ऐसे तंग तंत्र में कैसे बना रहे गण राज

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परेशान किसान
यह महज संयोग ही है कि 68 वें गणतंत्र के पूर्व दिवस पर मंत्रालय में समीक्षा बैठक करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सवाल उठाया कि इंसान का बोझ इंसान क्यों ढो रहा है? वे हाथ रिक्शा। और साइकिल रिक्‍शा की बात कर रहे थे, लेकिन बात दूर तक जानी चाहिए। हमें गणतंत्र मिले सात दशक होने को आए हैं, इस उम्र में व्यक्ति इहलोक छोड़ने की तैयारी कर चुका होता है, लेकिन बतौर एक राष्ट्र अभी हम कई मामलों में घुटनों चलने की स्थिति में ही हैं। तकनीक में हम समृद्ध हो रहे हैं, लेकिन प्राथमिक‍ शिक्षा में हमारा स्तर ‘बालवाड़ी’ सा ही है। शिक्षा, स्वास्‍थ्‍य  और सुरक्षा के तमाम आंकड़ों पर हम वर्ष भर बात करते हैं। इसमें किसान मृत्यु‍ के आंकड़ों को ही देखें। ताजा जानकारी बताती है कि भारत में वर्ष 2015 में खेती से जुड़े 12602 व्यक्तियों ने आत्महत्या की। इनमें 4595 खेती पर निर्भर मजदूर शामिल हैं। सबसे ज्यादा महाराष्ट्र (1261) और उसके बाद अपना मप्र (709)। देश में 2013 में 11771, 2014 में 12360 और फिर 2015 में कृषि से जुड़े 12602 लोगों ने आत्महत्या की है। इसे क्या कहा जाना चाहिए? कृषि की तरक्कीइ? विरोधाभास यह है कि सड़क किनारे जमीनों के भाव आसमान पर पहुंचे और कई किसान जमीन बेच-बेच कर करोड़पति हो गए। लेकिन इनके लिए जमीन सौदा थी। वे जिनके लिए खेती जीवन है वे जमीन बेच तो नहीं पाए लेकिन कर्जदार हो गए। कर्ज भर नहीं पाए और दिमागी संतुलन खो बैठे। पैसे थे नहीं तो झाड़-फूंक में इलाज खोजा गया और इसी अवस्था में हुई आत्महत्या के बाद पुलिस डायरी में दर्ज किया जाता है कि किसान की मौत फसल की बर्बादी, उसके सही दाम न मिलने या कर्ज न चुका पाने के कारण नहीं बल्कि अंधविश्वास (याद कीजिए मप्र के गृहमंत्री ने विधानसभा में बयान दिया था कि सीहोर जिले में किसानों की मृत्यु भूत-प्रेत के कारण हुई है) के कारण हुई है। यह असल में व्यवस्था की खामी है, जहां इंसान ही जब अपने परिवार पर बोझ बन जाता है तो जीवन त्याग देता है।
कर्ज को बढ़ावा देने वाले तंत्र को सोचना होगा कि वह आत्म निर्भर नहीं सरकार पर निर्भर समाज का निर्माण कर रहा है, जिसका एक छोर आत्महत्या की ओर जाता है। यह समझना होगा कि ऐसी व्यवस्था बाजार को तो पोषित कर सकती है, लेकिन बराबरी के गणतंत्र का निर्माण नहीं कर सकती। अभी तो हम एक ऐसे तंग समाज का निर्माण कर रहे हैं जहां संवेदनशीलता, परस्पर सहकार और सदाशयता का भाव तिरोहित हो रहा है। ऐसे सीमित समाज में जहां लोक कल्याण नहीं पूंजी का विधान है, भारत स्पंदित नहीं हो सकता है।

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