उलझे नियम, छुईमुई छात्रसंघ चुनाव से जननेता नहीं दब्‍बू समर्थक मिलेंगे

0
53

मप्र में 23 अक्‍टूबर से कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव की प्रक्रिया आरंभ हो रही है। ये चुनाव इस लिए भी महत्‍वपूर्ण है कि 2011-12 के सत्र के बाद कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं। प्रदेश के उच्‍च शिक्षामंत्री जयभान सिंह पवैया यह श्रेय ले रहे हैं कि उन्‍होंने पांच सालों बाद छात्रसंघ चुनाव करवाने का साहसिक निर्णय लिया है। हालांकि, इसके लिए उन पर भाजपा के ही छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का भारी दबाव था। सरकार ने छात्रसंघ चुनाव करवाने का निर्णय भले ही किया हो लेकिन यह हाथ-पैर बांध कर तैराकी चैम्पियन बनाने के प्रयास की तरह है। छात्रसंघ चुनाव का मूल उद्देश्‍य शिक्षाकाल से ही सजग, चैतन्‍य और लड़का जन प्रतिनिधि तैयार करना है मगर मप्र उच्‍च शिक्षा विभाग ने जो उलझी, विरोधाभासी प्रक्रिया तैयार की है उससे मुखर जन नेता नहीं, दब्‍बू समर्थक ही प्राप्‍त होंगे।
मध्यप्रदेश में प्रत्यक्ष प्रणाली से छात्रसंघ चुनाव 1987 के बाद से बंद हो गए थे। इसके बाद 1994 तक यह चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से आयोजित किए जाते रहे। वर्ष 2003 में तत्कालीन दिग्विजय सरकार ने चुनाव के दौरान होने वाली हिंसा को देखते हुए इस पर प्रतिबंध लगा दिया था। एक साल के प्रतिबंध के बाद 2005 में मेरिट के आधार पर चुनाव हुए थे, जो अगले दो साल तक चले। वर्ष 2007 में उज्जैन के माधव कॉलेज में हुए प्रो. सभरवाल कांड के कारण सरकार ने एक बार फिर छात्रसंघ चुनाव पर रोक लगा दी थी। बाद में छात्र संगठनों की मांग पर सरकार ने सत्र 2010-11 व 2011-12 में चुनाव करवाए थे। इसके बाद से अभी तक चुनाव नहीं हुए हैं। इस बार हो रहे चुनावों में सरकार ने अप्रत्‍यक्ष चुनाव प्रणाली को ही चुना है। यानि, कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव होगा तथा वे अपना अध्‍यक्ष, उपाध्‍यक्ष, सचिव व सहसचिव चुनेंगे। यह प्रक्रिया 23 अक्‍टूबर से आरंभ हो रही है तथा 30 अक्‍टूबर को मतदान के बाद परिणाम आ जाएंगे।
विभाग ने चार पदों में से दो पर छात्राओं के आरक्षण की व्‍यवस्‍था की है। इन पदों का निर्धारण लॉटरी द्वारा होगा। मगर अजा, जजा या अन्‍य वर्ग के प्रतिनिधि के आरक्षण की व्‍यवस्‍था नहीं है। छात्रसंघ चुनाव निजी कॉलेजों में नहीं हो रहे हैं। सरकारी कॉलेजों के लिए भी उच्‍च शिक्षा विभाग ने जो नियम बनाए हैं, वे उलझे हुए हैं। मसलन, अपनी गाइड लाइन के बिन्‍दु 2 और 5 में विभाग कहता है कि एटीकेटी या दो डिग्री में गेप होने पर छात्र चुनाव लड़ने के पात्र नहीं होंगे। मगर बिन्‍दु 8 में कहा गया है कि कक्षा में योग्‍य प्रत्‍याशी न होने पर गुणानुक्रम (मैरिट) के आधार पर कक्षा प्रतिनिधि का चयन कॉलेज प्रबंधन करेगा। इसका अर्थ यह कि जो बिन्‍दु 2 या 5 के अनुसार अयोग्‍य हैं उन्‍हीं में से मैरिट के आधार पर कक्षा प्रतिनिधि चुना जा सकता है। इस बिन्‍दु के कारण चुनाव संचालकों पर छात्र संगठनों को भारी दबाव बनना तय है। इसी के कारण कॉलेज प्रबंधन पर किसी एक दल को लाभ पहुंचाने का आरोप भी लगेगा और विवाद भी होंगे। सेमेस्‍टर प्रणाली के कारण 70 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थियों को किसी न किसी विषय में एटीकेटी मिली है। ऐसे में भाजपा समर्थित एबीवीपी हो या कांग्रेस समर्थित एनएसयूआई दोनों ही संगठनों के सामने प्रत्‍याशियों का संकट है। हर बार की तरह ये संगठन पढ़ाकू विद्यार्थियों पर डोरे डाल रहे हैं।
मैरिट में आने की चिंता करने वाले विद्यार्थियों की चुनाव प्रक्रिया जैसी राजनीतिक गति‍विधि में कोई रूचि नहीं होती। वे केवल इन दलों के मुखौटा होंगे और इन छात्र प्रतिनिधियों की तरह यह चुनाव प्रक्रिया भी केवल मुखौटा ही होगी। यदि हम उम्‍मीद कर रहे हैं कि इस प्रक्रिया से छात्र राजनीति से निकले जमीनी पकड़ वाले भविष्‍य के नेता हमें मिल जाएंगे तो यह हमारा भ्रम है। यह चुनाव प्रक्रिया नेताओं के समर्थकों की फौज में कुछ दब्‍बू युवाओं की बढ़ोतरी भर कर पाएगी। मगर इन युवा नेताओं की आवाज में न कोई ताकत होगी न इतना जोर कि राजनीति को प्रभावित ही कर सकें। इसलिए, छात्रसंघ चुनाव महज एक सप्‍ताह की सनसनी और पाठ्यक्रम के इतर कुछ दिनों की गतिविधियों के अलावा कोई अन्‍य परिणाम नहीं देने वाले।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY