अमित शाह मप्र यात्रा : मन की सुनी, अपनी कही, मीडिया से खरी-खरी

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amit shah in bhopal

भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह ने अपनी मप्र यात्रा के दूसरे दिन भाजपा मोर्चा-प्रकोष्‍ठों के पदाधिकारियों, साधुसंतों, पूर्व सांसदों व विधायकों के साथ मीडिया से भी मुलाकात की। इन मुलाकातों में शाह अपने चिर-परिचित तेवर में ही दिखाई दिए। सभी से खुल कर अपनी बात रखने के लिए कहा गया लेकिन शाह ने मन भाने तक तक ही दूसरों की बात सुनी। जहां लगा, वहां तुरंत टोक दिया। जहां जी चाहा पूरी बात सुनी और समाधान भी सुझाए। मीडिया से संवाद के दौरान भी वे इसी अंदाज में पेश आए। लेकिन हर मंच पर वे अपनी बात पूरी ताकत से रखते रहे, खामियां गिनाते रहे और टारगेट भी देते रहे। हालांकि, पत्रकार वार्ता में उन्‍होंने मीडिया में आई खबरों को यह कहकर खारिज कर दिया कि मैंने ही झूठी जानकारी देने के लिए कहा था। नेताअों के बेटों के राजनीति में आगमन जो जायज ठहराते हुए शाह ने कहा कि यह परिवारवाद नहीं है।

भाजपा कैडर बेस्ड पार्टी है। उसके नेताओं-कार्यकर्ताओं को लंबे बौद्धिक सुनने की आदत रही है, लेकिन पार्टी नेताओं के साथ सख्‍ती के साथ पेश आने वाले अपने राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष के साथ बैठकों का अनुभव कम ही है। अमित शाह जब दूसरी बार पार्टी की गतिविधियों की समीक्षा के लिए भोपाल आए तो उनका अंदाज और सख्त था। पिछली बार 2015 में वे पूरा दिन भी नहीं रूके थे। इस बार वे पूरी तैयारी और होमवर्क के साथ आए हैं। उनके पास हर बात का फीड बैक है। शायद इसीलिए वे बाल की खाल निकाल रहे हैं, खुलकर खिंचाई कर रहे हैं और अपने साथ लाए फीडबैक पर संगठन व सत्‍ता के जिम्‍मेदारों से चर्चा कर रहे हैं।

शनिवार को उन्‍होंने पार्टी के मोर्चाप्रकोष्‍ठों के साथ बैठक में नाराजगी भरे स्वर में इन संगठनों के कामकाज की पोल खोल कर रख दी। शाह ने कहा कि मुझे पता है कि मेरी यात्रा के पहले अचानक सक्रियता दिखाते हुए ताबड़तोड़ नियुक्तियां की गईं। उन्होने सख्त लहजे में कहा कि मुझे पता है कि कई लोग  काम नहीं कर रहे हैं। अभी भी समय है, ऐसे लोग अपनी कार्यशैली बदलें। पार्टी के इन मोर्चा, प्रकल्पों और विभागों के कामकाज से खफा शाह ने यहां तक कहा कि आप अब तक पदाधिकारियों की घोषणा तक नहीं कर पाए तो काम कैसे करेंगे? शाह का नजरिया स्‍पष्‍ट था कि कार्यकारिणी गठन में होने वाली हीला हवाली और या अडंगे डालने की राजनीतिक अदा पार्टी की परंपरा नहीं बननी चाहिए। भाषा की यह कठोरता उनके हावभाव में भी दिखाई दे रही थी। इसी अंदाज में वो पूर्व सांसदों और पूर्व विधायकों से भी मिले। शाह ने कहा कि अब पद भले नहीं है, लेकिन इन सभी को पार्टी के लिए सकारात्‍मक माहौल बनाने के लिए काम करना चाहिए। अर्थात आपने पार्टी से लिया है तो अब उसे लौटाइए भी। फिर चाहे कोई पद मिले न मिले।  

मीडिया से कहा- स्‍तरीय सवाल पूछिए, क्‍या मैं पार्टी की कमजोरियां माइक पर बताऊंगा ?

