दिग्गी की नर्मदा यात्रा में अमृता राय की सामाजिक समझ का ताना-बाना 

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पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एक माह से नर्मदा यात्रा पर हैं। प्रदेश में दस वर्षों तक शासन करने वाले सिंह जब डेढ़ दशक के बाद पदयात्रा के जरिए जनता के बीच पहुंचे हैं तो उनकी इस यात्रा पर विविध प्रतिक्रियाएं मिलना स्वाभाविक थी और यह हो भी रहा है। उनके बयानों पर हमेशा तीखे हमले हुए हैं और अब भले ही वे राजनीतिक रूप से खा‍मोश हैं मगर विपक्ष के हमले जारी हैं। इस धार्मिक यात्रा के राजनीतिक मंतव्य तलाशे जा रहे हैं, मगर धार्मिक और राजनीतिक ताने-बाने के विपरीत इस यात्रा में सांस्कृतिक और सामाजिक अर्थ भी कम नहीं हैं। यह कार्य सिंह की जीवनसंगिनी अमृता राय कर रही हैं। वे न केवल नर्मदा पट्टी के ‘लोक’ को टटोल रही हैं बल्कि उनके साथ अपनत्व का नाता बुनते हुए चल रही हैं। उनके ये अनुभव यात्रा डायरी के रूप में दर्ज भी हो रहे हैं जिसमें प्रदेश के ग्रामीण अंचल की जिंदगी के कई श्वेत-श्याम रंगों को साफ देखा जा सकता है।
‘नर्मदा अंचल में अनेकानेक कहानियाँ हैं। एक ख़त्म होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है। एक से जुड़ी अनेक कहानियाँ हैं…समेटते- समेटते सुबह से शाम हो जाती है। फिर भी लगता है हमने पीछे बहुत कुछ छोड़ दिया।’ अमृता जब ये लिखती हैं तो समझा जा सकता है कि वे नर्मदा किनारे एक-एक डग स्त्री संवेदना और पत्रकारीय चेतना के साथ भर रही हैं। वे जब इन अनुभवों को साझा करती हैं तो इसमें राजनीतिक सूत्रों को भले ही तलाश लिया जाए मगर सामाजिक परिवेश और वहां की समस्याएं मुखरता से आ धमकती हैं। अमृता ने अपने यात्रा वृतांत में लिखा है– ‘मूँदी से कुछ ही किलोमीटर चले थे कि रास्ते में कुछ औरतें इंतज़ार करती मिलीं। कपास के खेतों के बाहर खड़ी इन महिलाओं को देखकर लगा कि शायद स्वागत में खड़ी हैं पर नहीं; वो तो लड़ने के लिए खड़ी थीं। नेताओं की जमात जाती देख वो आठ से दस महिलाएँ लगभग चीख़ती हुई हमारी तरफ बढ़ीं। इतनी त्रस्त थीं कि सब के सब एक साथ बोल रही थीं। कुछ देर रुकने पर समझ आया कि वो कह क्या रही हैं।
“हमें पैसा नहीं चाहिए, हमें पानी चाहिए”
फिर शोर। हमने पूछा पैसा कौन दे रहा है? उन्होंने कहा- पैसे का सपना दिखाया जाता है। पर हमें तो पानी चाहिए। हमारे भमौरी गाँव में पानी नहीं आता। हमें पानी 200-300 के मोल खरीदना पड़ता है। सरकारी ट्यूबवेल भी नहीं है। पानी ना होने से खेतों में काम भी नहीं मिलता। ढोर, बैल, जानवर को भी पानी की दिक़्क़त है। हम ख़ुद की प्यास बुझाएँ या जानवर की? शौच का तो पूछो ही मत। फिर इनमें से दो मंजू बाई और सुनीता बाई सामने आईं और कहने लगीं हमारी तो मुसीबत दूर करके ही जाओ।’
बात यहीं नहीं थमी। आगे एक किलोमीटर जाने पर अनेक मंजू, सुनीता, गीता और सपना इंतज़ार करती मिलीं। यहां कुछ हताशा के स्वर में वे लिखती हैं- ‘पानी नहीं पर पानी न होने की शिकायत की बाढ़ महसूस की।’
अमृता की डायरी रेखांकित करती है- ‘नर्मदा किनारे के लोग प्यासे हैं। वे बताती चलती हैं कि नर्मदा किनारे 464 किलोमीटर की यात्रा में अब तक 12 से ज़्यादा नदियाँ मिलीं। लेकिन कोई ऐसा ना मिला जिसे पानी को लेकर शिकायत नहीं। पानी को तरसते लोगों की शिकायतें सुनकर दिल भर आता है। सुनो हे नर्मदा मईया!’
ऐसा नहीं है कि प्रदेश के पूर्व मुखिया की संगिनी होने के कारण उन तक केवल अर्जियां ही पहुंच रही हैं। बल्कि ग्रामीण उन्हें आत्मीयता से घेर कर अपनी देशज संस्कृति से रूबरू करवाते हैं। बकौल अमृता- ‘मैं कभी नहीं भूल सकती बिचुआ गांव की उन सखियों को जिन्होंने शपथ ली कि शरद पूर्णिमा के दिन वो मुझे औपचारिक सखी बनाएँगी। जी हां, इस इलाके में आज भी सखी बनाने की अटूट परंपरा है। जिसे पूरे विधि विधान के साथ किया जाता है। महिलाएं शरद पूर्णिमा के दिन शक्कर और खोवे के 6 लड्डू बनाती हैं। ये 6 लड्डू 6 प्रिय लोगों को खिलाए जाते हैं। पहला– सखी, दूसरा– ख़ुद, तीसरा– पति, चौथा- चाँद, पाँचवा-राधा-कृष्ण, छठा- गर्भवती स्त्री।’
हम यह नहीं जान पा रहे हैं कि दिग्विजय सिंह अपनी यात्रा के दौरान क्या हासिल करते हुए चल रहे हैं, मगर साफ तौर पर देख सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में जन्मी और दिल्ली के पॉवर कॉरिडोर में पत्रकारिता करने वाली अमृता मप्र के नर्मदांचल में लोक संस्कृंति की डोर से गहरे सम्बन्ध बनाते हुए आगे बढ़ रही हैं। सांस्कृ्तिक-सामाजिक नेह की यह गाढ़ी रेखा दिग्विजय सिंह और अमृता राय के लिए भविष्य के आकाश पर कौनसी राजनीतिक चमक बिखेरेगी यह देखना दिलचस्प होगा।

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