शिक्षा केंद्र सुघ के बारे में जाने

सुरेंद्र मेहता

यमुनानगर का सुघ गांव। यहां जमीन से 2 हज़ार वर्ष पुरानी हनुमान जी की मूर्तियां निकलती रहती हैं। इतिहासवेत्ता तथा पुरातत्व में रुचि रखने वाले बारिश ख़त्म होते ही यहां इन ‘रत्नों’ को बटोरने पहुंच जाते हैं। इन मूर्तियों को चंडीगढ़ म्यूजियम अाफ आर्ट गैलरी में संजोकर रखा गया है। प्राचीन काल में पेशावर से पाटलीपुत्र तक के व्यापारिक मार्ग के मध्य सुघ एक सुन्दर नगर था। सुघ प्राचीन काल में शिक्षा के क्षेत्र में तक्षशिला के समान था। उस समय पूरे देश में 3 बड़े शिक्षा केंद्र थे जिनमें तक्षशिला और नालंदा के साथ सुघ भी शामिल था। इसका उल्लेख पाणिनि ने अपने ग्रन्थ ‘कनिष्का’ में किया है। आज आईआईटी के छात्रों को जिस तरह आईआईटीयंस कहा जाता है, उसी तरह प्राचीन समय में सुघ के विद्यार्थियों को ‘सुघने’ कहा जाता था। यहां यूनानी प्राचार्य ज्योतिष, दर्शन व अन्य शास्त्र पढ़ने आते थे । सुघ में भगवान बुद्ध के भी पावन चरण पड़े थे, यहां बौद्ध भिक्षुओं के विहार थे।

ज़िला मुख्यालय से पूर्व दिशा में अमादलपुर रोड पर लगभग 12 किलोमीटर दूर प्राचीन सुघ गांव को यमुना नदी तीन तरफ से घेरे हुए है। यह 2500 वर्ष पूर्व सुघ नगर विश्वविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध था। यहां स्थित प्राचीन टीला करीब 5 किलोमीटर में फैला हुआ है। सुघ नगर भी 15 मीटर ऊंचे टीले था जिस पर सुघ बसा हुआ था। पुरातत्व विभाग की खुदाई में सुघ गांव से लगभग 2500 वर्ष पुराने सिक्के मिले हैं, जिससे यह प्रमाणित होता है कि यह एक व्यापारिक केंद्र रहा होगा। फादर ऑफ़ इंडियन आर्कियोलॅाजी के नाम से मशहूर जनरल ए. कनिंघम ने यमुनानगर आकर सुघ को पहली बार पहचान दिलाई। उन्होंने सुघ को अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण स्थान बताया है। इसका उल्लेख चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी किया था।

wewqewqeqwसीनियर आर्केलोजिस्ट देवेंद्र हांडा का मानना है कि सुघ प्राचीन काल में लगभग सभी मुख्य व्यापारिक स्थलों का केंद्र रहा होगा। अक्सर ज़मीन से निकलने वाले पुराने बर्तन 2500 वर्ष पुराने हैं, जो कि बुद्ध के समकालीन हैं। यहां वैदिक और बौद्ध संस्कृति से संबंधित शिक्षा का तक्षशिला और नालंदा के समान मुख्य शिक्षा केंद्र था, इसका प्रमाण यहां से निकली मूर्तियां हैं। बरसात के मौसम में इस क्षेत्र में पुरानी वस्तुएं निकलती रहती हैं जिन्हें अक्सर बाहर से आए व्यक्ति एकत्रित करके अपने साथ ले जाते हैं जिस कारण बहुत-से प्राचीन समय के अवशेष लुप्त हो जाते हैं। यहां पर मुग़ल काल के सिक्के भी मिले हैं। वर्तमान में सुघ के टीले पर सतियों का स्तम्भ विद्यमान है। इतिहासकार बताते हैं कि उत्तर भारत का यह महान क्षेत्र सातवीं शताब्दी तक आते-आते ख़त्म होने की कगार पर पहुंच चुका था। इसका उल्लेख चीनी यात्री ह्वेन सांग ने सुघ में बौद्ध विहारों की दशा देखकर अपने वृत्तांत में लिखा था। ऐतिहासिक क्षेत्र होने के बावजूद सरकार द्वारा काफी समय से यहां पर कोई शोध नहीं कराया गया है।

आदिबद्री : बौद्ध संस्कृति का भी रहा है पालना
शिवालिक की पहाड़ी की तलहटी में बसा आदिबद्री अनादि काल से ही ऋषि-मुनियों की तपस्या का केंद्र रहा है। इसकी प्राकृतिक मनोहारी छटा से आकर्षित होकर ही महर्षि वेद व्यास ने पौराणिक नदी सरस्वती के उद्गम स्थल क्षेत्र में महान ग्रंथों की रचना की थी।

यहां बौद्ध काल के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इतने बड़े क्षेत्र में बौद्ध धर्म से जुड़े अवशेष पूरे हरियाणा में और कहीं नहीं हैं। इस स्थान को भी यदि सारनाथ के डिअर पार्क की तरह विकसित किया जाए तो विश्व पर्यटन केंद्र स्थापित हो सकता है। साथ ही देश की प्राचीन धरोहर को बचाया जा सकेगा। आदिबद्री यमुनानगर जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में है। करीब एक वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले बौद्ध स्तूपों और एक बौद्ध विहार के भग्नावशेष यहां खुदाई के दौरान प्राप्त हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि एक समय में इस क्षेत्र में एक से तीन हज़ार बौद्ध भिक्षु रहते थे। यहां मिले बौद्ध स्तूपों के सही आकार का पता लगाना मुश्किल है क्योंकि मिट्टी के पुराने स्तूपों को बाहर से ईंटों से ढक कर बड़ा रूप दे दिया गया है। ईंटों के ढांचे के नीचे एक के बाद एक छह तहों का आधार बना है। पुरातत्वविदों का मानना है कि इन स्तूपों का निर्माणकाल लगभग 1500 से 1800 वर्ष पूर्व का है। बौद्ध विहार बाद में 800 से 1000 वर्ष पूर्व बनाया गया होगा। इन्हीं के पास से होकर सोमनदी बहती है। वरिष्ठ पुरातत्व विशेषज्ञ डॅा. संजय कुमार मंजुल का कहना है कि यहां मिले लाल रंग के बर्तनों का संबंध गुप्त काल से है। आदिबद्री के इस क्षेत्र का अभी तक बौद्ध क्षेत्र के रूप में प्रचार-प्रसार नहीं किया गया, जिस कारण यह आस्था का केंद्र नहीं बन पाया। द बुद्धिस्ट फोरम के अध्यक्ष सिद्धार्थ का मानना है कि कि डिअर पार्क की तरह यमुनानगर के आदिबद्री में लगभग 1 किलोमीटर क्षेत्र में बौद्ध विहार के अवशेष मिले हैं। इसके बावजूद यहां की धार्मिक महत्ता को लोगों के सामने नहीं लाया गया।

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