यूपी भाजपा के दर्जन भर ‘काबिल’ चेहरे !

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जब मुख्यमंत्री बनने लायक एक दर्जन चेहरे हों तो कोई ऐक चेहरा तय करना उतना ही कठिन है, जितना कि स्वयंवर में योग्य वर की तलाश। चेहरों की इस चकाचौंध में केंद्रीय रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा ने बलरामपुर में दावा किया कि यूपी में बीजेपी के पास मुख्यमंत्री के लायक 1 नहीं बल्कि 12 योग्य चेहरे हैं। जबकि दूसरी पार्टियों के पास तो एक एक ही है।  सिन्हा ने यह नहीं बताया कि ये 12 नगीने हैं कौन? अगर ये वास्तव में हैं तो उनके बताने में कौन-सी पर्दादारी है? अगर नहीं है तो किसी एक का नाम लेकर पार्टी राज ऋण से मुक्त क्यों नहीं हो जाती?

राजनीतिक पुराण में एक पद के लिए एक से ज्यादा समान चेहरों का उदाहरण रावण का है, जो हर वक्त दस चेहरे साथ लिए चलता था। उसकी चुनावी स्ट्रेटेजी भी यही थी कि इकलौती कुर्सी के लिए रावण दल में कई चेहरों का भरम बनाए रखा जाए ताकि अपनी पार्टी और विरोधियों में भी नेता को लेकर कन्फ्यूजन बना रहे। दशानन अगर राजतिलक के पहले अपने बाकी नौ चेहरों को कैबिनेट मंत्री पद का वादा कर देता तो भी समस्या अनसुलझी रहती। क्योंकि बाकी चेहरों ने चुनाव प्रचार में हिस्सेदारी इसी भरोसे में की थी कि नतीजे आते ही उन्हें सीएम बना दिया जाएगा। जबकि रावण खुद खाली सिंहासन पर अपना रूमाल यह कहकर रख चुका था कि पार्टी का असली ‘फेस ‘तो मैं ही हूं।

भाजपा का मामला थोड़ा अलग है। यहां चेहरे कई हैं, लेकिन उनकी सही पहचान नहीं है। कुछ और भी माइनस पाॅइंट हैं। मसलन चेहरा सुदर्शन है तो पब्लिक में प्रभाव नहीं है। प्रभाव है तो पकड़ नहीं है। पकड़ है तो चेहरा अपीलिंग नहीं है। अपीलिंग है तो विवादास्पद कम है। विवादास्पद है तो विचारधारा से कमजोर है। शायद  इसीिलए मंत्री जयंत सिन्हा ने संभावित चेहरों की केवल आंकड़ा बताया, नाम नहीं गिनाए। उनकी बात प्रमाण मानकर 12 का हिसाब लगाएं तो गाड़ी 9 के आगे नहीं जाती। तर्क‍ दिया जा सकता है कि जब रावण के बाकी नौ सिरों  के नाम किसी को नहीं मालूम तो यूपी भाजपा में सीएम पद के सभी दावेदारों के नाम पूछना तो ‘देशद्रोह’ जैसा है। फिर भी सहिष्णुता को साक्षी मानकर लिस्ट  बनाएं तो जो चेहरे सामने आते हैं, वे हैं-राजनाथ सिंह, स्मृति ईरानी, योगी आदित्यनाथ और ‘हनी ट्रैप’ में फंसे वरूण गांधी। इनके बाद डाॅ. महेश शर्मा व कलराज‍ मिश्र, डाॅ दिनेश शर्मा, वगैरह के नाम हैं। चाहें तो साध्वी निरंजन ज्योति, साक्षी महाराज इत्यादि को रिजर्व चेहरों में रख सकते हैं। क्योंकि ये सभी पंगा ब्रिगेड के सक्रिय सदस्य हैं। मौका पड़े और उम्र की लक्ष्मण रेखा ढीली हो तो कल्याण सिंह राज्यपाली छोड़कर सीएम बन सकते हैं। एक नाम पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष केशव मौर्य का भी है।

दरअसल ज्यादा चेहरे होना भी खराब है। इससे तो बेचेहरा पार्टी ही ज्यादा अच्छी। दाग दिखने का डर नहीं रहता। खतरा यह भी है कि यदि किसी एक चेहरे को सीएम पद का दावेदार घोषित कर ‍िदया तो यूपी की उलझी पालिटिक्स में बाकी ग्यारह चेहरे मुरझा न जाएं। पार्टी की इसी दुविधा को देखते हुए हाथरस के एक भाजपा कार्यकर्ता ने संभावित युवा मुख्‍यमंत्री के रूप में अपने नाम के पोस्टर लगवा दिए थे। यह बात अलग है कि न संगठन न और न ही संघ ने उस दावेदारी को गंभीरता से लिया। भाजपा की परेशानी यही है कि उसके पास कई ‘काबिल’ चेहरे तो हैं मगर ‘चमत्कारी चेहरा’ एक भी नहीं है, जो चुनाव जिता सके। ऐसे में बंधी मुट्ठी ही लाख की होती है, जैसा कि मंत्री मनोज सिन्हा ने कहा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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