शराबबंदी मार्फत नोटबंदी !

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ये है नोटबंदी का सकारात्मक असर। पहल हुई थी बिहार में, असर दिख रहा यूपी में। छोटे नोटों का टोटा पड़ने से शौकीन मयखानों से मुंह मोड़ रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिसके लिए रात दिन एक किए हैं,  वही काम यूपी में बिना राजनीतिक नारेबाजी के हो रहा है। कानपुर की खबर है कि शराब ठेकों पर शाम से होने वाली रौनक पहले सी नहीं रही। क्योंकि लोगों के पास नकदी ही नहीं है। जिनके पास थी, वो 8 नवंबर को नोटबंदी की रात इतनी गटक गए कि हाथ में कुछ बचा ही नहीं। उधर बिहार में यह मांग उठ गई है कि  पुराने नोटों की तरह पुरानी शराब भी बदलने का मौका मिले। ता‍कि बदले में फ्रेश माल मिल सके। कहते हैं कि शराबबंदी पर अड़े नीतीश कुमार ने इस ‘रचनात्मक सुझाव’ को गंभीरता से लिया।

कुल  जमा मैसेज यही कि नोटबंदी से माहौल बदल रहा है। बड़े नोटों पर पाबंदी से शुरू हुई बात मजबूरन ‘पैगबंदी’ तक आन पहुंची है। यूं नेशनल सेम्पल सर्वे के मुताबिक प्रति सप्ताह शराबखोरी में यूपी बिहार से पीछे है। उप्र में समाजवादी पार्टी का राज है और वह ऐसा कोई काम नहीं करती, जिससे समाज को तकलीफ हो। लिहाजा यूपी में पीने के लिए लोग बिहार से आते हैं। यहां सब कुछ ‘मजे’ में चल रहा था, लेकिन नोटबंदी ने मयखानों का जायका बिगाड़ दिया। पीने वालों का कहना है कि बैंकें एक बार में सिर्फ चार हजार के छोटे और नए नोट दे रही हैं। ऐसे में दाल-चावल खरीदें या फिर ‍अद्धी अथवा बोतल। सो फिलहाल स्वघोषित शराबबंदी लागू है। हालांकि इससे राज्य का आबकारी विभाग परेशान है। रोज शाम को महफिल सजाने वाले यूं मुंह मोड़ने  लगेंगे, उम्मीद नहीं थी। एक आबकारी अधिकारी के मुताबिक नोटबंदी के बाद से शराब बिक्री चालीस फीसदी घट गई है। जबकि आम दिनों में कानपुर में रोज 21 हजार बोतल अंगरेजी, 40 हजार बोतल बियर और 35 हजार लीटर देशी शराब की बिक्री होती थी। क्योंकि शराबियों के जेहन में नोट बदलवाने  की चिंता ज्यादा है।

उधर नोटबंदी का समर्थन करने वाले नीतीश कुमार के सामने एक नया पेंच खड़ा हो गया है। पटना स्थित राज्य सचिवालय में आयोजित ‘लोक संवाद’ कार्यक्रम में शामिल लोगों ने ‘जनहित’ में सुझाव दिया कि उन्हें भी नोटों की तरह शराब बदलने का ‘सुअवसर’ मुहैया कराया जाना चाहिए। तर्क था कि बिहार में कई लोग ऐसे हैं जिनके पास शराब है,  लेकिन वो उसका सेवन नहीं कर सकते। ऐसे में सरकार ब्रांड को बदलने का मौका दे। हालांकि इस सुझाव के बावजूद नीतीश अपने स्टैंड पर कायम हैं। उन्होने साफ कहा कि शराबबंदी पर किसी तरह का समझौता नहीं होगा। अलबत्ता इसके कड़े कानूनों को नरम बनाने पर विचार हो सकता है। इसके लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई जाएगी। किसी ने उन्हें बताया कि बिहार में भले न बिक रही हो, पर हरियाणा से बराबर सप्लाई हो रही है। इस पर ‍नीतीश ने कहा कि इसका कोई अलग नेटवर्क होगा।

शराबबंदी के इस पेचीदा मसले पर कुछ दूरदृष्टाअों की सोच है कि जब नोटबंदी से ही स्वत: शराबबंदी हो रही है तो फिर राज्य में इसके लिए अलग से ‘ड्रेकोनियन लाॅ’ क्यों? नीतीश को तो शराबबंदी का जनादेश मिला था। लेकिन यूपी में जो काम वोटों से न हुआ, वह ‘नोटों’ के कारण होता दिख रहा है। अन्य राज्यों में भी कमोबेश यही स्थिति होगी। ‘नोटबंदी’ का यह  पाॅजिटिव साइड इफेक्ट है। मुमकिन है कि मोदी सरकार कल को इस नतीजे पर पहुंचे कि लोगों के हाथ में जब नोट ही न रहेंगे तो तमाम सामाजिक बुराइयां खुद ही बंद नोटों की तरह ‘गायब’ हो जाएंगी। इससे ज्यादा अच्छे दिन भला और क्या हो सकते हैं?

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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