माना, रजनी, अंजली, अकरम… मप्र में बदलाव के ब्रांड एम्बेसडर क्यों नहीं हो सकते?

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सचिन तेंदुलकर को तो सभी जानते हैं, मगर क्या आप माना मंडलेकर को जानते हैं? माना मंडलेकर वही कराटे चैम्पियन है जिनसे मंच पर साथ बैठे तेंदुलकर ने कहा था –‘मैं आपसे डर गया था कि कहीं आप मुझे अपने साथ कराटे करने के लिए न कह दें।’ मुझे यकीन है कि माना मंडलेकर की तरह आप डांसर अकरम खान या पैरा तैराकी चैम्पियन रजनी झा या अंजलि इवने को नहीं जानते होंगे। यह हमारा दुर्भाग्य है कि जिन युवाओं को उनका ही प्रदेश नहीं जानता उनके काम को पूरे देश-दुनिया में सराहा जा रहा है। बदलाव का परचम थामे चल रहे मप्र के गांव-कस्बों के ये किशोर-युवा पूरी दुनिया में परिवर्तन के प्रेरणास्रोत बन गए हैं, फिर हम इन्हें ‘अपना मप्र’ के ब्रांड एम्बेसडर बनाने से क्यों चूक रहे हैं?
ऊपर जिन नामों का जिक्र किया गया है उनमें टिमरनी की माना मंडलेकर तथा रजनी झा की पहचान अपने क्षेत्र के दायरे से उठ कर राष्ट्र व्यापी तब हुई जब पिछले 12 अक्टूबर को दिल्ली में विश्व बालिका दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में इन दोनों ने क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर और महिला क्रिकेट की सितारा खिलाड़ी मिताली राज के साथ मंच साझा किया। हरदा के अकरम खान तथा अंजली इवने साउथ एशिया के लिए किशोर विकास और सहभागिता विषय पर काठमांडू में आयोजित कार्यशाला में मप्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। ये सभी मप्र में यूनिसेफ के सहयोग से स्वयंसेवी संस्था सिनर्जी द्वारा चलाए जा रहे चेंजलूमर्स (परिवर्तन के वाहक) कार्यक्रम का हिस्सा है। सभी के साथ संघर्ष और सफलता की अपनी कहानी है।
मसलन, माना मंडलेकर ब्लेक बेल्ट कराटे चैम्पियन है लेकिन इस सफलता के लिए उन्हें काफी कुछ झेलना पड़ा है। बेटी के बाहर जाने पर प्रतिबंध वाले समाज में समय के पहले विवाह की रीतियां आज भी आम बात हैं। इन कुरीतियों से लड़ना जितना जटिल है, उतनी ही कठिन घर के बाहर छेड़छाड़ तथा असमानता का सामना करना है। माना ने हर परिस्थिति का मुंह तोड़ जवाब दिया। जब बाहर छेड़छाड़ बढ़ गई तो उन्होंने सिनर्जी के ही एक चेंजलूमर साथी से कराटे सीखे और मनचलों का मुंह तोड़ जवाब दिया। इस सफलता से प्रेरणा मिली और माना ने अकेले के दम पर अपने जैसी छेड़छाड़ पीडि़त किशोरियों को साहस देने का काम शुरू किया। वे किशोरियों को कराटे सीखा रही हैं ताकि सभी छात्राएं छेड़छाड़ का मुंह तोड़ जवाब दे सकें।
इसी तरह, अकरम ने भी पारंपरिक मुस्लिम परिवार में रहते हुए परिवर्तन लाने का मुश्किल रास्ता चुना। अकरम को डांस पंसद हैं और इसी में वे अपना नाम बना चुके हैं। अब वे डांस के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन के संदेश का प्रसार करते हैं। ये कार्य देखने सुनने में आसान लग सकते हैं मगर वास्तव में ये छोटे कार्य नहीं है। शहरों में रह कर परंपरागत रीतियों को कोसना आसान है लेकिन गांव-समाज में रह कर उन्हें बदलने के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए। और माना, रजनी, अंजली, अकरम जैसे किशोर यह काम बहुत शिद्दत से कर रहे हैं। फिलहाल इन्हें आगे बढ़ा रहे संगठन को वैश्विक संगठन यूनिसेफ का साथ मिल रहा है। और सफलता की कहानियों से प्रभावित समाज भी अब इनके प्रयासों को मजबूत कर रहा है, मगर केवल इक्का-दुक्का प्रयासों से बात नहीं बनने वाली। ये प्रोजेक्ट तो राह दिखाता है कि कैसे हम गांव-कस्बों में युवा नेतृत्व को एक मंच दे सकते हैं। समाज में परिवर्तन ला सकने वाले किशारों की बात के प्रसार में सहायक हो सकते हैं।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मप्र के विकास के लिए ‘अपना मप्र’ का विचार रखा ताकि प्रदेश की तरक्की मशीनी या कागजी न हो कर अपनत्व के भाव से पूर्ण हो। शासन-प्रशासन के काम में जनता की सक्रिय भागीदारी हो। मगर जैसा कि होता है, हर नेक विचार की तरह इस विचार को भी ब्यूारोक्रेसी और राजनीति ने औपचारिक खानापूर्ति से आगे नहीं बढ़ने दिया। हम कन्या के पैर पूजन कर सकते हैं, मगर कुरीतियों से लड़ती बेटियों के हौंसलों को ताकत नहीं दे सकते। किशोरों व युवाओं को आयोजनों में तालियां बजाने बुला सकते हैं मगर उनके इरादों को निखारने में सहायक वातावरण नहीं दे सकते। क्यों ? क्योंं ये किशोर मप्र में परितर्वन के हरकारे स्वीकार नहीं हो सकते?

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