शिवराज : अहंकारी राजनीति में समन्‍वयी चेहरा

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शिवराज सिंह चौहान बीते 13 वर्षों से मप्र के मुख्‍यमंत्री हैं और इस लंबे कार्यकाल में वे कई राजनीतिक व प्रशासनिक चुनौ‍तियों से जिस अंदाज से निपटे हैं वह सभी के लिए चौंकाने वाला रहा है। उनके बारे में हमेशा यह चर्चा रही है कि शिवराज के पास राजनीति का ऐसा कौन सा ‘तावीज’ है जिसके प्रभाव से भाजपा में उनके प्रतिस्‍पर्धी नेता ‘साइड लाइन’ हो गए और विरोधी दल कांग्रेस के नेताओं को इतनी ताकत नहीं मिल पा रही है कि वे शिवराज को मुकाबले की चुनौती दे पाएं। 5 मार्च को मुख्‍यमंत्री चौहान का जन्‍मदिन है और यह उपयुक्‍त अवसर है जब हम उनकी राजनीति के उन विविध आयामों की पड़ताल कर सकते हैं, जो उन्‍हें दूसरों से अलग बनाते हैं।

असल में, शिवराज राजनीति की उस धारा का प्रतिनिधित्‍व करते हैं जो आतंक नहीं जमाती बल्कि परस्‍परता से कार्य करने को महत्‍व देती है। गुजरे अतीत में ऐसे कई उदाहरण हैं जब शिवराज का तीखा विरोध हुआ, लेकिन उन्‍होंने कभी आक्रामक रुख अख्तियार नहीं किया, ऐसा तभी हुआ जब उन पर व्‍यक्तिगत हमले किए गए। व्‍यक्तिगत हमले का शिवराज ने हर स्‍तर पर, हर संभव तरीके से प्रतिकार किया है। हमें याद है कि परिवार पर लगे आरोपों पर जब विधानसभा में विपक्ष ने बोलने नहीं दिया तो कैसे तमतमाए शिवराज ने विधानसभा परिसर के सभागार में मीडिया के सामने विस्‍तार से अपनी बात रखी थी। इसी प्रतिष्‍ठा के लिए वे न्‍यायालय तक भी गए और अदालत परिसर में पांच घंटे रह कर मानहानि पर अपनी बात रखने में भी पीछे नहीं रहे। ताजा उदाहरण, विधानसभा के वर्तमान बजट सत्र का है जब नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने व्‍यक्तिगत आरोप लगाए तो मुख्‍यमंत्री ने बराबरी का उत्‍तर देते हुए चुरहट लाटरी को याद कर लिया। इन उदाहरणों के विपरीत कई ऐसे वाकये भी हैं जब उन्‍होंने राजनीतिक दुश्‍मनी निभाने की जगह परस्‍पर सम्‍मान, मैत्री, संवाद और सुलह को महत्‍व दिया है।

उद्देश्‍य की राजनीति को केन्‍द्र में रख शासन तंत्र चला रहे शिवराज, वर्तमान की अहंकारी राजनीति के विपरीत परस्‍पर समन्‍वय की राजनीति का एकदम अलग चेहरा हैं। वे भयदोहन की राजनीति में यकीन नहीं करते। इसी सकारात्‍मकता से वे राजनीतिक ‘टॉनिक’ प्राप्‍त करते हैं। सकारात्‍मकता की इसी राजनीति का एक सिरा नर्मदा यात्रा के रूप में धरातल पर उतरा है। यात्रा की सफलता को नापने के कई पैमाने हैं। लेकिन, नर्मदा के संरक्षण की पहल करने के मामले में तो शिवराज आगे निकल ही गए हैं। नर्मदा किनारे से राजनीति आरंभ करने वाले शिवराज ने नर्मदा को ही केन्‍द्र में रख अपनी आगत राजनीति को आकार देने का उपक्रम आरंभ किया है। नर्मदा किनारे के जन समुदाय से लेकर वैश्विक प्रभाव रखने वाले किरदारों को अभियान से जोड़ा गया है, ताकि इसकी गूंज दूर तक सुनाई दे। हम उम्‍मीद कर सकते हैं कि राजनीतिक लाभ से इतर, नदी संरक्षण की दिशा में की गई यह पहल भी उतनी ही सकारात्‍मक हो जितनी इसके सूत्रधार शिवराज की अब तक की राजनीति रही है।

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