‘हिंसक’ राजनीति के युग में सहअस्तित्‍व के प्रवक्‍ता पंकज और रजनीश

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वे दो धुर विरोधी पार्टियों के युवा नेता हैं। उन पर अपनी-अपनी पार्टियों के पक्ष को उजला दिखाने और विरोधी दल के काले पक्ष को रेशा-रेशा उधेड़ कर रख देने की जिम्‍मेदारी है। परस्‍पर विरोधी मत का होने के बाद भी दोनों विशेषताओं का साम्‍य लिए हुए हैं। वे दोनों वैचारिक रूप से जितने सुलझे हुए हैं, भाषाई तौर पर उतने ही सुघड़ और ‘स्‍तरीय’ है। दोनों का एक सामाजिक भाषाई स्‍तर है जिसे वे वैयक्तिक संवाद में भी कभी नहीं तोड़ते। आलोचना में तीखे होते हैं लेकिन निम्‍नतर नहीं होते। आरोप-प्रत्‍यारोपों में तर्कसंगत होने की कोशिश करते हुए इन्‍होंने विश्‍वास की नई जमीन तैयार की हैं। ये युवा नेता नई राजनीतिक शैली का ककहरा बुन रहे हैं। ये दो नेता हैं मप्र कांग्रेस के प्रवक्‍ता पंकज चतुर्वेदी और मप्र भाजपा के प्रवक्‍ता रजनीश अग्रवाल।

वरिष्‍ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्‍या के बाद जब आरोप-प्रत्‍यारोप की भाषा अपने निम्‍नतर स्‍तर पर पहुंच गई हो तब फेसबुक की एक पोस्‍ट आकर्षित करती है। यह पोस्‍ट रजनीश की है जो कहती है कि -‘मीडिया की नकारात्मकता भी हर कीमत पर अच्छी है। सारे किन्तु-परन्तु,सहमति-असहमति और विरोधाभासों के बीच अच्छी है। आरोप लगाना और थोपना, सवाल उठाना पर उत्तर भी नहीं सुनना, उसके बावजूद भी अच्छी है। लोकतंत्र के इस दौर में सूचना के आसान स्रोत हैं, सोशल मीडिया का मैदान है, हरेक के सच-झूठ को पकड़ा जा सकता हैं। सच हमेशा निरपेक्ष होता है, भले ही निर्दोष न हो। हर विचार को आने दो। हर सवाल को उठने दो। लोकतंत्र के सशक्तिकरण के लिए… समाज के सशक्तिकरण के लिए…।’ रजनीश का यह अंदाज उनकी पारदर्शी राजनीति का प्रतिबिंब है, जो मतभिन्‍नता का स्‍वागत करती है।

कुछ ऐसी ही शैली कांग्रेस के प्रवक्‍ता पंकज चतुर्वेदी की भी है। वे देशभर के कई अखबारों में नियमित लिखते हैं, सामाजिक दायित्‍व निभाते हुए विद्यार्थियों को प्रेरक उद्बोधन भी देते हैं। भाषाई और व्‍यक्तित्‍व की सौम्‍यता उनकी भी खास पहचान है। ऐसे समय में जब कांग्रेस लंबे समय से विपक्ष में हैं, पंकज के पास अधिक अवसर हैं कि वे आलोचना में तीखी शब्‍दावली का प्रयोग करें। वे करते भी हैं लेकिन मारक शब्‍दों का व्‍याकरण सम्‍मानजनक ही होता है। वे कभी भाषा को निचले पायदान पर नहीं ले जाते हैं, न अखबारों में लिखते वक्‍त, न सोशल मीडिया पर और न चैनल की किसी गर्मागर्म बहस के दौरान। विरोधी दल की रीति-नीतियों पर तंज करते हुए वे कभी ‘बिलो द बेल्‍ट’ वार नहीं करते। ठीक वैसे ही जैसे रजनीश अपने बयानों में विपक्ष के कार्यकाल, कार्यक्रम और क्रियाकलापों को निशाना बनाते हैं, व्‍यक्तिगत जीवन को नहीं।

इन्‍हीं विशेषताओं के कारण जहां पंकज चतुर्वेदी पूर्व नेता प्रतिपक्ष सत्‍यदेव कटारे के मीडिया सम्‍बन्धित कार्यों को देखते रहे, वहीं अब वे सांसद ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया का प्रचार कार्य संभाल रहे हैं। अपने नेताओं का ऐसा ही विश्‍वास रजनीश ने भी अर्जित किया है। तभी तो मीडिया विभाग से जुड़े प्रतिनिधियों की कार्यशाला में मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उदाहरण देते हुए कहा था कि रजनीश से सभी को सीखना चाहिए कि सरकार का पक्ष कैसा और किस तैयारी से रखा जाता है।

बीते हफ्ते प्रवक्‍ता पद पर एक वर्ष का कार्यकाल पूर्ण करने पर रजनीश ने सार्वजनिक मंच से ही अपने कार्य पर रायशुमारी की। एक सलाह मिली –‘भविष्य में भी राजनीतिक कारणों से किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप न लगाएं और अपने वैचारिक विरोधियों की बात को भी ध्यान से सुनें।’ ऐसे समय में जब राजनीति प्रतिपक्ष को, कहने के लिए भी रत्‍ती भर जगह देने को तैयार नहीं हैं, खुली दृष्टि वाले ये युवा नेता वैमनस्‍य और घृणा के कारण दिनोंदिन हिंसक हो रही राजनीति के कीचड़ में ‘कमल’ की मानिंद खिले हुए हैं। (यह संयोग ही है कि एक का नाम कमल का पर्याय है तो दूसरा कमल के दल का प्रवक्‍ता।) इनका ऐसा होना कल की राजनीति से उम्‍मीद बनाए रखने में हमारी मदद करता है। यह भाव बलवान करता है कि नेताओं की यह धारा समृद्ध होगी तो सहअस्तित्‍व बना रहेगा।

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