इंदिराजी और मोदी की राजनीतिक-रंगत सत्ता-मद का समभाव

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सौंवी वर्षगांठ पर इंदिरा गांधी का स्मरण और उनके योगदान का विश्लेषण श्रध्दा-सुमन अर्पित करने वाली राजनीति की परम्परागत भाषा-शैली में संभव नहीं है। ऐसे प्रसंगों पर उपयोग किए जाने वाले मुहावरों की अतिरंजना इतिहास से सीखने की राहों को भूल-भुलैया की अंतहीन गुफाओं की ओर मोड़ देती है। इसीलिए आजादी के सत्तर वर्षों बाद भी देश व्यक्तिपरक राजनीतिक-सत्ता और संगठन की त्रासदियों से जूझ रहा है। इतिहास से सीखने का सबक लालकृष्ण आडवाणी की उस चेतावनी में निहित है, जो आपातकाल की चालीसवीं वर्षगांठ पर उनके इंटरव्यू में सामने आई थी। उन्होंने आगाह किया था कि आपातकाल की मनोवृत्तियों को पूरी तरह से खारिज करना अभी भी संभव नहीं है। आबोहवा में मामूली सी अनुकूलता आपातकाल की निरंकुशताओं का सबब बन सकती है। वर्तमान में नरेन्द्र मोदी देश के प्रधान मंत्री हैं और आपातकाल में इंदिराजी के हाथों में भारत की बागडोर थी।

यदि बात इंदिराजी से शुरू करें, तो प्रधानमंत्री के नाते उनके विश्लेषण के लिए पीएन हक्सर के संस्मरण मौजूद हैं, जिसमें इंदिराजी के व्यक्तित्व के कई पहलू उजागर होते हैं। हक्सर 1967 से 1973 तक इंदिराजी के प्रधान सचिव थे। उसके बाद भी राजनीति और प्रशासन में उनके सहयात्री रहे है। हक्सर की विव्दत्ता निर्विवाद थी और नीति-नियंता के रूप में उनकी दक्षता को कोई चुनौती भी नहीं देता था। हक्सर के संस्मरणों के अनुसार इंदिराजी देश के लिए जीती थीं और उन्होंने देश के लिए अपना बलिदान दिया था। लेकिन उन्हें यह गुमान भी था कि वो किसी भी अन्य भारतीय की तुलना में बेहतर समझती हैं कि भारत के लिए अच्छा और सर्वश्रेष्ठ क्या है? भारत को समझने के गर्वीले एहसास के कारण ही लोकसभा में उनकी दिलचस्पी कम थी। विपक्षी नेताओं की अवहेलना का सबब भी यही था कि वो देश के हित में नहीं सोचते हैं। आपातकाल में विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी उनके इस सोच को रेखांकित करती है। कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र को खत्म करने की सिर्फ, और सिर्फ इंदिराजी ही जिम्मेदार हैं। कैबिनेट उनकी कठपुतली थी। इंदिराजी ब्यूरोक्रेसी में निजी प्रतिबध्दताओं को प्राथमिकता देती थीं और कश्मीरी-अधिकारियों और सलाहकारों की उनमें भरमार थी।

आपातकाल के स्याह पहलुओं को छोड़ दें, तो इंदिराजी की उपलब्धियों में कई स्वर्णिम-तत्व दर्ज हैं। बंगला देश की जीत के अलावा खाद्य-सुरक्षा, इसरो-कार्यक्रम, बैंक-राष्ट्रीयकरण जैसे काम उनमें शरीक हैं। इंदिरा गांधी की अच्छाई-बुराइयों के लिए वह ‘एब्सल्यूट-पॉवर’ जिम्मेदार है, जो आपातकाल के बाद नरेन्द्र मोदी ने राजनीतिक-पुरुषार्थ से हासिल किया है। आडवाणी ने अपने साक्षात्कार में इसी ‘एब्सल्यूट-पॉवर’ की ओर इशारा किया है। मोदी के पास अपना बहुमत है। आडवाणी के ‘ऑब्जर्वेशन्स’ के परिप्रेक्ष्य में इंदिरा-जयंती पर यह सवाल मौजूं है कि क्या लोकतंत्र की धमनियों में सत्ता के निरंकुश कीटाणुओं का उपद्रव शुरू हो चुका है? पचास साल के राजनीतिक परिदृश्य में नरेन्द्र मोदी एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिनके पास इंदिरा गांधी जैसी अपनी राजनीतिक-सत्ता है।

दिलचस्प यह है कि इंदिरा और मोदी जुदा-जुदा राहों से सत्ता के शिखर पर पहुंचे हैं। मोदी की परवरिश में चांदी के चम्मचों का योगदान नहीं है। तंगहाल जिंदगी से रूबरू मोदी कांग्रेस से उलट आरएसएस की विचार-भूमि पर हिन्दू-राष्ट्रवाद की कठोर परिकल्पनाओं में पले-बढ़े हैं। परवरिश और राहों की भिन्नता के बावजूद सत्ता के शिखर पर मोदी और इंदिराजी के राजनीतिक-व्यवहार में आश्चर्यजनक समानता है। इंदिरा के समान ही मोदी भी स्वतंत्र मीडिया को पसंद नहीं करते हैं। तीन साल के कार्यकाल में मोदी ने अपवादस्वरूप ही मीडिया को इंटरव्यू दिए है। प्रेस-कान्फ्रेंस आज तक नहीं हुई। पब्लिक में कठिन और संवेदनशील सवालों का पूछा जाना मोदी को कबूल नहीं है। इंदिराजी के समान ही संसदीय-बहस को वो हाशिय़े पर रखते हैं। मोदी की कांग्रेस-मुक्त भारत की जिद परिचायक है कि लोकतंत्र के लिए जरूरी विपक्ष उनके लिए गैर-जरूरी है। अपने कैबिनेट-सहयोगियों को ‘डॉमीनेट’ करने में वो किसी भी तरह से इंदिरा से कमतर नहीं हैं। प्रतिबध्द ब्यूरोक्रेसी की चाहत इससे उजागर होती है कि मौजूदा समय में सरकार के ज्यादातर प्रमुख पदों पर गुजरात काडर के अधिकारी काबिज हैं। नोटबंदी में रिजर्व बैंक और गुजरात चुनाव की घोषणा में चुनाव आयोग के अवमूल्यन से पता चलता है कि लोकतंत्र कितनी तेजी से फिसल रहा है। संसद की महत्ता और संवैधानिक संस्थाओं की सर्वोच्चता से ही लोकतंत्र की सेहत का अनुमान लगाया जा सकता है। सवाल यह है कि निर्णायक बहुमत हासिल करने वाले राजनेता निरंकुशता का व्यवहार क्यों करने लगते है? इंदिराजी के चश्मे से वर्तमान का आकलन भय पैदा कर रहा है।

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