कृषि में विरोधाभास खत्‍म करना ‘स्‍टाइलिश’ राजौरा के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती

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‘‘आज, मैंने मप्र के प्रमुख सचिव कृषि के रूप में चार साल पूर्ण किए। यह यात्रा चुनौतियों से भरी रही। कई मील के पत्थर हासिल किए गए, कृषि क्षेत्र में नवाचार शुरू किए गए और इन चार वर्षों में किसानों के कल्याण के लिए तेज गति से कदम उठाए गए। कृषि महत्वपूर्ण मुद्दों और जटिलताओं से भरी हुई है। इस क्षेत्र में अभी तक बहुत कुछ हासिल करना बाकी है।’’

सोशल मीडिया पर अपने फोटो और यात्राओं की स्‍मृतियों को अपडेट करने में अव्‍वल रहने वाले प्रमुख सचिव कृषि डॉ. राजेश राजौरा ने बीते सप्‍ताह अपने फेसबुक अकाउंट पर यह पोस्‍ट कर अपनी सफलता और चुनौतियों की सूचना दी थी। मप्र, कृषि तथा मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का अंतर-सम्‍बन्‍ध जगजाहिर है। ऐसे में कृषि के प्रमुख सचिव पद पर चार सालों तक एक ही अधिकारी (सामान्‍यत: एक पद पर अधिकतम तीन वर्ष तक पदस्‍थापना का नियम है) का काबिज रहना उस अफसर की काबिलियत को दर्शाता है। डॉ. राजौरा के इस पद पर टिके रहने के पीछे अन्‍य कारणों के अलावा सबसे महत्‍वपूर्ण वजह मप्र के हिस्‍से में कई कृषि सफलताएं भी हैं।

आमतौर पर कृषि क्षेत्र की विकास दर सबसे कम होती है लेकिन जिस राज्य में यह क्षेत्र दो अंकों की विकास दर हासिल कर लेता है, वह हैरत में डालने वाली बात है। मध्य प्रदेश ने वर्ष 2010 से लेकर 2015 तक पांच वर्षों में कृषि क्षेत्र में 13.9 फीसदी की दर से विकास किया है। मध्य प्रदेश का कृषि क्षेत्र में यह प्रदर्शन अचंभे में डाल देता है। वर्ष 2005-10 के दौरान मध्य प्रदेश की भी कृषि विकास दर पांच फीसदी से अधिक नहीं थी। बीते पांच सालों में राज्य में फसलों की बुआई का रकबा बढ़ा है और अब वहां के किसान साल भर में तीन-तीन फसलें उगाने लगे हैं। मध्य प्रदेश केंद्रीय गेहूं भंडार में योगदान के मामले में पंजाब के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया है।

डॉ. राजौरा ने अपने अपडेट में नवाचार का जिक्र किया है। इस सफलता के पीछे माइक्रो इरीगेशन सहित अन्‍य चतुराई भरे कदम भी गिनाए जा सकते हैं। लेकिन इस सफलता जितनी बड़ी ही चुनौतियां भी हैं। राष्ट्रीय नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने भोपाल प्रवास के दौरान कहा था कि कृषि को छोड़कर मप्र सभी क्षेत्रों में पीछे है। इसे पंजाब मत बनाओ। वहां कृषि के अलावा किसी भी सेक्टर पर ध्यान नहीं दिया गया। अन्य राज्यों से तुलना करें तो स्‍वास्‍थ, उद्योग, निवेश और शिक्षा के क्षेत्र में मप्र पीछे है। गैर कृषि क्षेत्र में बाकी राज्यों की तुलना में मप्र की विकास दर कम है।

साफ है कि कृषि क्षेत्र में मिली कामयाबी अन्य क्षेत्रों में दोहराई नहीं जा सकी है। कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि से आम तौर पर परिवहन, कारोबार, वित्त एवं बिजली उपभोग में भी तेजी होनी चाहिए थी, मगर ऐसा हुआ नहीं। बीते दस सालों के आंकड़ों को तुलनात्‍मक रूप से देखें तो विनिर्माण क्षेत्र की औसत विकास दर 2005-10 के 9.5 फीसदी की थी जो 2010-15 के दौरान तेजी से गिर कर 2.9 फीसदी तक आ गई। सेवा क्षेत्र में भी विकास दर 7.6 फीसदी से घट कर 6.3 फीसदी पर पहुंच गई। अन्य क्षेत्रों के कमजोर प्रदर्शन का नतीजा यह हुआ है कि राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का हिस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। मप्र के लिए यह बड़ी चुनौती है कि मप्र की कृषि पर निर्भरता कैसे संतुलित की जाए।

‘स्‍टाइलिश अफसरों’ में शुमार किए जाने वाले डॉ राजौरा के विभाग के सामने सवाल है कि मध्य प्रदेश क्या कृषि क्षेत्र की सफलता को लंबे समय तक बरकरार रख पाएगा? मुख्‍यमंत्री चौहान चाहते हैं कि 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के मिशन में मप्र सिरमोर बने। ऐसे में चुनौती है कि कृषि उत्‍पादन और आय में बेहतर अनुपात स्‍थापित करने के लिए कौन से सफल नवाचार किए जाएं? पांच बार के कृषि कर्मण अवार्ड विजेता मप्र के लिए यह भी इतना ही बड़ा सच है कि किसान आत्‍महत्‍याएं कर रहे हैं। सफलता के आंकड़ों में क्‍या इस वजह चिह्नी जा सकती है? डॉ राजौरा को मिले बधाईसंदेशों में इन्‍हीं मोर्चों पर सफलता के लिए व्‍यक्‍त की गई शुभकामनाएं बताती हैं कि उनसे उम्‍मीदें कम नहीं हैं तो उनकी चुनौतियां भी कम नहीं है।

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