भोपाल में अ‍मित शाह : सीधी बात, काम की बात, अंजाम की बात

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amit shah in bhopal

37 साल पहले बनी भाजपा की राजनीतिक प्रबंधन का व्‍याकरण पूरा बदल गया है। राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह ने महज दो साल में अपने राजनीतिक कौशल और प्रबंधन से पार्टी की तस्‍वीर और तकदीर दोनों बदली हैं। एक ओर जहां उप्र चुनाव में उनके गोपनीय प्रबंधन के सहारे पार्टी ने अभूतपूर्व सफलतापाई तो अब वे अपने माइक्रो मैनेजमेंट से समूचे देश में संगठन को नई सूरत व सीरत देने निकले हैं। यह बात भाजपा के शाह के भोपाल दौरे के पहले दिन ही साबित होती दिखी। कभी दो सांसदों वाली भाजपा आज संसद की दोनों सदनों की सबसे बड़ी पार्टी है। 11 करोड़ सदस्‍य संख्‍या वाले इस व्‍यापक दल की राजनीति की भाषा अब प्रबंधन की भाषा हो चली है। इस ‘मैक्रो’ (वृहत) दल में माइक्रो प्लानिंग (सूक्ष्‍म नियोजन) के जरिए माइक्रो मैनेजमेंट (सूक्ष्‍म प्रबंधन) किया जा रहा है। इस सूक्ष्‍म प्रबंधन के सूत्रधार स्‍वयं पार्टी अध्‍यक्ष अमित शाह है। शाह ने तीन दिनी प्रवास के पहले ही दिन बैठकों में सीधी बात की, काम की बात की तथा अंजाम की बात की। उनकी शैली में आधुनिक प्रबंधन सिद्धांत के सूत्रों को आसानी से तलाशा जा सकता है। मसलन, हावर्ड बिजनेस रिव्‍यू के अनुसार कुशल माइक्रो मैनेजमेंट वह कर सकता है जो वर्तमान उपलब्‍धता से संतुष्‍ट नहीं हैं, जो कार्य के गलत दिशा में जाने से अकसर नाराज हो जाता है, जिसका ध्‍यान बारीक से बारीक विवरण पर होता है तथा कार्य के तरीकों में सुधार करने में प्रसन्‍नता महसूस करता है, जो पूरा अपडेट रखता है कि टीम के सदस्‍य कहां और क्‍या कर रहे हैं। शाह के पहले दिन के पूरे क्रियाकलापों में इन सूत्रों को बहुत स्‍पष्‍टता से देखा जा सकता है। उनका हावभाव, उनकी शैली तथा उनके भाषण बताते हैं कि अब मप्र में पार्टी संगठन सत्‍ता से संचालित नहीं होगा बल्कि यह प्रबंधन कौशल से सशक्‍त होगा और सत्‍ता सही अ‍र्थों में संगठन से संचालित होगी।

भाजपा सदस्‍य संख्‍या तथा राज्‍यों में शासक के रूप में देश की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है। इस कैडर आधारित पार्टी को सांगठनिक उत्‍कृष्‍टता देने के लिए शाह ने प्रबंधन के सिद्धांतों को अपनाया है। देश के विभिन्‍न प्रदेशों के दौरों में यह साबित कर चुके शाह ने मप्र में आते ही माइक्रो लेवल की व्‍यवस्‍था को देखा, समझा और पार्टी संगठन को समझाया भी। उनके तेवरों ने दिखा दिया कि सत्‍ता के भरोसे चलने वाले संगठन के दिन अब लदने वाले हैं। शाह ने अनुशासन को महत्‍व दिया। श्रेष्‍ठ माइक्रो मैनेजमेंट का उदाहरण देते हुए स्‍वागत की लंबी श्रृंखला को आपत्ति के साथ तोड़ दिया। उन्‍होंने प्रश्‍न उठाया कि नेताओं से नहीं कार्यकर्ताओं से संगठन है तो पार्टी के सूत्र एक-दो नेताओं के हाथ में क्‍यों रहें? हिदायत दी कि पार्टी के निर्णय व्‍यक्तिगत नहीं सामूहिक स्‍तर पर हों।

शाह साफ-साफ कह रहे थे और संगठन की कमियों को तरतीब से उजागर कर रहे थे। शाह ने जब अपने भाषण की शुरुआत में कहा कि वे कड़वा बोलेंगे और इसके लिए यह कहते हुए पहले से माफी मांग ली कि यह कड़वा बोलना संगठन के लिए आवश्‍यक है। उन्‍होंने कार्यकर्ताओं व नेताओं को अनुशासन में रहने की नसीहत देते हुए कहा कि जिसे जो काम दिया गया है वह वही काम करे। मीडिया के सामने हर कोई बोलने न लगे। इस कार्य के लिए अलग व्‍यक्ति तय किए गए हैं। कार्यकर्ता स्‍वागत सहित अन्‍य मौकों पर अनुशासन तोड़ धक्‍का-मुक्‍की न करें। भाजपा यदि अपने संस्‍कारित कार्यकर्ताओं के कारण अलग व्‍यवस्‍था वाली पार्टी है तो ऐसा दिखे भी।

छोटे-छोटे विवरण जुटाने की उनकी सख्‍ती को इसी बात से समझा जा सकता है कि विधायकों-सांसदों की बैठक में बाकायदा प्रतिनिधियों ने हाथ उठा कर अपनी उपस्थिति बताई। शाह ने भाषण व्‍यवस्‍था को सीमित कर बैठकों में उपस्थित प्रतिनिधियों से सीधी बात की तथा उन्‍हें अपनी बात कहने का मौका दिया।

शाह के मस्तिष्‍क में लक्ष्‍य साफ था और उन्‍होंने उतनी ही स्‍पष्‍टता से इसे उजागर भी किया। उन्‍होंने कहा कि यदि पार्टी की वर्तमान स्थ्‍िाति को सर्वोत्‍तम माना जा रहा है तो यह गलत धारणा है। पार्टी को अभी अपना सर्वोच्‍च शिखर छूना शेष है। इसके लिए जनता आधारित सरकार और कार्यकर्ता आधारित संगठन चाहिए। शाह ने मप्र में पार्टी को अधिक मजबूत करने का लक्ष्‍य देते हुए भाजपा की दिशा तय कर दी है। उनकी भाव-भंगिमा से महसूस हुआ कि देश के सर्वश्रेष्‍ठ संगठनों में शामिल की जाने वाली प्रदेश भाजपा में कार्यकर्ता तथा नेटवर्क अच्‍छा है लेकिन यहां भी अनुशासनहीनता, असंतोष तथा कुशल प्रबंधन का अभाव है। इन कमियों को दूर करने के लिए उन्‍होंने माइक्रो लेवल यानि सूक्ष्‍म स्‍तर के प्रबंधन का अपनाने की सीख दी है। अगले दो दिन इसी सीख को पक्‍का करने का अभ्‍यास होगा।

 

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