राष्ट्रपतिजी, वो नहीं जानते कि लोकतंत्र का दम घुट रहा है

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लोकसभा और राज्यसभा में शीतकालीन सत्र का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सत्तारूढ़ दल और विपक्ष दोनों जनता के नाम पर मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हैं। संसदीय शिष्टाचार और शिल्प की धज्जियां उड़ाने का जो सिलसिला पहले दिन शुरू हुआ था, वो अंतिम दौर में भी जारी है। इसके पहले देश की राजनीति इतने निचले दौर से कदाचित ही गुजरी होगी। यह पहला अवसर है, जब राजनीतिक दल देश की जनता की परेशानियों को नजरअंदाज करके कलह के गरम तवे पर सिर्फ चुनावी रोटियां सेकना चाहते हैं। संसदीय परम्पराओं की दृष्टि से शर्मसार कर देने वाले शीतकालीन सत्र की समयावधि में मात्र दो दिन शेष हैं।
दो दिन पहले भारतीय जनता पार्टी की ओर से कहा गया था कि प्रधानमंत्री आखिरी के तीनों दिन सदन में उपस्थित रहेंगे और नोटबंदी पर होने वाली बहस में शिरकत करेंगे। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि वो भी नोटबंदी के मामले में सरकार का असली चेहरा उजागर करेंगे। इन घोषणाओं से महसूस हुआ था कि नोटबंदी से परेशान जनता का दर्द सही अर्थों में सामने आएगा, पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे को सुनेंगे, जनता की तकलीफों को समझेंगे और समाधान के रास्ते निकालेंगे। लेकिन सप्ताहांत की लंबी छुट्टियों के बाद जब भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा, सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस की टीम संसद भवन में सामने आई तो पता चला कि पक्ष-विपक्ष के सींग और सिर पहले की तरह ही एक-दूसरे से अटके हुए हैं। पहले उनकी आंखों में नमी थी, जुबान पर गमी थी, जबकि आज उनकी आंखोें में अंगारे थे, और शब्दों में गरम फव्वारे थे। बनासकांठा और बहराइच की सभाओं में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों में भीगापन और मजबूरी छलक रही थी कि नोटबंदी के मसले पर देश की सवा सौ करोड़ जनता की बात सदन में रखने से विपक्ष उन्हें रोक रहा है। दूसरी ओर, राहुल गांधी के चेहरे पर यह बेचारगी और बेचैनी थी कि सत्ता पक्ष सदन में उनको नोटबंदी की असलियत रखने नहीं दे रहा है। लेकिन दोनों सदनों में बुधवार के घटनाक्रम ने जाहिर कर दिया है कि राजनीतिक दलों के लिए जनता की समस्याएं बेमानी हैं। राजनेताओं ने अपने करतबों से संसद को राजनीति की नाट्यशाला में तब्दील कर दिया है। कल तक जो नेता सदन की कार्यवाही में हिस्सेदारी के लिए आर्त्तनाद करते दिखाई दे रहे थे, वही आज सदन में एक-दूसरे पर गुर्रा रहे थे। एक ओर राहुल गांधी की शब्दावली में यह धमक धधक रही थी कि उनके पास प्रधानमंत्री से जुड़ी ऐसी निजी करप्शन की जानकारियां हैं, जिसको लेकर वो डरे हुए हैं और इसीलिए उन्हें बोलने से रोका जा रहा है, ताकि वे सदन में वो जानकारियां नहीं रख सके। राहुल का दावा है कि यह जानकारी ऐसी है, जिससे प्रधानमंत्री मोदी का गुब्बारा फूट जाएगा। दूसरी ओर, केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर राहुल को यह कहकर भयभीत करने की कोशिश कर रहे थे कि वो प्रधानमंत्री के बारे में बोल कर तो देखें, उनको उनकी असलियत का पता चल जाएगा। राहुल गांधी पर पलटवार करते हुए जावड़ेकर ने कहा कि वह जितना भी बोलेंगे, उतनी ही कांग्रेस बेनकाब होगी। राहुल के कहने से संसद में भूकंप नहीं आएगा, बल्कि उनके खुद के पैरों तले जमीन खिसक जाएगी।
भाजपा बनाम कांग्रेस के बीच जारी इस राजनीति के कलह-तंत्र के बीच राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की आवाज किसी को सुनाई नहीं पड़ रही है कि भगवान के लिए वह काम करो जिसके लिए आपको जनता ने निर्वाचित किया है। शीत कालीन सत्र के हश्र पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए राष्ट्रपति ने गहरा दुख जताते हुए कहा था कि संसदीय कार्यवाही में अवरोध पैदा करके सांसद आम जनता की आवाज को कुंद कर रहे हैं। संसदीय लोकतंत्र में कार्यवाही में अवरोध पैदा करना सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गुनाह है, जिसके लिए किसी को भी माफ नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भले ही इसे बड़ा लोकतांत्रिक गुनाह करार दें, लेकिन जो इसके गुनाहगार हैं, उन्हें यह एहसास ही नहीं है कि वे लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं।

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