अमित शाह की प्रेस कांफ्रेंस भी उनके मन मुताबिक ही संचालित हुई। पत्रकारवार्ता के संचालन सूत्र उन्हीं के हाथ में थे। असहज सवालों को टालने के लिए शाह ने मीिडया को नसीहत दी कि कुछ स्तरीय सवाल पूछिए। जब शाह से पूछा गया कि आपने पार्टी की बैठकों की जानकारी बाहर नहीं जाने  देने की हिदायत दी थी, लेकिन वह मीडिया में उजागर हो गई तो उन्होने नहले पर दहला मारते हुए कहा कि मैंने ही उनसे गलत जानकारी देने के लिए कहा था। चूंकि बैठक मैं ले रहा हूं तो मीडिया को सीधे मुझसे बात करनी चाहिए। बाद में, शाह ने एक अन्‍य सवाल के उत्‍तर में कहा कि पार्टी के अंदर बात रखना आंतरिक लोकतंत्र है लेकिन बाहर जानकारी देना अनुशासनहीनता है।

मुख्‍यमंत्री चौहान तथा पार्टी प्रदेश अध्‍यक्ष के नेतृत्‍व में 2018 का चुनाव लड़ने के प्रश्‍न पर शाह ने केवल इतना कहा कि दोनों नेताओं के कार्यकाल की परिधि 2019 है। नेता पुत्रों के राजनीति में आने  से जुड़े सवाल पर उन्‍होंने कहा कि पूरे जीवन पार्टी अध्‍यक्ष रहना तथा बाद में अपने बच्‍चे को अध्‍यक्ष बना देने की तैयारी असल में परिवारवाद है। नेता पुत्र यदि संघर्ष कर अपने कौशल से आगे आते हैं तो यह परिवारवाद नहीं है। प्रदेश भाजपा में सेकण्‍ड लाइन न होने पर शाह ने कहा कि सेकण्‍ड लाइन स्‍वत: तैयार होती है। उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए जाते। लेकिन ऐसे नेता पार्टी की नजर में हैं। शिवराज सरकार के कामकाज पर सौ में से सौ नंबर देने वाले शाह से जब संगठन और सत्‍ता की कमजोरी पूछी गई तो उन्‍होंने कहा कि क्‍या मैं इतना सरल लगता हूं कि पार्टी की कमजोरियों को माइक पर सार्वजनिक कर दूंगा ?

पार्टी में 75 वर्ष का कोई फार्मूला नहीं

पिछले सवा साल से 75 वर्ष की उम्र का फार्मूला भाजपा में चर्चा का विषय रहा है। इसी के तहत पिछले साल जून में वरिष्ठ नेता बाबूलाल गौर और सरताज सिंह को पार्टी ने मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया था। इस फार्मूले का सूत्रपात कहां कैसे हुआ, इस पर अक्सर बहस चलती है। पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष शाह ने साफ किया कि भाजपा में ऐसा कोई फार्मूला बना ही नहीं है। मंत्री कौन रहेगा और कौन नहीं, यह निर्णय करना मुख्‍यमंत्री का कार्यक्षेत्र है।

अंदर खिंचाई, बाहर प्रशंसा  

पार्टी की बैठकों के बारे में मीडिया को मिली जानकारियों को भले ही शाह ने गलत करार दिया हों,  लेकिन इन बात से कोई इंकार नहीं कर रहा कि उन्‍होंने सत्‍ता और संगठन की इतनी सख्‍ती से पड़ताल की कि जिम्‍मेदारों को जवाब देना भारी पड़ गया। अलबत्ता मीडिया से मुखातिब होते हुए शाह ने शिवराज सरकार की जी खोल के प्रशंसा की। उन्होने प्रदेश सरकार को मोदी सरकार की योजनाओं को मेहनत से लागू करने वाली सरकार बताया। शाह ने शिवराज सरकार से जुड़े सारे विवादों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जनादेश सबसे बड़ा होता है और कई बार जनादेश शिवराज के पक्ष में गया है।

 

 

 

 

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