गुरुमूर्ति के खुलासे में नोटबंदी की गोपनीयता (?) का खुलासा

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विमुद्रीकरण-आयोजना में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक एस. गुरुमूर्ति ने विवादों के नए पंख लगा दिये हैं। विमुद्रीकरण से अभिभूत गुरुमूर्ति ने सोमवार को मीडिया के सामने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नोटबंदी की तुलना परमाणु विस्फोट से करते हुए इसे वित्तीय पोखरण निरूपित किया है। वो सिर्फ विमुद्रीकरण की लाभप्रद व्याख्याओं तक सीमित रहते तो राजनीति की लहरें विचलित नहीं होतीं, लेकिन उन्होंने यह कहकर लहरों को ज्वार-भाटे में तब्दील कर दिया है कि सरकार 2000 के करंसी-नोट अगले पांच सालों में चलन से बाहर करने वाली है। एक समाचार-एजेंसी के माध्यम से जारी गुरुमूर्ति के साक्षात्कार में जिस तरीके से घटनाक्रम की परतों को उघाड़ा गया है, वह कई स्थानों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस दावे को टोकती हैं कि नोटबंदी में शत-प्रतिशत गोपनीयता का ध्यान रखा गया।
2000 के नोट बंद करने की बात करके गुरुमूर्ति ने नोटबंदी से जुड़े हर मामले में कांग्रेस को हमलावर रुख अख्तियार करने का मौका दे दिया है। गुलामनबी आजाद ने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल किया है कि आखिर सरकार कौन चला रहा है… सरकार गुरुमूर्ति चला रहे हैं…प्रधानमंत्री चला रहे हैं…वित्तमंत्री चला रहे हैं अथवा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया चला रही है? नोटबंदी के मसले में मोदी-सरकार पहले भी गलती कर चुकी है। विमुद्रीकरण का ऐलान प्रधानमंत्री के बजाए वित्तमंत्री या रिजर्व बैंक को करना चाहिए था। गुरुमूर्ति के बयान में विमुद्रीकरण की सैद्धान्तिक व्याख्याएं वाजिब हैं, लेकिन 2000 के नए नोट को बंद करने की बात विवादास्पद है। नोटों को चलन से बाहर करने की बात लोगों को भ्रमित करने वाली है। आरएसएस के शीर्षस्थ आर्थिक-विचारक गुरुमूर्ति ने निश्‍चयात्मक-रूप से घोषणा करने वाले अंदाज में पांच सालों में 2000 के नए नोटों को चरणबद्ध तरीके से चलन से बाहर करने के स्पष्ट संकेत दिए हैं।
गुरुमूर्ति ने जिस तरीके से तथ्यों का खुलासा किया है, उससे गोपनीयता के सभी दावे खारिज हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह दावा करते नहीं थक रहे हैं कि किसी को कानो-कान नोटबंदी की खबर नहीं थी। गुरुमूर्ति कहते हैं कि विमुद्रीकरण की योजना रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को हटाने के दो महीने बाद बनाई गई है। वो यह दावा करते हैं कि योजना पर विचार करते समय ही पता था कि नोटबंदी को गोपनीय रखने के कारण कुछ तकलीफों का सामना करना पड़ेगा। गुरुमूर्ति ने यह भी बताया है 2000 के नए नोटों को छापने के पीछे क्या मजबूरी है? मात्र दो महीनों में 500 और 1000 के नए नोटों को छापना संभव नहीं था। ये नोट छापने से तीन-चार गुना काम बढ़ जाता। इसलिए उसे कुशन देने के लिए 2000 के नोटों को छापना उचित समझा गया। विमुद्रीकरण को लागू करने का यही सबसे उपयुक्त अवसर था। भविष्य में दुबारा नोटबंदी लागू करना लगभग असंभव है।
मीडिया से गुरुमूर्ति का ये निश्‍चयात्मक संवाद कांग्रेस, सपा और बसपा सहित समूचे प्रतिपक्ष के इन आरोपों को ताकत देता है कि मोदी-सरकार ने अपने राजनीतिक-हित सुरक्षित करने के बाद ही नोटबंदी को लागू किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने नोटबंदी में 8000 करोड़ के घपले का आरोप लगाया है, जबकि बिहार-सरकार नोटबंदी के पहले कई जिलों में भाजपा द्वारा की गई जमीन की खरीद-फरोख्त की जांच कर रही है। मायावती भी इसे उप्र के चुनाव के संदर्भ में विपक्षी दलों के खिलाफ राजनीतिक-साजिश निरूपित कर चुकी हैं।
सूचना एव प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू ने गुरुमूर्ति का बचाव करते हुए कहा है कि वो राष्ट्रवादी व्यक्ति हैं। उनके सुझाव देने में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। गुलाम नबी आरोप इसलिए लगा रहे हैं कि यूपीए कार्यकाल में फैसले प्रधानमंत्री के स्थान पर सोनिया गांधी लिया करती थीं। गुरुमूर्ति को हक है कि वो समग्र मुग्धता और स्निग्धता के साथ विमुद्रीकरण की विवेचना करें और उसके परिणामों का बखान करें। उन्हें यह खुशफहमी भी है कि इतना धन दुबारा सिस्टम में जमा होने में दस साल लग जाएंगे। गुरुमूर्ति मानते हैं कि मोदी के इस वित्तीय-पोखरण ने काले धन के अर्थ-तंत्र की धज्जियां उड़ा दी हैं। लेकिन क्या गुरुमूर्ति को यह अंदाज है कि नोटबंदी के बारे में जो तथ्य सार्वजनिक किए गए हैं, उससे जाहिर होता है कि नोटबंदी की गोपनीयता में काफी झीनापन था? इससे मुद्दे पर राजनीति होना स्वाभाविक है।

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