10 जनपथ की दौड़ में जनता का पथ भूले मप्र के कांग्रेसी

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मप्र में कांग्रेस ने दो और उप चुनाव में हार का वरण किया…। भाजपा के समर्थकों के लिए यह खबर जितनी सुखद और हर्ष कारक है, कांग्रेस के समर्थकों और कार्यकर्ताओं के लिए विशाद और निराशाजनक। कार्यकर्ताओं की आस धीरे-धीरे टूट रही है कि उनकी पार्टी अपने बूते फिर सत्‍ता पर काबिज होगी। ऐसा नहीं है कि कार्यकर्ताओं में संघर्ष का जज्‍बा नहीं बचा बल्कि यहां तो नेतृत्‍व कमतर साबित हो रहा है। जब प्रदेश में मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान परिश्रम की पराकाष्‍ठा (उन्‍हीं के शब्‍दों में) कर रहे हों तथा भाजपा संगठन अपना मैदानी वर्चस्‍व बनाए रखने के लिए नित नए उपक्रम कर रहा हैं ठीक उसी समय प्रदेश कांग्रेस कार्यालय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बगैर उजाड़ सा है। यहां के नेताओं का समय प्रदेश कार्यालय तथा जनता के बीच कम 10 जनपथ की संकेतों के विश्‍लेषण में अधिक गुजारता है। यहां के नेताओं का कद जन समर्थन से नहीं बल्कि इस बात से तय होता है कि कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने किससे मुस्‍कुराकर बात की तथा किसे राहुल की सभा में पिछली पंक्ति में जगह मिली। न कांग्रेस के पास स्‍पष्‍ट नेतृत्‍व है और न कार्यकर्ताओं के लिए साफ कार्यक्रम। समर्थक नेता को देख नारे लगाते हैं और चुनाव के समय सक्रिय हो जाते हैं। अब तो यह चुनावी सक्रियता भी मुंह देखे तिलक की तरह हो गई है। ऐसे में शिवराज और भाजपा को बेफिक्र हो जाना चाहिए कि उन्‍हें कांग्रेस से कोई चुनौती नहीं मिलने वाली। ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेसी निश्चिंत है कि जनता का भाजपा से मोहभंग होगा और सत्‍ता उनकी झोली में आ गिरेगी। इसी निश्चिंतता में वे कोई परिश्रम नहीं करना चाहते।

शहडोल लोकसभा और नेपानगर विधानसभा उपचुनाव के परिणामों का विश्‍लेषण करने पर यही पता चलता है कि कांग्रेस नेता बिल्‍ली के भाग्‍य से छिंका टूटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो प्रचार के दौरान एकजुटता दिखाई देती। ठीक वैसी एकजुटता जैसी एडवोकेट विवेक तन्‍खा के राज्‍यसभा निर्वाचन के समय दिखाई दी थी। लेकिन हमें या रखना चाहिए कि तब तन्‍खा के व्‍यक्तिगत सम्‍बन्‍धों के कारण कांग्रेसी नेता एक हुए थे। इन क्षत्रपों के लिए पार्टी नहीं व्‍यक्ति मायने रखता है तभी तो दिग्‍गज नेता हिमाद्रि सिंह को शिवराज और भाजपा से मुकाबले के लिए अकेला छोड़ देते हैं। यहां यह उल्‍लेख किया जा सकता है कि शहडोल में प्रचार के लिए वरिष्‍ठ नेता कमलनाथ दो बार तथा ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया दो दिन रूके थे। इसके मुकाबले अकेले मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक दर्जन से अधिक दौरे किए। जीत की चाह की तुलना की जा सकती है। असल में कांग्रेस यदि अपना आकलन करे तो पाएगी कि उसका हर नेता एक अलग गुट को पोषित कर रहा है लेकिन कांग्रेस की समग्रता में चिंता नहीं कर रहा है। कांग्रेस को यदि भाजपा के मुकाबले स्‍वयं को खड़ा करना है तो उसे एक स्‍पष्‍ट कार्यक्रम के साथ कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना होगा, संगठन सुदृढ़ करना होगा और प्रदेश में एक नेतृत्‍व तय करना होगा। अन्‍यथा तो जीत का घी किसी ओर की थाली में गिर जाने के भय से कोई नेता पूरे समर्पण और सक्रियता से मैदान में सक्रिय नहीं होगा। हाईकमान की ओर से जब क्षत्रपों तक यह संदेश चला जाएगा कि 10 जनपथ तक की दौड़ से अधिक  जनता की ओर जाने वाले पथ पर जाना आवश्‍यक है तो संगठन भी जनता से जुड़ जाएगा। अन्‍यथा तो नेताओं की आमद और जन्‍मदिन पर जिंदाबाद के नारे लगाने वाले मुट्ठी भर समर्थक सत्‍ता में वापसी की राह नहीं खोल सकते।

 

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