आंदोलन से चर्चा के लिए भय्यू महाराज क्‍यों, नंदकुमार क्‍यों नहीं?

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पश्चिम मप्र मानसून के मौसम में भी आक्रोश की ताप से प्रभावित है। यह आक्रोश है नर्मदा पर बने सरदार सरोवर बांध के विस्‍थापितों का। सरकार कह रही है कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय के आदेश के अनुसार सभी लोगों का विस्‍थापन हो गया है, जबकि 11 दिनों से अनशन कर रही नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख मेधा पाटकर तथा उनके साथ बैठे ग्रामीण, सरकारी दावों को खारिज कर रहे हैं। मेधा के अनशन से सरकार की पेशानी पर बल पड़ रहे हैं और मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सार्वजनिक रूप से ट्वीट करते हुए मेधा के स्‍वास्‍थ्‍य की चिंता की तथा अनशन खत्‍म करने का आग्रह किया। मुख्‍यमंत्री की चिंता के मुताल्लिक ही शनिवार को एक दल ने मेधा से मुलाकात कर सुलह के प्रयास किए। इस दल में प्रमुख रूप से भय्यू महाराज और मुख्‍यमंत्री सचिवालय में पदस्‍थ झाबुआ कलेक्‍टर रहे आईएएस चंद्रशेखर बोरकर भी शामिल थे। अपने उच्‍च राजनीतिक संपर्कों के कारण संकट के ऐसे कई मौकों पर भय्यू महाराज पहले भी मध्‍यस्‍थ की भूमिका निभा चुके हैं। लेकिन, यह मध्‍यस्‍थता कामयाब नहीं हो सकी। सवाल यह है कि सरकार के सामने खड़े हुए इस सामाजिक संकट का समाधान प्रशा‍सनिक व आध्‍यात्मिक दृष्टि से क्‍यों खोजा गया? भाजपा के प्रदेश अध्‍यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान ने इस संकट का राजनीतिक हल खोजने की कोशिश क्‍यों नहीं की? नर्मदा यात्रा में मुख्‍यमंत्री के साथ खड़ा रहने वाला भाजपा संगठन इस मामले में भी दूरी बना कर क्‍यों खड़ा है? खासकर, यह जानते हुए भी कि किसान आंदोलन में यह दूरी तथा मुख्‍यमंत्री का सम्‍मान करने की जल्‍दबाजी में की गई घोषणा भारी पड़ी थी।

नर्मदा बचाओ आंदोलन का संघर्ष सामाजिक है या राजनीतिक यह तय करने के जो भी पैमाने हों, लेकिन सरकार ने इसके समाधान के तरीके प्रशासनिक व आध्‍यात्मिक रूपों से खोजने के प्रयास किए। नर्मदा मामले पर सरकार के दो पक्ष हैं– एक तो नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण और दूसरा, सामान्‍य प्रशासन। प्राधिकरण मान चुका है कि विस्‍थापन पूर्ण हो गया है और अब क्षेत्र में तनाव पैदा करने वाले लोगों को सख्‍ती से हटाया जाना चाहिए। वस्‍तुत: यह प्रशासनिक पक्ष है। जिसका नेतृत्‍व आईएएस कर रहे हैं। दूसरा पक्ष राजनीतिक दृष्टि वाला है। जो यह मानता है कि नर्मदा बचाओ आंदोलन भले ही विरोधी विचारधारा का है मगर उसके साथ प्रशासनिक सख्‍ती नहीं हो सकती। ऐसा करना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा होगा। जैसे किसान आंदोलन में हुआ। उस प्रशासनिक चूक के कारण सरकार को राजनीतिक घाटा उठाना पड़ा और उसे साधने में भारी आर्थिक क्षति भी हुई। यही चूक नर्मदा मामले में भी की जा रही है। मुख्‍यमंत्री चौहान ने स्‍पष्‍ट आदेश दिया है कि जनता के साथ किसी प्रकार की कोई हिंसक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। लेकिन प्रशासनिक दृष्टि इस आदेश की इबारत के किनारे-किनारे चलते हुए वहां पुलिस बल भेज कर धमकाने सा माहौल बना रही है। ऐसे में जनता में सरकार के खिलाफ आक्रोश पनप रहा है। इस प्रशासनिक दृष्टि का ही दोष है कि जब भय्यू महाराज मध्‍यस्‍थता करने पहुंचे तो चिखल्‍दा का माजरा देख हतप्रभ रह गए। वे बीते तीन दशकों से जारी इस आंदोलन की पृष्‍ठभूमि से तो अनजान थे ही, उन्‍होंने चर्चा में संकेत दिए कि जैसा दिखाई दे रहा है, उन्‍हें तो इसके उलट बताया गया था। यानि, वे प्रशासनिक पक्ष सुन कर पहुंचे थे, उन्‍हें इसके सामाजिक कष्‍टों और स्थितियों के बारे में गहराई से पता नहीं था। चर्चा करने गए दल के दूसरे सदस्‍य आईएएस बोरकर की उपस्थिति भी अपने से कहीं अधिक वरिष्‍ठ अधिकारी इंदौर आयुक्‍त संजय दुबे की मौजदूगी में औपचारिक भर रही। आयुक्‍त दुबे की बात से इतर जाना उनके लिए उपयुक्‍त नहीं था और उन्‍होंने ऐसा कोई प्रयत्‍न भी नहीं किया। साफ है कि संवाद की यह स्थिति सतही ही साबित हुई।

नंदकुमार सिंह चौहान इस पूरे प्रसंग में राजनीतिक दृष्टि का प्रतीक हैं। उन जैसे मुख्‍यमंत्री के तमाम हितैषियों को चाहिए कि ऐसे मसलों का हल पूर्ण रूप से प्रशासनिक दृष्टि पर छोड़ने की जगह पर्याप्‍त मात्रा में राजनीतिक हाशिया बचा कर रखें, अन्‍यथा प्रदेश के मुखिया को वे बार-बार संकट में डालते रहेंगे।

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