संघ से उम्मीद, वह जाने कि मप्र के 9000 गावों में कितनी आई समरसता 

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक 12 से 14 अक्टूबर तक भोपाल में होने जा रही है। सरसंघ चालक मोहन भागवत भोपाल में हैं और 12 अक्टूबर को कार्यकारी मंडल की तय बैठक आरंभ होने तक विभिन्न मुद्दों पर औपचायरिक और अनौपचारिक चर्चाएं, विमर्श तथा आकलन होगा। ऐसे में कुछ मुद्दे ऐसे भी हैं जिन पर चर्चा तथा कार्य करने का संदेश जाना आवश्यक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि संघ का शीर्ष प्रबंधन दो साल पहले मप्र में हुए उस सर्वे पर गौर करेगा जिसमें कहा गया था कि मप्र के गांवों में आज भी मंदिर, पेयजल स्रोतों तथा श्मशान को लेकर भेदभाव होता है। समरसता वर्ष के समापन के बाद देखा जाएगा कि अब इन गांवों में समरसता लाने की कोशिशें कितनी सफल हुई हैं। केरल में राजनीतिक हिंसा के खिलाफ खोले गए मोर्चे के बीच यह भी विचार किया जाएगा कि मारे गए स्वयंसेवकों के परिजनों या हमले में जिन स्वयंसेवकों के अंग भंग कर दिए गए हैं, उनके जीवनयापन हेतु सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए क्या किया जा सकता है।
भोपाल में होने वाली संघ बैठक पर सभी की निगाहें टिकी हैं। इसका कारण यह है कि यहां संघ अपने कामकाज की समीक्षा तथा भविष्य की रणनीति तय करने जा रहा है। यूं तो संघ गैर राजनीतिक संगठन है मगर भाजपा को उसका सतत मार्गदर्शन मिलता है। केन्द्र व राज्यों में भाजपा की सरकार होने के कारण संघ की बैठक तथा उसके निर्णय राजनीतिक रूप से भी अधिक महत्व पूर्ण हो जाते हैं। ऐसे में तय है कि संघ अपने लिए जो दिशा तय करेगा वह सत्ता संचालित कर रही भाजपा और अन्य सेवा कार्य संभाल रहे आनुषांगिक संगठनों के लिए प्रेरणा (बाध्यता) बन जाएंगे। भोपाल में हो रही कार्यकारी मंडल की बैठक में जो बिन्दु तय होंगे उन्हें कुछ माह बाद होने वाली प्रतिनिधि सभा की बैठक में रखा जाएगा। वहां से प्रस्ताव पारित कर उन बिन्दुओं को कार्य का हिस्सा बना दिया जाएगा। बैठक मप्र में हो रही है तो यहां के एक प्रमुख मुद्दे पर संघ का ध्यान दोबारा आकर्षित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
संघ को देश के तमाम मुद्दों के अलावा मप्र सहित कई प्रांतों में जारी जातिगत भेदभाव के मुद्दे पर भी गौर करना होगा। इस भेदभाव की स्थिति का खुलासा संघ प्रमुख भागवत ने स्वयं (दशहरे के अपने संबोधन में) किया था। तब उन्होंने कहा था कि संघ ने मध्यभारत प्रांत (मप्र के भोपाल, ग्वालियर, चंबल और होशंगाबाद) में 9000 गांवों का विस्तार से सर्वे करवाया है। इसमें सामने आया है कि लगभग 40 प्रतिशत गांवों में मंदिर, 30 प्रतिशत में पानी व 35 प्रतिशत गांवों में श्मशान को लेकर भेदभाव का व्यवहार होता है। संघ ने यह सर्वे दिसंबर 2015 में कराया था, जिसका प्रतिवेदन मार्च 2016 में हुई प्रतिनिधि सभा की बैठक में रखा गया था। यहां तीन साल में जाति प्रथा, छुआछूत खत्म करने के लिए संघ ने ‘एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान’ का नारा दिया था। उसी दिशा में काम करने के लिए समरसता वर्ष मनाया गया। संघ इसके परिणामों को अपने ही सर्वे से तुलना करते हुए सामने रखे तो हकीकत पता चलेगी और जाना जा सकेगा कि इस सामाजिक समस्या को दूर करने में आखिर बाधाएं कहा हैं। संघ यदि मप्र के 9 हजार गांवों की पूर्व और वर्तमान स्थितियों को सार्वजनिक करता है तो यह सामाजिक परिवर्तन की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।
इसी तरह, एक मसला केरल में राजनीतिक हिंसा में जान या अंग गंवाने वाले स्वयंसेवकों तथा उनके परिजनों के जीवनयापन से जुड़ा है। जिस तरह देश के लिए प्राण गंवाने वाले सैनिकों के परिवार की देखभाल का जिम्मा सरकार का है, उसी तरह यह राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की भी विशिष्ट जिम्मेदारी है कि वे अपने लक्ष्य में प्राण न्योछावर कर देने वाले कार्यकर्ताओं के परिवार की जिम्मेदारी लें। अपने स्वयंसेवकों के हित-अहित से गहरा नाता रखने वाले संघ से यह उम्मीद की जा रही है कि वह हताहत स्वयंसेवकों के परिजनों के लिए आजीविका के साधन जुटाने के कुछ स्थाई प्रबंध करे। अभी किए जा रहे प्रबंधन बहुत वैयक्तिक स्तर के होते हैं। केन्द्रीकृत व्यवस्था होने पर अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले स्वयं सेवकों के लिए संघ वास्तव में ‘परिवार’ स्वरूप हो जाएगा। बड़े मुद्दों के मुकाबले गौण दिखाई देने वाली इन बातों पर विमर्श वास्तव में हमारे समय की मांग है।

 

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