क्या हार्दिक की आंधी 15 लाख वोटों का ‘स्विंग’ पैदा कर सकेगी?

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मतदान के एक पखवाड़े पहले कांग्रेस और हार्दिक पटेल का राजनीतिक-समझौता होते ही गुजरात के चुनाव-अभियान के तेवर एकदम ही बदल गए हैं। संवैधानिक व्यवस्थाओं के मद्देनजर भाजपा मानती थी कि कांग्रेस पटेलों के पक्ष में ऐसा कोई राजनीतिक-फार्मूला ईजाद नहीं कर पाएगी, जो कांग्रेस और हार्दिक पटेल के बीच समझौते का आधार बन सके, लेकिन अब समझौता हकीकत बन चुका है। भाजपा को इस समझौते से विचलित जातीय-समीकरणों को नए सिर से संभालना होगा, क्योंकि कांग्रेस के साथ हार्दिक की जुगलबंदी ने उत्तर प्रदेश और बिहार की तरह गुजरात के चुनाव में भी जात-बिरादरी को गहरा कर दिया है। गुजरात में कुल 50 प्रतिशत ओबीसी मतदाता हैं। इनके अलावा 14 फीसदी आदिवासी, 8 फीसदी दलित, 12 फीसदी पटेल, 8 फीसदी मुसलमान और 4 प्रतिशत अन्य मतदाता हैं। इसके पहले कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी की ‘खाम-थ्योरी’ पर अमल करके सीटों का बड़ा आंकड़ा पाया था। ‘खाम-थ्योरी’ क्षत्रिय, दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय की एकजुटता की बुनियाद पर खड़ी थी।
सवाल यह है कि तीस साल बाद, जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व के मसीहा के रूप में सामने खड़े हैं, क्या ‘खाम-थ्योरी’ या जातीय राजनीति के दूसरे फार्मूले कारगर हो पाएगें? भाजपा की चिंताएं सिर्फ हार्दिक पटेल को लेकर नहीं हैं। अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी की युवा पेंचबंदी भी भाजपा की परेशानी में इजाफा कर रही है। अल्पेश अन्य पिछड़े वर्ग में युवा नेतृत्व का प्रतीक बनकर उभरे हैं, जबकि अनुसूचित जातियों में जिग्नेश की मैदानी-पकड़ गहरी है। अभी यह अनुमान लगाना संभव नहीं है कि तीनों युवा नेता मिलकर कितना राजनीतिक प्रभाव पैदा कर पाएंगे? युवा नेताओं की इस तिकड़ी को युवाओं का कितना समर्थन हासिल है?
भाजपा मानती है कि पटेल समुदाय के धुरंधर नेता केशुभाई पटेल भाजपा से बगावत करके पाटीदारों का समर्थन हासिल नहीं कर सके, तो फिर हार्दिक पटेल की बिसात ही क्या है? केशुभाई पटेल ने 2012 में भाजपा से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई थी। वो 84 सीटों पर चुनाव लड़े थे, लेकिन उन्हें मात्र 2 सीटें हासिल हुई थीं, उनकी पार्टी को सिर्फ 3 प्रतिशत वोट मिले थे। वैसे गुजरात में पाटीदारों के राजनीतिक-वजूद को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। गुजरात की आबादी में 12 प्रतिशत हिस्सेदारी पाटीदारों की है। इसके अलावा 71 विधानसभा क्षेत्रों में 15 फीसदी या उससे ज्यादा मतदाता पाटीदार समाज के हैं। पिछले चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के वोटों का अंतर 7 फीसदी था। चुनाव विश्लेषकों के अनुसार तीन-साढ़े तीन प्रतिशत का स्विंग चुनाव नतीजों में बड़ा उलट-फेर कर सकता है।
चुनाव-विश्लेषक और कांग्रेसी साढ़े तीन प्रतिशत स्विंग की खुशफहमी पाल सकते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में इस तूफान को पैदा करना आसान काम नहीं है। गुजरात में कुल मतदाताओं की संख्या 4.33 करोड़ है। साढ़े तीन प्रतिशत का स्विंग 15 लाख मतपत्रों में तब्दीली की मांग करता है। सवाल यही है कि दो-ढाई साल पहले सार्वजनिक जीवन में उगे हार्दिक पटेल की आंधी में क्या इतनी ताकत है कि वो 15 लाख मतपत्रों को उड़ाकर कांग्रेस की झोली में डाल सकें? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विशाल राजनीतिक व्यक्तित्व हिमालय की तरह हार्दिक पटेल की राहों में खड़ा है। सही है कि हार्दिक के साथ जिग्नेश और अल्पेश ठाकोर की जातीय-जुगलबंदी के कारण इन अटकलों को पंख लग गए है कि भाजपा का समर्थन दिन-ब-दिन रिस रहा है। कांग्रेस के करीब चालीस प्रतिशत अपने वोट-बैंक ने युवा-तिकड़ी के अरमानों को ऩया आकाश दिया है, लेकिन उम्मीदों की इस दौड़ में सबसे बड़ी बाधा बनकर प्रधानमंत्री मोदी खुद खड़े हैं। भाजपा को अपनी कमजोर कड़ियों का एहसास पहले से है। जीएसटी और नोटबंदी ने आम लोगों के विश्वास को आहत किया है। भाजपा-नेताओं के बड़बोले आश्वासनों के बादलों से पैदा उमस ने भाजपा की राजनीतिक-फिजाओं को बदनुमा बना दिया है। विकास के पागल होने के बाद हिन्दुत्व का टॉनिक भी राजनीतिक-कमजोरियों को दूर करने में मददगार सिध्द नहीं हो पा रहा है। शायद इसीलिए भाजपा गांव-गांव यह नारा लेकर निकल पड़ी है कि यह ‘गुजरात और गुजराती’ याने नरेन्द्र मोदी की इज्जत का सवाल है।

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