आखिर नेताओं को ‘छवि’ की जगह ‘दास’ क्‍यों चाहिए?

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भोपाल नगर निगम का आयुक्‍त कौन होगा यह सरकार का नितांत प्रशासनिक फैसला है, लेकिन ईद की छुट्टी के दिन रात 10 बजे बाद आदेश जारी कर निगमायुक्‍त छवि भारद्वाज को हटाने तथा टीकमगढ़ की कलेक्‍टर प्रियंका दास को नया आयुक्‍त बनाने की जल्‍दबाजी कई सवाल खड़े कर रही है। छवि भारद्वाज का महापौर आलोक शर्मा से कई मुद्दों पर टकराव जग-जाहिर है। दोनों के मध्‍य हुए इस तनाव की शिकायतें मुख्‍यमंत्री तक पहुंची थीं। सुलह की कोशिशें भी हुई मगर बात बनी नहीं और छवि हटा दी गईं। इस फैसले से दोनों पक्ष खुश ही होंगे। महापौर अपना राजनीतिक एजेंडा पूरा कर पाएंगे तो छवि को पर्यटन विकास निगम का प्रबंध संचालक बना कर सम्‍मानजनक पदस्‍थापना दी गई है। उनके लिए वहां करने के लिए बहुत कुछ है और महापौर को अगले चुनावों में स्‍वयं को साबित करना है। ‘इसकी भी जय-जय’, ‘उसकी भी जय-जय’ के मध्‍यमार्गी सिद्धांत से हुए इस फैसले ने जो सवाल उठाए हैं उनमें से प्रमुख यह है कि राजनेताओं को कुशल प्रशासक की छवि वाला अफसर क्‍यों पसंद नहीं आता? वे दास प्रवृत्ति वाले अधिकारी की चाह में क्‍यों रहते हैं?

2008 बैच की आईएएस छवि भारद्वाज राजनीतिक और प्रशासनिक तालमेल में जरा सी चूक कर गईं। वे कुशल प्रशासक थीं और अपनी इस कुशलता में वे महापौर शर्मा के राजनीतिक एजेंडे को नजरअंदाज करने लगी थीं। छवि के लिए प्रशासनिक सख्‍ती आवश्‍यक थी तो महापौर लोकप्रिय कार्य पूर्ण करने की जल्‍दी में हैं। एजेंडों का यह टकराव सार्वजनिक भी हुआ और परिणाम सामने हैं। तय है कि प्रशासनिक सुधार के जो कार्य छवि ने हाथ में लिए थे, वे अधूरे छूट जाएंगे। नई आयुक्‍त अपने व्‍याकरण से निगम की कार्यशैली को सुधारने-बदलने का काम करेंगी। वे अपने ‘नवाचार’ को पूरा कर पाएंगी या नहीं, या ‘यस मेन अफसर’ बन कर रह जाएंगी, कोई बता नहीं सकता है।

यूं तो यह मामला भोपाल की नगर निगम सीमा का है लेकिन इसका अक्‍स प्रदेश-देश के हर शहर में देखा जा सकता है। तय है कि राजधानी से निकला यह संदेश दूर तक जाएगा। असल में, राजनेताओं और अफसरों में एजेंडों को लेकर टकराव के मामले हमारे देश में लोकतंत्र जितने ही पुराने हैं। नेता एक सख्‍त और कर्मठ अधिकारी चाहते हैं लेकिन उन्‍हें कभी एक स्‍वतंत्रचेत्‍ता अफसर रास नहीं आता। यह ठीक वैसा है कि हर परिवार अपने घर के लिए पढ़ी-लिखी, कमाऊ और आधुनिक बहू चाहता है लेकिन उसका सुंदर, सुशील होना आवश्‍यक है। सुशील वह तभी कहलाएगी जब घर की तय परंपराओं और मुखिया के आदेशों का मौन रह कर पालन करती रहे। वह नवाचार करे लेकिन सीमा में। ऐसे ही रस्‍सी पर अफसरों को भी चलना होता है। उन्‍हें सत्‍ताधारी दल के राजनीतिक एजेंडे को पूरा करते हुए अपने नवाचारों और प्रशासनिक गतिविधियों का संचालन करना होता है। जो इस संतुलन को साध लेता है वह लंबी रेस का घोड़ा कहलाता है। मगर अनुभव बताते हैं कि तंत्र के अनुसार ढलने की प्रक्रिया में नए आईएएस का यह नवाचार प्रेम तथा कुछ कर गुजरने की चाह गिने-चुने वर्षों में काफूर हो जाते हैं। फिर वे वही सोचते, देखते और करते हैं जो ‘सरकार’ चाहती है।

अफसरों का ‘राजनेताओं’ जैसा व्‍यवहार और नेताओं का अफसरों को अपने ‘राजनीतिक कार्यकर्ता’ बना कर काम करवाने की चाह, दोनों ही समाज और राज्‍य के लिए शुभ नहीं हो सकती है। ऐसी किसी भी कोशिश पर सवाल उठने चाहिए।

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