छवि भारद्वाज : इसके-उसके ‘बस’ की नहीं, ये सबके हित की बात

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पिछड़े और नक्सल प्रभावित क्षेत्र से सटे डिंडोरी जिले की कलेक्टर रहीं छवि भारद्वाज इन दिनों राजधानी के नगर निगम में आयुक्त हैं। स्वच्छता अभियान में भोपाल का देश में नंबर 2 होना तथा महापौर आलोक शर्मा से खट-पट उनके कार्यकाल की प्रमुख खट्टी-मीठी यादें हैं। छवि कभी सड़क किनारे दीवारों पर स्वच्छता का संदेश देने पेंटिंग करती दिखाई दीं तो कभी शहर के औचक निरीक्षण में सख्त नजर आईं। पौने पांच सौ दिनों के कार्यकाल में संभवत: यह पहला मौका होगा जब निगम आयुक्त के रूप में छवि भारद्वाज को प्रशासनिक रूप से सर्वाधिक दृढ़ता से पेश आने की जरूरत है और यह मुद्दा है बीआरटी (बस रेपिड ट्रांजिट) कॉरिडोर में स्‍कूल बसों को चलाने की अनुमति देने का।

जिला प्रशासन चाहता है कि यह अनुमति दे दी जाए। तर्क है कि बीआरटी कॉरिडोर में करीब 1000 स्कूल बसें चलेंगी तो बच्चों के स्कूल आने-जाने का समय कम होगा। मिक्स लेन पर पड़ने वाला वाहनों का दबाव भी घटेगा। स्कूल प्रशासन और भोपाल स्कूल-कॉलेज बस आनर्स एसोसिएशन आरटीओ के माध्यम से जिला प्रशासन पर यह दबाव बनाने में कामयाब हुए हैं और गेंद अब नगर निगम के पाले में जा पहुंची है। बस रेपिड ट्रांजिट सिस्टम के कायदों में बंधी नगर निगम आयुक्त छवि भारद्वाज ने यह प्रस्ताव बैरंग लौटा दिया है।

पहली नजर में तो यह मुद्दा कांच की तरह साफ, विवादहीन नजर आता है, मगर इस मुद्दे की गहराई से पड़ताल की आवश्यकता है। असल में, बस रेपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस) को प्रस्तुत ही सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के लिए किया गया था। विचार था कि अपनी गाड़ी से आवाजाही की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए सार्वजनिक परिवहन को सुदृढ़ किया जाए ताकि सड़कों पर वाहनों की संख्या भी कम हो और पेट्रोलियम पदार्थों पर होने वाला अधिक खर्च भी नियंत्रित हो सके। इसके लिए सैकड़ों करोड़ खर्च कर अलग कॉरिडोर बनाया गया। अलग बसें चलाई गईं। पांच-दस रुपए के टिकट में यात्रा समय पर होने लगी, जबकि इतनी ही दूरी के लिए कार में 50 रुपए से अधिक का ईंधन जल जाता है। आज हम जिस उद्देश्य से शहर-शहर में मेट्रो की तरफदारी कर रहे हैं, उसी कल्पना का कुछ छोटा रूप है बीआरटीएस।

सही योजना न बनाने, बसों की पर्याप्त संख्या न होने तथा बसों का रखरखाव न होने से बीआरटी में बसों का संचालन विफल हुआ, साथ ही अब बसों के चलने का समय अनुशासन भी गड़बड़ाने लगा है। राजनीतिक स्वार्थ के कारण मिनी बसों के समानांतर चलने से इन बसों का संचालन घाटे का सौदा साबित हुआ। अब नजरें कॉरिडोर पर टिकी हैं। स्कूल बसों को इन कॉरिडोर में चलने देने का अर्थ होगा अवैध-वैध वैन को भी आवाजाही की अनुमति देना। जो परिवहन विभाग इन गाडि़यों को नियमों में चलना नहीं सिखा पाया वह कॉरिडोर में कैसे नियंत्रित कर पाएंगा? स्‍कूल प्रबंधन व बस संचालक बच्चों को डेडिकेटेड लेन से सुरक्षित सर्विस लेन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी लेने का आश्वासन दे रहे हैं। जबकि अनुभव है कि जब-जब स्कूल बस या वैन दुर्घटना हुई है, सबसे पहले इन्हीं जिम्मेदारों ने पल्ला‍ झाड़ा है। वे यह क्यों भूल जाते हैं कि डेडिकेटेड कॉरिडोर व सर्विस लेन के मध्य में मिक्स लेन है, जहां का यातायात सर्वाधिक अनुशासनहीन, नियम तोड़ने वाला और बेतरतीब है और इसी बीच से बच्चों को गुजरना होगा।

निरंकुश होते वाहनों पर नियंत्रण करने से अधिक आसान बीआरटी कॉरिडोर का सामान्यीकरण कर देना है। कॉरि‍डोर में अन्य वाहन गुजरेंगे तो सार्वजनिक परिवहन का एकमात्र चेहरा बची बसों की रफ्तार भी रुकेगी। यही तो लक्ष्य है। सार्वजनिक परिवहन को खत्म करने की ऐसी हर कोशिश खारिज होनी चाहिए। छवि भारद्वाज ने पहला कदम तो उठाया है, अब महत्व इस पर कायम रहने का है। डिंडोरी की ‘दबंग’ कलेक्टर के रूप में पहचान बना चुकीं भारद्वाज के सामने इस छवि को बचाने की जितनी बड़ी चुनौती है उतनी ही जिम्मेदारी शहरवासियों की भी है। सार्वजनिक हितों के खिलाफ रची जाने वाली ऐसी साजिशों को विफल करने के प्रयासों को भोपाल में ही नहीं प्रदेश के हर शहर में ‘ताकत’ की दरकार है।

 

 

 

 

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