‘मन की बात या ‘मोदी की बात’ ?

0
134

 

पश्चिम बंगाल की फायर ब्रांड मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप की शक्ल में एक बुनियादी सवाल उठाया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ में कही गई बातों को ममता ने महज ‘मोदी की बात’ कहकर इल्जाम लगाया है कि वे इसके लिए रेडियो जैसी सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग कर रहे हैं। ममता ने यह भी कहा कि लाखों लोगों की पीड़ा और समस्या का समाधान ढूंढने की बजाय पीएम व्यक्तिगत प्रतिशोध, प्रचार और बिजनेस में जुटे हैं।

बंगाल की ‘शेरनी’कही जाने वाली ममता ने पहले अपने राजनीतिक नेतृत्व से सीपीएम को समेटा और अब उन्हें राज्य में भगवा लहर की चुभन महसूस हो रही है। लिहाजा वे अरविंद केजरीवाल की तरह वे प्रधानमंत्री और भाजपा पर हमले का कोई मौका नहीं छोड़तीं। लेकिन इस बार उन्होंने एक शंका को हवा दी है कि क्या ‘मन की बात’ कहीं सचमुच ‘मोदी की बात’ में तो तब्दील नहीं हो रहा ? क्या प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ के जरिए वही बात कहते और करते हैं, जो वे करना और करवाना चाहते हैं? सुनना और सुनाना चाहते हैं? कहीं वह संवाद की जगह ‘एकालाप’ तो नहीं हो रहा ?

पिछले लोकसभा चुनाव में जननायक की तरह उभरे नरेन्द्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री जो नवाचार शुरू किए, उनमें ‘मन की बात’ भी एक था। पीएम ने रेडियो की दूरदराज तक पहुंच को ध्यान में रखकर  देश से गुफ्तगू का यह ‘पुराना’ माध्यम चुना। वही आकाशवाणी, जिसने 1971 की लड़ाई जीतने में महत्वपूर्ण संचारी भूमिका निभाई थी। टीवी आने के बाद ‘भूले बिसरे गीत बने’ रेडियो और विविध भारती तक सिमटी ‘आकाशवाणी’ के लिए भी यह नया जीवनदान था। साथ ही आंखों से ज्यादा कानों पर भरोसा करने का परोक्ष आग्रह भी।

रेडियो के प्रति फिर से कौतुक जगाने वाली ‘मन की बात’ का पहला प्रसारण 3 अक्टूबर 2014 को हुआ। तब से अब तक 26 बार ‘मन की बातें’ प्रधानमंत्री कर चुके हैं। इस दौरान उन्होने ज्यादातर सामाजिक मुददों और समस्याअोंपर लोगों को ‘एज्युकेट’ करने  की कोशिश की है। इनमें स्वच्छता अभियान, नशाबंदी से लेकर कैशलेस सोसाइटी तक शामिल हैं। एक बार तो उन्होने अमेरिकी के निवर्तमान राष्ट्रपति बराक अोबामा के साथ जनता के पत्रों के उत्तर भी दिए। बाद में ‘मन की बात’ में जनभागीदारी बढ़ाने लोगों से सुझाव भी मांगे गए। हर ‘मन की बात’ का प्रसारण आकाशवाणी के साथ तमाम टीवी चैनलों पर भी किया गया। इन सबके बावजूद अगर ममता बनर्जी को लगा कि यह ‘मोदी की बात’ बनकर रह गई है तो इसके पीछे कुछ कारण होने चाहिए।

जब देश का प्रधानमंत्री बोलता है तो वह पूरे देश की आवाज होती है। क्योकि वह ‘मोदी’ नहीं पीएम होता है। उसकी भावनाएं देश के मन की भावनाएं होती हैं। उसमें देश की पीड़ा और आनंद होता है। ऐसे में ‘मोदी’ और उनका ‘मन’ अलग कैसे हो सकते हैं?  शुरू में लगा भी कि मोदी करोड़ों भारतीयों के मनों से सीधे ‘चैट’ कर रहे हैं। कई बार उसमें कोरा आदर्शवाद भी झलका, लेकिन प्रधानमंत्री की भावना पवित्र ही लगी। लेकिन समय के साथ जब समस्याअो ने सर उठाना और सवालों ने चुभना शुरू किया तब ‘मन की बात’ से जो अपेक्षाएं थीं, वह अपूरी सी महसूस हुईं। गोमांस को लेकर हत्या, असहिष्णुता, राष्ट्रद्रोह, अोपीआरपी, राज्यों के विवाद आदि ऐसे कई मुद्दे थे, जिनके उत्तर लोग प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ में ढूंढना चाहते थे, उनसे आश्वस्त होना चाहते थे। पीएम के मन और देश के मन को एकाकार देखना चाहते थे। इसी में कहीं दरार महसूस होने लगी। बात हुई भी बहुत देर से। धीरे- धीरे ‘मन की बात’ आव्हान के बजाए प्रवचन का रूप लेने लगी। यूं मोदी की बात में आज भी इतनी ताकत है कि वे पूरे देश को दौड़ा दें। लेकिन वे कई बार अनावश्यक भावुक तो कभी ‘बेखबर’ होते दिखे। शीर्ष राजनेता को जनता की भावना से एकाकार होना चाहिए। यह तभी संभव है कि  जब ‘मन की बात’ में ‘जन की बात’ भी उसी शिद्दत से शामिल हो। खेत की बात खलिहान की तरह सुनने का विभ्रम न हो।

बेशक ममता का आरोप राजनीति से प्रेरित है, लेकिन लोगों की अपेक्षाएं तो देश और समाज हित से प्रेरित ही हैं। प्रधानमंत्री देश के मन में घुमड़ते सवालों का तुरंत जवाब दे दें तो ममता जैसे नेताअोंको ‘मन की बात’ को ‘मोदी की बात’ कहने की हिम्मत ही न हो।

 

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY