अमित शाह का 19 वें प्रदेश में प्रवास : मप्र के बीसा साबित होने की चुनौती

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भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह 18 से 20 अगस्‍त17 तक भोपाल में।

 

अमित शाह ने अपने नेतृत्‍व में भाजपा को नई ऊंचाई दी है। शिखर के इन चरणों में वे आराम से बैठने की जगह पार्टी को अधिक व्‍यापक बनाने और जनमत में अधिक गहराई देने के लिए परिश्रम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की सलाह पर वे प्रदेशों का दौरा कर रहे हैं तथा संगठनात्‍मक गतिविधियों के साथ पार्टी नेताओं के कार्यों का अपने पैमाने पर आकलन कर रहे हैं। शाह भोपाल आ चुके हैं तथा उनका आधिकारिक तीन दिनी दौरा 18 अगस्‍त से आरंभ होगा। विभिन्‍न राज्‍यों के प्रवास के क्रम में मप्र 19 वां राज्‍य है जहां शाह आए हैं। अब मप्र के भाजपा संगठन के सामने चुनौती है कि वह सभी राज्‍यों से बीसा साबित हो तथा अन्‍य के लिए मिसाल बने।

भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह इससे पहले संगठनात्‍मक गतिविधियों की समीक्षा करने 13 जुलाई 2015 को भोपाल आए थे। यहां मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पार्टी के महासंपर्क अभियान की समीक्षा बैठक में शाह ने कहा था कि अगर घर का बच्चा कमजोर हो तो, प्रचारित न करें और घर की कमियां बाहर बताने से बचें। तब शाह ने कार्यकर्ताओं को इशारों में नसीहतें देते हुए कहा था कि सभी को बड़ा मन रखना चाहिए। देशभर में दौरे के दौरान कार्यकर्ताओं में अवसाद देखने का उल्‍लेख करते हुए शाह ने कहा था कि कार्यकर्ताओं में नकारात्‍मक भाव है। किसी को पद नहीं मिला। किसी को टिकट नहीं दिया। किसी को मंत्री नहीं बनाया। पार्टी में अजीब प्रकार की उदासीनता है। अगर ऐसे भाव मन में होंगे तो संगठन अच्छा काम नहीं कर सकेगा। ऐसे पार्टी आगे नहीं बढ़ेगी।

दो सालों बाद शुक्रवार की सुबह जब वे संगठन के कर्ताधर्ताओं के साथ कार्यों की समीक्षा कर रहे होंगे तब यह हिदायत तथा इसे नजरअंदाज किए जाने की सूचनाएं उनके सामने होगी। ऐसे में जब प्रदेश अध्‍यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान सहित विभिन्‍न पदाधिकारी अपने कार्यों तथा सफलताओं का लेखाजोखा रखेंगे तो सबकुछ शहद-शहद नहीं होगा बल्कि कुछ नीम सरीखी कड़वी सच्‍चाइयां भी होंगी। शाह के पास प्रदेश संगठन द्वारा भेजी गई रिपोर्ट के साथ अपनी खास टीम से तैयार करवाया गया फीडबैक भी होगा। उन्‍हें पता होगा कि किसान आंदोलन की असली नब्‍ज क्‍या है और संगठन में विधायकों व मंत्रियों के कामकाज से कितनी असंतुष्टि है। उन्‍हें यह भी जानकारी होगी कि देश के सबसे मजबूत संगठन कहे जाने वाली प्रदेश भाजपा को मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के चेहरे को आगे रख कर हर चुनाव लड़ना पड़ता है। उनकी लाख हिदायतों के बाद भी मंत्री प्रभार वाले जिलों में नहीं जाते। विधायकों तक की बात अनसुनी रहती है। किसी मामूली से उपचुनाव में भी शिवराज अपनी पूरी ऊर्जा झोंकते हैं। उसकी तुलना में उतनी ऊर्जा का निवेश करने वाला कोई नेता पार्टी के पास नहीं है।

इन तमाम पहलुओं के बावजूद उजला पक्ष यह है कि मप्र का संगठन अन्‍य राज्‍यों की तुलना में अधिक समर्थ है। यहां केन्‍द्रीय नेतृत्‍व द्वारा भेजे गए कार्यक्रमों को मैदान में उतारने के जतन होते हैं। कार्यकर्ताओं का बड़ा वर्ग है जो निर्विवाद रूप से संगठन की सेवा में जुटा रहता है। शाह की वापसी के समय तक यह दिलचस्‍पी बनी रहेगी कि शिकायतों और समस्‍याओं की बदली से संगठनात्‍मक नवाचार की आभा कैसे झिलमिलाती है?

 

 

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