन मान उन्हें एक झटके में बंद कर दिया। इसका सबसे ज्यादा असर उन घरों में हुआ, जहां शहनाई बजते-बजते सारंगी बजने लगी। भारत राष्ट्र अभी इतना भी फारवर्ड नहीं हुआ कि बिना पैसे-टके अथवा चार हजार के खुल्ले नोटों के भरोसे बेटी के हाथ पीले करवा दे। विवाह यहां जीवन के सबसे बड़े उत्सवों में से एक है। लेकिन दिक्कत   यह है कि वह राष्ट्रवाद की परिभाषा में कहीं फिट नहीं होता। उसकी ‘राष्ट्रीय उपयोगिता’ सिद्ध करना उतना ही कठिन है, जितना कि मजदूरी में मिले हजार-पांच सौ के चंद नोटों को बिना आईडी के नए नोटों में बदलवाना। इसलिए बाबा पब्लिक की परेशानी में भी सकारात्मक अर्थ  खोज रहे हैं। उन्होने नए योगासन की तरह बताया कि नोटबंदी से शादियों में दहेजबंदी खुद-ब-खुद हो गई है।  उन्हे यह कौन समझाए कि लड़के वाले अब दो हजार के नोटों में दोगुना दहेज मांगने लगे हैं। उधर लड़की का बाप कन्यादान का इंतजाम तक ठीक से नहीं कर पा रहा है। यूं कहने को सरकार बारहम वर-वधु के मां बाप को बैंक से ढाई लाख बैंक से निकालने की छूट देकर लोगों को  यह जता रही है कि वे अपनी औकात समझें और खुद की तुलना पांच सौ करोड़ की शादी करने वाले माइनिंग माफिया जनार्दन रेड्डी से करने की हिमाकत न करें।

बहरहाल बाबा ने जो कहा उसमें कुछ तो सच्चाई है। कुंवारेपन को दो अर्थ हैं। उसमें स्वार्थ और त्याग दोनो एक साथ समाहित हैं। कुंवारा व्यक्ति सांसारिक प्रपंचो से भले दू रहे, लेकिन आत्मोन्नति के बारे में ही सोचता है। उसके इस ‘त्याग’ से दूसरों को क्या और कितना कष्ट हो रहा है, उसे इसकी ज्यादा चिंता नहीं होती। देश को असली खतरा वैवाहिक कुंवारेपन से ज्यादा अनुभव के कुंवारेपन से है। नोटबंदी मामले में यही अनुभव हो रहा है।

 

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